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धनतेरस पर काशी में खुलेगी मंदिर की तिजोरी, 4 दिन बंटेगा खजाना

Upendra Dwivedi | News18 Uttar Pradesh
Updated: October 24, 2019, 8:56 PM IST
धनतेरस पर काशी में खुलेगी मंदिर की तिजोरी, 4 दिन बंटेगा खजाना
वाराणसी में अन्नपूर्णा मां का दरबार.

दीवाली (Diwali) पर खजाना बंटने की बात सुनकर आप भले ही हैरान हों लेकिन काशी में ये प्राचीन परंपरा आज भी जीवंत है. खजाना पाने के लिए देश ही नहीं विदेशों से लाखों श्रद्धालु काशी पहुंच गए हैं.

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वाराणसी. शिव की नगरी काशी (Kashi) में धनतेरस (Dhanteras) से तिजोरी खुल जाएगी और अगले चार दिन खजाना बंटेगा. दीवाली (Diwali) पर खजाना बंटने की बात सुनकर आप भले ही हैरान हों लेकिन काशी में ये प्राचीन परंपरा आज भी जीवंत है. खजाना पाने के लिए देश ही नहीं विदेशों से लाखों श्रद्धालु काशी पहुंच गए हैं. चलिए तिजोरी और खजाने को लेकर आपकी जिज्ञासा खत्म कर दी जाए. दरअसल, काशी पुराधिपति विश्वेश्वर महादेव ने काशी समेत दुनिया का पेट भरने के लिए मां अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी थी. इसलिए वाराणसी में श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र में मां अन्नपूर्णा का दरबार स्थित है.

धनतेरस से अन्नकूट तक विशेष दर्शन
यूं तो यहां सालभर भक्त आकर मां से हमेशा अन्न और धन धान्य भरे रखने की प्रार्थना करते हैं. साल भर यहां भक्तों को रजत प्रतिमा के ही दर्शन होते हैं. लेकिन इस मंदिर में मां की सोने की प्रतिमा भी है. जिसके दर्शन साल में सिर्फ 4 दिन होते हैं. ये दर्शन धनतेरस से अन्नकूट तक होते हैं. यही नहीं, इस दौरान सालभर मां के दरबार में जमा खजाना भी इन 4 दिन में भक्तों के बीच बांटा जाता है. ये खजाना सिक्कों और लावा के रूप में होता है. हर साल की तरह इस बार भी धनतेरस पर स्वर्णमयी प्रतिमा के दर्शन के लिए पट खोले जाएंगे.

देश का एकमात्र अन्नपूर्णा मां का मंदिर, जहां बांटा जाता है खजाना

यह देश का एकमात्र अन्नपूर्णा का मंदिर है, जहां धनतेरस से अन्नकूट वाले दिन तक मां का खजाना बांटा जाता है. यहां से मिले सिक्के और धान का लावा लोग तिजोरी और पूजा स्थल पर रखते हैं. मान्यता है कि ऐसा करने से पूरे वर्ष धन-अन्न की कमी नहीं होती. देवी पुराण के अनुसार, मां अन्नपूर्णा का रंग जवापुष्प के समान है. भगवती बंधुक के फूलों के मध्य दिव्य आभूषणों से विभूषित होकर प्रसन्न मुद्रा में स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान हैं. उनके बाएं हाथ में अन्न से पूर्ण माणिक्य, रत्न से जड़ा पात्र तथा दाहिने हाथ में रत्नों से निर्मित कलछुल है. जो प्रतीक है कि माता अन्नदान में सदा तल्लीन रहती हैं.

यहां भगवान शिव मां अन्नपूर्णा से मांगते हैं भिक्षा
यहां मौजूद मां अन्नपूर्णा की स्वर्ण प्रतिमा के साथ शिव की प्रतिमा भी है. यहां भगवान शिव मां अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगते दिखते हैं. इसकी मान्यता को लेकर अन्नपूर्णा मंदिर के महंत रामेश्वर पुरी बताते हैं कि भगवान शंकर से शादी के बाद मां पार्वती ने काशीपुरी में निवास की इच्छा जताई. महादेव उन्हें लेकर अविमुक्त-क्षेत्र काशी आ गए. उस वक्त काशी महाश्मशान नगरी थी. माता पार्वती को यह अच्छा नहीं लगा. तब शिव-पार्वती के बीच बातचीत के बाद ये तय हुआ कि सतयुग, त्रेतायुग, और द्वापर युगों में काशी श्मशान रहेगी किंतु कलिकाल में यह अन्नपूर्णा की पुरी होकर बसेगी. इसी कारण वर्तमान में अन्नपूर्णा का मंदिर काशी का प्रधान देवीपीठ हुआ.
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पुराणों में काशी के भावी नामों में काशीपीठ नाम का भी उल्लेख है. स्कन्दपुराण के ‘काशीखण्ड’ में ये लिखा है कि भगवान विश्वेश्वर महादेव गृहस्थ हैं और भवानी उनकी गृहस्थी चलाती हैं. काशी उनका परिवार है. काशीवासियों के योग-क्षेम का भार इन्हीं पर है. ‘ब्रह्मवैवर्त्तपुराण’ के काशी-रहस्य के अनुसार भवानी ही अन्नपूर्णा हैं. सामान्य दिनों में अन्नपूर्णा माता की आठ परिक्रमा की जाती है. प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन अन्नपूर्णा देवी के निमित्त व्रत रह कर उनकी उपासना का विधान है. इन्हें अन्न अधिष्ठात्रि भी माना जाता है.

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First published: October 24, 2019, 7:39 PM IST
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