Varanasi: कोरोनाकाल ने पैदा किए 'किराए के कंधे', 4000 रुपये तक अर्थी उठाने का शुल्क!

काशी में अंतिम संस्कार की अजब तस्वीर सामने आई है. यहां अर्थी को कंधा देने का शुल्क लिया जाने लगा है.

काशी में अंतिम संस्कार की अजब तस्वीर सामने आई है. यहां अर्थी को कंधा देने का शुल्क लिया जाने लगा है.

Varanasi News: काशी में सड़क से गंगा घाट तक सीढ़ियों की संख्या महज 12 से 15 हैं. लेकिन उन सीढ़ियों को पार करके अर्थी को गंगा किनारे चिता तक ले जाने के लिए कंधों का किराया या शुल्क तीन 3000 से 4000 रुपए तक है.

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वाराणसी: धर्मनगरी वाराणसी में अंतिम संस्कार कि जो तस्वीर देखने को मिल रही है, वह चौंकाती भी हैं और शर्मसार भी करती हैं. काशी में अब दाह संस्कार की अंतिम यात्रा के लिए किराए के कंधे लिए जा रहे हैं. कभी मजबूरी में तो कभी खौफ में. धर्म-अध्यात्म और मोक्ष की नगरी काशी में अंतिम यात्रा के दौरान शव को प्रणाम करना और कंधा देना पुण्य और कर्तव्य दोनों माना जाता है. लेकिन कोरोना काल की इस दूसरी लहर में पीढ़ियों पुरानी यह परंपरा अब बदले हुए रूप में दिख रही है.

कई बार अपने स्वजन, परिजन और रिश्तेदार का संक्रमण से हुई मृत्यु के बाद शव लेकर पहुंचने वाले लोगों के पास अर्थी के लिए चार कंधे तक नहीं होते. कई बार घर में और आसपास इतनी मौतें हो चुकी होती हैं कि लोग घाट तक संक्रमण के डर से आना नहीं चाहते. ऐसे में घाट पर कुछ लोग किराए के कंधे से लेकर अंतिम संस्कार तक का पैसा पैकेज के रूप में बताने लगे हैं. इसकी शिकायत इसलिए सुर्ख़ियां नहीं बनती, क्योंकि देने वाला अपनी मर्ज़ी से दे रहा है. प्रशासन ने निशुल्क व्यवस्था की है लेकिन कंधे कहां से लाएं?

सड़क से गंगा घाट तक सीढ़ियों की संख्या महज 12 से 15 हैं. लेकिन उन सीढ़ियों को पार करके गंगा किनारे चिता तक ले जाने के कंधों का किराया या शुल्क तीन 3000 से 4000 रुपए तक है. काशी विद्युत परिषद के महामंत्री प्रोफेसर राम नारायण द्विवेदी बताते हैं कि ऐसे काल की कल्पना उन्होंने कभी नहीं की थी. पितरों को और स्वजनों को कंधा देना पुण्य भी है और फ़र्ज़ भी. शास्त्रों पुराणों में इस पुण्य का अलग अलग तरीके से वर्णन भी है लेकिन लोग मजबूरी में किराए की कंधा ले रहे हैं.

हरीशचंद्र घाट के पास रहने वाले पप्पू गौड़ कहते हैं कि उन्होंने कभी ना तो खुद ऐसा नजारा देखा और ना ही कभी अपने बुजुर्गों से ऐसा सुना कि किसी इंसान को मरने के बाद उसके परिजनों के चार कंधे भी नसीब ना हो. लेकिन फिलहाल कोरोना के दूसरी लहर में ऐसी तस्वीरें भी काशी में देखने को मिल रही हैं, जो चौंकाती हैं.
भले ही कुछ नौजवान और घाट में अन्य लोग किराए का कंधा देने के लिए पैसे लेते  हों लेकिन कबीर की काशी में अमन कबीर जैसे कुछ ऐसे भी नौजवान हैं, जो सेवा भाव से इन शवों का अंतिम संस्कार करते हैं. ना केवल अंतिम संस्कार बल्कि इलाज से लेकर अस्पताल में भर्ती कराने तक अपनी जिम्मेदारी समझते हैं. ना दोष पैसे लेने वालों का है ना दोष कंधा देने से बचने वालों का. डर और मजबूरी के इस माहौल में शायद ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं.

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