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ईशान कोण से दिखने लगा काशी विश्वनाथ का स्वर्ण शिखर, PM मोदी करेंगे भूमि पूजन

News18 Uttar Pradesh
Updated: March 7, 2019, 4:57 PM IST
ईशान कोण से दिखने लगा काशी विश्वनाथ का स्वर्ण शिखर, PM मोदी करेंगे भूमि पूजन
काशी विश्वनाथ मंदिर का शिखर ईशान कोण से दिखने लगा है.

बाबा विश्वनाथ मंदिर का स्वर्णशिखर अब दूर से ही दिख रहा है. यह वही शिखर है, जिसको अब तक ऊंची इमारतों के चलते कुछ दूरी से भी देखना मुश्किल था.

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वाराणसी में निर्माणाधीन काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर अब काशी विश्वनाथ धाम के नाम से जाना जाएगा. आठ मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसकी आधारशिला रखते हुए भूमिपूजन करेंगे. रानी अहिल्याबाई के बाद लगभग 250 साल बाद ये दूसरा मौका है, जब काशी विश्वनाथ मंदिर का विस्तार हो रहा है. जबकि पहला ऐसा मौका होगा, जब विश्व के नाथ विश्वेश्वर महादेव के दर्शन ईशान कोण समेत सभी दिशाओं से होंगे.

क्या है ईशान कोण का महत्व?
बाबा विश्वनाथ मंदिर का स्वर्णशिखर अब दूर से ही दिख रहा है. यह वही शिखर है, जिसको अब तक ऊंची इमारतों के चलते कुछ दूरी से भी देखना मुश्किल था. लेकिन अब जब काशी विश्वनाथ धाम बनाने के लिए इन इमारतों को खरीदकर तोड़ा गया तो स्वर्ण शिखर उस ईशान कोण से भी दिखने लगा. इसका महत्व वेद पुराणों में भी है. आपके मन में जिज्ञासा होगी कि ये ईशान कोण का धार्मिक महत्व क्या है. दरअसल, भगवान शंकर का एक नाम ईशान भी है. यही नहीं, मंदिर में बाबा विश्वनाथ स्वयं ईशान कोण में ही मां पार्वती के संग विराजमान हैं. धार्मिक मान्यता है कि बाबा के दर्शन का लाभ तब तक पूरा नहीं मिलता, जब तक उनके शिखर के दर्शन न हो जाएं. वह भी अब शिव के शिखर ईशान कोण से हों तो उसका महत्व और फल कई गुना बढ़ जाता है.

ईशान कोण का महत्व खुद ज्योतिषाचार्य भी मानते हैं. वास्तु शास्त्र के अनुसार उत्तर पूर्व दिशा को शुभ माना जाता है. इन दोनों दिशाओं के मिलन का कोण ही ईशान कहलाता है. इस कोण का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इस क्षेत्र में देवताओं के गुरु बृहस्पति और मोक्ष कारक केतु का भी वास होता है.

श्रीकाशी विश्वनाथधाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट है. आठ मार्च को पीएम के द्वारा इसका भूमि पूजन करने के बाद पहले और तीसरे चरण के काम की नींव रखी जाएगी. परियोजना के लिए करीब 18 हजार वर्गमीटर जमीन का समतलीकरण किया जा चुका है. सबसे पहले गंगा से काशी विश्वनाथ मंदिर के रास्ते को भव्य स्वरूप दिया जाएगा.

करीब 39 हजार वर्गमीटर में तैयार होने वाले इस प्रोजेक्ट का मॉडल तैयार कर लिया गया है. चार चरणों में काम पूरा होगा. पहले चरण में मंदिर परिसर और तीसरे चरण में गंगा घाट क्षेत्र को विकसित किया जाएगा. तीसरे चरण का काम आठ मार्च से ही शुरू हो जाएगा. इसमें गंगा तट पर स्थित नेपाली मंदिर से लेकर ललिता घाट, जलासेन घाट और मणिकर्णिका घाट के आगे सिंधिया घाट तक का हिस्सा शामिल है.

अगर मोटे तौर पर समझा जाए तो अब तक आपको काशी के घाटों से गंगा जल लेकर बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक करना पड़ता था, जिसमें पहले आप सड़क के जाम से जूझते थे, फिर तंग गलियों में भीड़ से घिरकर असहज भी होना पड़ता था. इसमें श्रद्धालुओं को दिक्कत भी होती थी और समय भी खर्च होता था. लेकिन अब आप जलासेन घाट के आसपास से जल लेकर महज तीन सौ मीटर की दूरी पर स्थित बाबा विश्वनाथ को जल चढ़ा सकेंगे. यही नहीं, गंगा और शिव को करीब 41 मंदिरों की मणिमाला आपस में जोड़ेगी. एक तरीके से पुराणों में वर्णित आनंदवन की तरह मंदिरों का एक संकुल होगा, जिसमें शिव भी होंगे, मां गौरा और अन्नपूर्णा भी होंगी और प्रथम पूज्य गणेश भी होंगे.
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भूमि पूजन के साथ ही मंदिर का क्षेत्रफल भी बढ़ जाएगा. इसके लिए सुरक्षा व्यवस्था को भी नए सिरे से कसने का काम शुरू हो गया है. साथ ही यहां तैनात पुलिसकर्मी सुरक्षा के लिए सख्त हो और श्रद्धालुओं के लिए मित्र, इसके लिए ट्रेनिंग देने का भी काम होगा.

फिलहाल जमीन का समतलीकरण हो जाने के बाद अस्थाई तौर पर श्रद्धालु यहां गंगा जल लेकर बाबा दरबार तक पहुंचना शुरू हो गए हैं. बाबा दरबार के नए स्वरूप को लेकर श्रद्धालु काफी उत्साहित हैं.

(रिपोर्ट: उपेंद्र द्विवेदी)

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First published: March 7, 2019, 4:00 PM IST
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