12वीं बरसी पर काशी ने कुछ इस तरह याद किया अपने उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को

मैनेजिंग ट्रस्टी भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान फाउन्डेशन अब्बास ने बताया कि काशी के तमाम हस्तियों के साथ प्रशासनिक अमले ने आज उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को अपनी श्रद्धांजलि दी.

News18 Uttar Pradesh
Updated: August 21, 2018, 3:00 PM IST
12वीं बरसी पर काशी ने कुछ इस तरह याद किया अपने उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को
वाराणसी में बिस्मिल्लाह खां की कब्र पर उन्हें दी गई श्रद्धांजलि
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Updated: August 21, 2018, 3:00 PM IST
वाराणसी में मंगलवार को भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की 12वीं पुण्यतिथि मनायी गई. इस दौरान फातमान स्थित उस्ताद की कब्र पर कुराख्वानी की गई और उस्ताद को याद किया गया. बता दें कि 21 अगस्त 2006 को शहनाई के जादूगर का निधन हुआ था. आज उनकी बरसी मनायी गई. उस्ताद की कब्र पर वाराणसी के प्रशासनिक अधिकारियों सहित काशी के तमाम लोग पहुंचे और उस्ताद को श्रद्धान्जली अर्पित की.

मैनेजिंग ट्रस्टी भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान फाउन्डेशन अब्बास ने बताया कि काशी के तमाम हस्तियों के साथ प्रशासनिक अमले ने आज उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को अपनी श्रद्धांजलि दी. वे एक विश्व की नामचीन हस्तियों में से एक थे. आज उनकी पूण्यतिथि पर उन्हें याद किया गया और दुआ मांगी गई.
बिस्मिल्लाह खां साहब का बनारस प्रेम किसी से छिपा नहीं था. वह यहां मां गंगा को संगीत सुनाते थे. उनकी शहनाई की स्‍वरलहरियां हर सुबह बनारस को संगीत के रंग से सराबोर कर देती थीं. यही वजह थी कि वह बनारस से कभी अलग नहीं हुए. केवल देश बल्कि विदेशों की भी कई हस्तियां उन्हें अपने साथ लेकर जाना चाहती थीं, लेकिन बिस्मिल्लाह खां साहब कहते थे कि आप मुझे ले जा सकते हैं, मेरे परिवार को ले जा सकते हैं लेकिन मेरी गंगा मैय्या और मेरा बनारस कहां से ले जा पाएंगे.

उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान का जन्‍म बिहार के डुमरांव में 21 मार्च 1916 को एक मुस्लिम परिवार में पैगम्बर खां और मिट्ठन बाई के यहां हुआ था. बिहार के डुमरांव के ठठेरी बाजार के एक किराए के मकान में पैदा हुए उस्‍ताद का बचपन का नाम क़मरुद्दीन. उस्‍ताद अपने माता-पिता की दूसरी सन्तान थे. कहा जाता है कि चूंकि उनके बड़े भाई का नाम शमशुद्दीन था, इसलिए उनके दादा रसूल बख्श ने उन्‍हें "बिस्मिल्लाह! नाम से पुकारा, जिसका अर्थ था अच्‍छी शुरुआत और यही नाम ता-उम्र रहा.

छह साल की उम्र में बिस्मिल्ला खां अपने पिता के साथ बनारस आ गए. यहां पर उन्होंने अपने चाचा अली बख्श 'विलायती' से शहनाई बजाना सीखा. उनके उस्ताद चाचा 'विलायती' विश्वनाथ मन्दिर में स्थायी रूप से शहनाई-वादन का काम करते थे.

मां नहीं चाहती थीं उस्ताद शहनाई बजाएं

एक ऐसे दौर में जबकि गाने-बजाने को सम्‍मान की निगाह से नहीं देखा जाता था, तब बिस्मिल्ला ख़ां ने 'बजरी', 'चैती' और 'झूला' जैसी लोकधुनों को अपनी तपस्या और रियाज से खूब संवारा और क्लासिकल मौसिकी में शहनाई को सम्मानजनक स्थान दिलाया. यह बहुत ही कम लोग जानते हैं कि ख़ां साहब की मां कभी नहीं चाहती थी कि उनका बेटा शहनाई वादक बने. वे इसे एक छोटा काम समझती थी. क्‍योंकिउन दिनों शहनाईवादकों को शादी, ब्‍याह और अन्‍य समारोह में बुलाया जाता था.

बनारस से दुनिया भर में गूंजी उस्ताद की शहनाई

उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान की शहनाई की धुन बनारस के गंगा घाट से निकलकर दुनिया के कई देशों में बिखरती रही. उनकी शहनाई अफ़ग़ानिस्तान, यूरोप, ईरान, इराक, कनाडा, पश्चिम अफ़्रीका, अमेरिका, भूतपूर्व सोवियत संघ, जापान, हांगकांग और विश्व भर की लगभग सभी राजधानियों में गूंजती रही. उनकी शहनाई की गूंज से फिल्‍मी दुनिया भी अछूती नहीं रही. उन्होंने कन्नड़ फिल्म ‘सन्नादी अपन्ना’, हिंदी फ़िल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ और सत्यजीत रे की फिल्म ‘जलसाघर’ के लिए शहनाई की धुनें छेड़ी. आखिरी बार उन्होंने आशुतोष गोवारिकर की हिन्दी फिल्म ‘स्वदेश’ के गीत ‘ये जो देश है तेरा’ में शहनाई की मधुर तान बिखेरी.

उस्ताद के जीवन का अर्थ सिर्फ और सिर्फ संगीत था

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की जिंदगी में संगीत-सुर और नमाज़ इन तीन बातों के अलावा दूसरा कुछ न था. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण, तानसेन पुरस्कार से सम्‍मानित उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान को साल 2001 मे भारत के सर्वोच्‍च सम्‍मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया. यकीनन उस्‍ताद के लिए जीवन का अर्थ केवल संगीत ही था. उनके लिए संगीत के अलावा सारे इनाम-इक़राम, सम्मान बेमानी थे. वे संगीत से देश को एकता के सूत्र में पिरोना चाहते थे. वे कहते थे "सिर्फ़ संगीत ही है, जो इस देश की विरासत और तहज़ीब को एकाकार करने की ताक़त रखता है". इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की इच्‍छा रखने वाले उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान की आखिरी इच्‍छा अधूरी ही रही और उन्‍होंने 21 अगस्‍त 2006 को इस दुनिया में अंतिम सांस ली. इसी के साथ उस्ताद और गंगा मैय्या का अटूट रिश्ता भी खत्म हुआ.

(इनपुट: नितिन पांडेय)
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