वाराणसी: भारत की सबसे पुरानी धार्मिक नगरी, जो संगीत और शिक्षा के साथ सियासत में भी रखती है बड़ी दखल

वाराणसी (Photo: Twitter)
वाराणसी (Photo: Twitter)

भोले की नगरी वाराणसी (Varanasi) देश की सबसे पुरानी नगरी मानी जाती है. हिंदू धर्म के लिए ये सबसे पवित्र नगर है. ये नगर भारतीय संस्कृति, कला और शिक्षा का ध्वजवाहक रहा. सैकड़ों वर्षों से ये शहर अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 22, 2020, 12:24 AM IST
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वाराणसी. उत्तर प्रदेश का सबसे प्रसिद्ध नगर वाराणसी (Varanasi) है, इसे बनारस (Banaras) या काशी  (Kashi) भी कहा जाता है. हिन्दू धर्म में ये शहर सबसे पवित्र नगरों में माना जाता है. बौद्ध और जैन धर्म में भी बनारस को पवित्र माना जाता है. खास बात ये है कि ये नगर संसार के प्राचीनतम बसे शहरों में से एक है.  काशी नरेश (काशी के महाराजा) वाराणसी शहर के मुख्य सांस्कृतिक संरक्षक एवं सभी धार्मिक क्रिया-कलापों के अभिन्न अंग हैं. वाराणसी की संस्कृति का गंगा नदी एवं इसके धार्मिक महत्त्व से अटूट रिश्ता है. ये शहर सैकड़ों वर्षों से भारत का, विशेषकर उत्तर भारत का सांस्कृतिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना वाराणसी में ही जन्मा एवं विकसित हुआ है.

बनारस को लोग मंदिरों का शहर, भारत की धार्मिक राजधानी, भगवान शिव की नगरी, दीपों का शहर, आदि विशेषण भी देते हैं. प्रसिद्ध अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन लिखते हैं कि “बनारस इतिहास से भी पुरातन है, परंपराओं से पुराना है, किंवदंतियों से भी प्राचीन है और जब इन सबको एकत्र कर दें, तो उस संग्रह से भी दोगुना प्राचीन है.”

विभूतियां



काशी में प्राचीन काल से समय-समय पर अनेक महान विभूतियों का वास होता रहा हैं. इनमें महर्षि अगस्त्य, धन्वंतरि, गौतम बुद्ध, संत कबीर, अघोराचार्य बाबा कानीराम, रानी लक्ष्मीबाई, पाणिनी, पार्श्वनाथ, पतंजलि, संत रैदास, स्वामी रामानन्दाचार्य, वल्लभाचार्य, शंकराचार्य, गोस्वामी तुलसीदास, महर्षि वेदव्यास.
शास्त्रीय संगीत का जन्म स्थान, कई दिग्गजों की कर्मभूमि

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना वाराणसी में ही जन्मा एवं विकसित हुआ है. भारत के कई दार्शनिक, कवि, लेखक, संगीतज्ञ वाराणसी में रहे हैं, जिनमें कबीर, वल्लभाचार्य, रविदास, स्वामी रामानंद, त्रैलंग स्वामी, शिवानन्द गोस्वामी, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पंडित रवि शंकर, गिरिजा देवी, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया एवं उस्ताद बिस्मिल्लाह खां आदि कुछ प्रमुख हैं. गोस्वामी तुलसीदास ने हिन्दू धर्म का परम-पूज्य ग्रंथ रामचरितमानस यहीं लिखा था और गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन बनारस के ही पास सारनाथ में दिया था.

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वाराणसी के प्रसिद्ध गंगा आरती (Courtsey: Twitter)




शिक्षा में अलग पहचान

वाराणसी में 4 बड़े विश्वविद्यालय हैं- बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU), महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइयर टिबेटियन स्टडीज़ और संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय. यहां के निवासी मुख्यतः काशिका भोजपुरी बोलते हैं, जो हिन्दी की ही एक बोली है.

आबादी

बनारस की आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार 36,76,841 है. इसमें पुरुष 19,21,857 और महिलाएं 17,54,984 हैँ. इसमें ग्रामीण आबादी 20,79,790 है, जबकि शहरी आबादी 15,97,051 है. लिंगानुपात की बात करें तो यहां 1000 पुरुषों पर 913 महिलाएं हैं. वहीं हर हजार किलोमीटर पर 2395 लोगों का जनसंख्या घनत्व है. वाराणसी में साक्षरता दर 75.60 प्रतिशत है, इसमें पुरुष ज्यादा पढ़े लिखे हैं. उनका प्रतिशत 83.77 है, जबकि महिलाओं का प्रतिशत 66.69 प्रतिशत है.

व्यवस्था

वाराणसी में 3 तहसील हैं, 8 ब्लॉक हैं. न्याय पंचायत यहां 108 हैं, जबकि ग्राम पंचायतों की संख्या 760 है. कुल 1327 गांव इसके अंतर्गत आते हैं. यहां नगर निगम, नगर पालिका परिषद, नगर पंचायत और छावनी परिषद 1-1 है. पुलिस स्टेशन कुल 25 हैं, जिनमें 9 ग्रामीण इलाकों में जबकि 16 शहरी इलाकों में हैं.

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बीएचयू (Courtsey: Twitter)


वाराणसी नाम को लेकर तरह-तरह के तथ्य



वाराणसी नाम की शुरुआत यहां की दो स्थानीय नदियों वरुणा नदी एवं असि नदी के नाम से मिलकर मानी जाती है. ये नदियां गंगा नदी में आकर मिलती हैं. लंबे काल से वाराणसी को अविमुक्त क्षेत्र, आनंद-कानन, महाश्मशान, सुरंधन, ब्रह्मावर्त, सुदर्शन, रम्य, एवं काशी नाम से भी संबोधित किया जाता रहा है. ऋग्वेद में शहर को काशी या कासी नाम से बुलाया गया है. इसे प्रकाशित शब्द से लिया गया है, जिसका अभिप्राय शहर के ऐतिहासिक स्तर से है, क्योंकि ये शहर सदा से ज्ञान, शिक्षा एवं संस्कृति का केन्द्र रहा है. काशी शब्द सबसे पहले अथर्ववेद की पैप्पलाद शाखा से आया है और इसके बाद शतपथ में भी उल्लेख है. स्कंद पुराण के काशी खण्ड में नगर की महिमा 15000 श्लोकों में कही गई है.

अथर्ववेद में वरणावती नदी का नाम आया है, जो बहुत संभव है कि आधुनिक वरुणा नदी के लिये ही प्रयोग किया गया हो. अस्सी नदी को पुराणों में असिसंभेद तीर्थ कहा है. स्कंद पुराण के काशी खंड में कहा गया है कि संसार के सभी तीर्थ मिल कर असिसंभेद के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होते हैं. अग्निपुराण में असि नदी को व्युत्पन्न कर नासी भी कहा गया है. वरणासि का पदच्छेद करें तो नासी नाम की नदी निकाली गई है, जो कालांतर में असी नाम में बदल गई.

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वाराणसी (Courtsey: Twitter)


महाभारत में वरुणा नदी का प्राचीन नाम वरणासि होने की पुष्टि होती है. अतः वाराणसी शब्द के दो नदियों के नाम से बनने की बात बाद में बनायी गई है. इन उद्धरणों से यही ज्ञात होता है कि वास्तव में नगर का नामकरण वरणासी पर बसने से हुआ. अस्सी और वरुणा के बीच में वाराणसी के बसने की कल्पना उस समय से उदय हुई, जब नगर की धार्मिक महिमा बढ़ी और उसके साथ-साथ नगर के दक्षिण में आबादी बढ़ने से दक्षिण का भाग भी उसकी सीमा में आ गया.

इतिहास

पौराणिक कथाओं के अनुसार, काशी नगर की स्थापना हिन्दू भगवान शिव ने लगभग 5000 वर्ष पूर्व की थी. ये एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल है. ये हिन्दुओं की पवित्र सप्तपुरियों में से एक है. स्कन्द पुराण, रामायण, महाभारत और प्राचीनतम वेद ऋग्वेद सहित कई हिन्दू ग्रन्थों में इस नगर का उल्लेख आता है. ये नगर मलमल और रेशमी कपड़ों, इत्रों, हाथी दांत और शिल्प कला के लिये व्यापारिक एवं औद्योगिक केन्द्र रहा. गौतम बुद्ध के समय वाराणसी काशी राज्य की राजधानी हुआ करता था. बनारस के दशाश्वमेध घाट के समीप बने शीतला माता मंदिर का निर्माण अर्कवंशी क्षत्रियों ने करवाया था. प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने नगर को धार्मिक, शैक्षणिक एवं कलात्मक गतिविधियों का केन्द्र बताया है और इसका विस्तार गंगा नदी के किनारे 5 किलोमीटर तक लिखा.

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वाराणसी के घाट (Courtsey: Twitter)


काशी राज्य और काशी नरेश

वाराणसी 18वीं शताब्दी में स्वतंत्र काशी राज्य बन गया और बाद के ब्रिटिश शासन के अधीन, ये प्रमुख व्यापारिक और धार्मिक केन्द्र रहा. 1910 में ब्रिटिश प्रशासन ने वाराणसी को एक नया भारतीय राज्य बनाया और रामनगर को इसका मुख्यालय बनाया. काशी नरेश अभी भी रामनगर किले में रहते हैं. ये किला वाराणसी नगर के पूर्व में गंगा के तट पर बना हुआ है. काशी नरेश का एक अन्य महल चैत सिंह महल है. ये शिवाला घाट के निकट महाराजा चैत सिंह ने बनवाया था.

रामनगर किला और इसका संग्रहालय अब बनारस के राजाओं की ऐतिहासिक धरोहर रूप में संरक्षित हैं और 18वीं शताब्दी से काशी नरेश का आधिकारिक आवास रहा है. आज भी काशी नरेश नगर के लोगों में सम्मानित हैं. ये नगर के धार्मिक अध्यक्ष माने जाते हैं और यहां के लोग इन्हें भगवान शिव का अवतार मानते हैं. नरेश नगर के प्रमुख सांस्कृतिक संरक्षक एवं सभी बड़ी धार्मिक गतिविधियों के अभिन्न अंग रहे हैं.

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रामनगर किला (Courtsey: Twitter)


वाराणसी की नदियां

वाराणसी या काशी का विस्तार गंगा नदी के दो संगमों एक वरुणा नदी से और दूसरा असी नदी से संगम के बीच बताया जाता है. इन संगमों के बीच की दूरी लगभग करीब ढाई मील है. इस दूरी की परिक्रमा हिन्दुओं में पंचकोसी परिक्रमा कहलाती है. इस यात्रा का समापन साक्षी विनायक मंदिर में किया जाता है. वाराणसी क्षेत्र में अनेक छोटी बड़ी नदियां बहती हैं. गंगा के अलावा बानगंगा, वरुणा, गोमती, करमनासा, गड़ई, चंद्रप्रभा प्रमुख हैं.

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काशी विश्वनाथ मंदिर (File Photo)


अर्थ-व्यवस्था

वाराणसी में विभिन्न कुटीर उद्योग हैं, जिनमें बनारसी रेशमी साड़ी, कपड़ा उद्योग, कालीन उद्योग एवं हस्तशिल्प प्रमुख हैं. बनारसी पान की अपनी अलग पहचान है, यहां का कलाकंद भी मशहूर है. बनारसी रेशम विश्व भर में अपनी महीनता और मुलायम होने के लिये प्रसिद्ध है. बनारसी रेशमी साड़ियों पर बारीक डिज़ाइन और ज़री का काम चार चांद लगाते हैं और साड़ी की शोभा बढ़ाते हैं. इस कारण ही ये साड़ियां वर्षों से सभी पारंपरिक उत्सवों एवं विवाह आदि समारोहों में पहनी जाती रही हैं. कुछ समय पूर्व तक ज़री में शुद्ध सोने का काम हुआ करता था. भारतीय रेल का डीजल रेल इंजन कारखाना भी वाराणसी में स्थित है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (File Photo)


राजनीति

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये संसदीय क्षेत्र है. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने यहां से जीत दर्ज की. 1952, 1957 और 1962 में यहां से कांग्रेस के रघुनाथ सिंह लगातार जीते. उसके बाद 1967 में ये सीट भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सत्य नारायण सिंह के पास चली गई. 1971 में कांग्रेस ने यहां वापसी की और राजाराम शास्त्री विजेता रहे. लेकिन 1977 में  चंद्रशेखर, इंडियन नेशनल लोकदल से विजयी हुए.

1980 में कांग्रेस आई से कमलापति त्रिपाठी विजेता रहे, फिर 1984 में कांग्रेस के श्याम लाल यादव जीतकर संसद पहुंचे. 1989 में जनता दल के अनिल कुमार शास्त्री के बाद 1991 पहली बार बीजेपी ने यहां श्रीश चंद्र दीक्षित की अगुवाई में जीत दर्ज की. 1996, 1998 और 1999 में बीजेपी के शंकर प्रसाद जायसवाल जीते फिर 2004 में कांग्रेस के डॉ राजेश कुमार मिश्रा यहां से जीते. इसके बाद 2009 में मुरली मनोहर जोशी की अगुवाई में बीजेपी ने यहां वापसी की और नरेंद्र मोदी लगातार दो बार से जीत रहे हैं.

वाराणसी में 5 विधानसभा क्षेत्र हैं, इनमें रोहनिया, वाराणसी उत्तर, वाराणसी दक्षिण, वाराणसी छावनी और सेवापुरी प्रमुख हैं.

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संकटमोचन हनुमान मंदिर (Courstey: Twitter)


धर्म

वाराणसी में करीब 70 प्रतिशत आबादी हिंदू है, वहीं करीब 28 फीसदी आबादी मुस्लिमों की है. इनके अलावा क्रिश्चियन, सिख, जैन और बौद्ध लोग हैं. वाराणसी में करीब 3300 हिंदू मंदिर बताए जाते हैं, वहीं 12 चर्च, 3 जैन मंदिर, 9 बौद्ध स्थल और 3 गुरुद्वारा हैं.

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सारनाथ (File Photo)


पुरातत्व के लिहाज से अनमोल है वाराणसी

वाराणसी में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की 19 साइट हैं इनमें अघोर पीठ, आलमगीर मस्जिद, अशोक स्तंभ, भारत कला भवन, भारत माता मंदिर, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ तिब्बतन स्टडीज, धनवंतरि मंदिर, दुर्गा मंदिर, जंतर मंतर, काशी विश्वनाथ मंदिर, संकट मोचन हनुमान मंदिर, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, बीएचयू कैंपस को श्री विश्वनाथ मंदिर, रामनगर किला, बनारस के घाट और तुलसी मानस मंदिर.

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काशी विश्वनाथ कॉरिडोर पर लगातार चल रहा काम (File Photo)


वाराणसी के घाट

वाराणी के अधिकतर घाट अलग-अलग राजाओं ने बनाए हैं. इनमें मराठा, सिंधिया, होल्कर, भोंसले और पेशवा शामिल हैं. इन घाटों की वजह से ही बनारस की सुबह की खूबसूरती हर जगह बयां की जाती है. वाराणसी का सबसे पुराना घाट दशाश्वमेध घाट माना जाता है. ये काशी विश्वनाथ मंदिर के करीब है. वहीं मणिकर्णिका घाट महाश्मशान है. इसका हिंदू मान्यताओं में विशेष स्थान है.

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मणिकर्णिका घाट (Courtsey: Twitter)


काशी विश्वनाथ मंदिर

वाराणसी के करीब 23000 मंदिर में काशी विश्वनाथ मंदिर का विशेष स्थान है. ये मंदिर हिंदू धर्म की पवित्र 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है. ये मंदिर कई भी आक्रांताओं ने तोड़ और इसे कई बार दोबारा बनाया गया. मंदिर के साथ ही ज्ञानवापी मस्जिद है. कहा जाता है कि मस्जिद मंदिर की ही मूल जगह पर बनाई गई है. आज जो मंदिर है, वह 1780 में इंदौर की अहिल्याबाई होल्कर ने बनवाया था. यहां 1839 में पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह ने सोना दान दिया था. ज्ञानवापी मस्जिद को मुगल शासक औरंगजेब ने मंदिर तोड़कर बनवाया था. इसके अलावा यहां आलमगिरी मस्जिद है, इसे भी औरंगजेब ने मंदिर तोड़कर बनवाया था.

इनपुट- विकीपीडिया
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