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    काशी के इस ब्लड कमांडो के मुरीद हैं PM मोदी, कोरोना काल में कई लोगों की बचाई जान

    काशी के इस ब्लड कमांडो के मुरीद हैं PM मोदी
    काशी के इस ब्लड कमांडो के मुरीद हैं PM मोदी

    सौरभ (Saurabh) ने बताया कि 1990 में उनकी दादी को ब्लड कैंसर हुआ था. पिता उदय नारायण मौर्या को उस समय ब्लड के लिए परेशान होना पड़ा था.

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    वाराणसी. पूरा देश कोरोना (Coronavirus) के खात्मे की लड़ाई में जुटा हुआ है. आम हो या खास, सभी लोग अपने-अपने तरीके से इस जंग में जिम्मेदारी निभा रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM (Narendra Modi) के संसदीय क्षेत्र वाराणसी (Varanasi) में अलग-अलग तस्वीर देखने को मिल रही हैं. वाराणसी के रहने वाले सौरभ मौर्या भारत में सबसे ज्यादा प्लेटलेट दान करने वाले पहले भारतीय बने है. कोरोना महामारी में सौरभ ने जरूरतमंदों के लिए प्लेटलेट्स दान किया. दान भी कुछ ऐसा किया जो अब एक इतिहास बन गया है.

    इनके ब्लड और प्लेटलेट्स की दान करने का जुनून इसी से पता चल सकता है कि अब तक अपने युवाकाल में सौरभ ने 42 बार प्लेटलेट्स और 52 बार ब्लड डोनेट किया है. ये जुनून उनका कोरोना काल में भी जारी रहा. जिसके कारण इन्हें ब्लड कमांडो का नाम दिया गया तो वही इनका नाम इंडियन बुक ऑफ रिकार्ड्स में भी दर्ज किया गया. सौरभ बताते हैं कि इन्हें समाजसेवा में सेवा का भाव कई लोग अपने अपने तरीके से निभाते हैं.

    पीएम मोदी ने दी बधाई
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    लेकिन मुझे जब सेवा का भाव उत्पन्न हुआ तो उस वक्त इनकी उम्र मात्र 20 वर्ष थी और तब इन्होंने पहली बार ब्लड डोनेट किया था. तब से ये आजतक लोगों की सेवा अपने खून से करते आ रहे हैं. इनकी सेवा को देखते हुए पीएम मोदी ने भी इन्हें पत्र लिखकर शुभकामानाएं दी थी और इनके द्वारा इस कार्य के लिए इन्हें धन्यवाद भी दिया. समाजसेवी सौरभ ने कहा- अगर मेरे किसी अंग की जरूरत अनुसंधान के लिए पड़े तो मैं तैयार हूं। मेरा शरीर राष्ट्र को समर्पित है. करोड़ों लोगो को बचाने के लिए मेरा शरीर काम आए तो कम है.
    कुछ ऐसे जागी रक्तदान की अलख
    सौरभ ने बताया कि 1990 में उनकी दादी को ब्लड कैंसर हुआ था. पिता उदय नारायण मौर्या को उस समय ब्लड के लिए परेशान होना पड़ा था. 2010 में बीएचयू में एक थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चे के पिता को रोते देखा तो मुझे अपने पिता की याद आ गई थी. यहीं पर पहली बार ब्लड डोनेट किया था. लेकिन, बच्चे की जान नहीं बची. इसके बाद दोस्तो संग मिलकर संस्था बनाई. 2015 तक घर वाले भी ब्लड डोनेट से मना करते थे. इसी साल पापा बीमार पड़े, तब उन्हें ब्लड की व्यवस्था की. उसके बाद परिवार को रक्तदान का महत्व समझ में आया.
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