गुजराती खादी पहनकर बाबा विश्वनाथ करेंगे रंगोत्सव का आगाज, इतिहास सुनकर आप चौंक जाएंगे


बाबा की रेशमी पगड़ी लल्लापुरा निवासी गयासुद्दीन और उनके परिवार के सदस्य तैयार करते हैं.

बाबा की रेशमी पगड़ी लल्लापुरा निवासी गयासुद्दीन और उनके परिवार के सदस्य तैयार करते हैं.

काशी में रंगोत्सव के अलग-अलग रंग दिखाई देते हैं. इस बार 24 मार्च को वो शुभ मुहुर्त है. इस बार गौने की बारात में बाबा विश्वनाथ गुजराती खादी धारण करेंगे और सिर पर अकबरी पगड़ी पहनेंगे. वही दुल्हन के रूप में मां पार्वती इस बार बनारसी साड़ी पहनेंगी.

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वाराणसी. काशी में पीढ़ियों पुरानी प्राचीन परंपरा है कि रंगभरी एकादशी से रंगोत्सव का आगाज होता है. इसकी शुरुआत खुद काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ शिवरात्रि के बाद उस वक्त करते हैं, जब वो मां गौरा को विदा कराकर लाते हैं. यानी बाबा के गौने की बारात. उसी दिन काशीवासी संग खुशी में होली खेली जाती है और उस दिन से बुढ़वा मंगल तक काशी में रंगोत्सव के अलग-अलग रंग दिखाई देते हैं. इस बार 24 मार्च को वो शुभ मुहुर्त है. खास बात ये है कि इस बार गौने की बारात में बाबा विश्वनाथ गुजराती खादी धारण करेंगे और सिर पर अकबरी पगड़ी पहनेंगे. वही दुल्हन के रूप में मां पार्वती इस बार बनारसी साड़ी पहनेंगी.

तेल हल्दी से गौना बारात तक ये रहेगा कार्यक्रम

गौना बारात की तैयारियां अंतिम दौर में है. श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डा. कुलपति तिवारी ने बताया कि 21 मार्च को गीत गवना, 22 मार्च को गौरा का तेल-हल्दी होगा. 23 मार्च को बाबा का ससुराल आगमन होगा. बाबा के ससुराल आगमन के मौके पर महंत परिवार के सदस्य सहित 11 ब्राह्मणों द्वारा स्वतिवाचन, वैदिक घनपाठ और दीक्षित मंत्रों से बाबा की आराधना कर उन्हें रजत सिंहासन पर विराजमान कराया जाएगा. 24 मार्च को मुख्य अनुष्ठान ब्रह्म मुहूर्त में शुरु होगा. भोर में चार बजे 11 ब्राह्मणों द्वारा बाबा का रुद्राभिषेक होगा. सुबह छह बजे बाबा को पंचगव्य से स्नान कराया जाएगा. सुबह साढ़े छह बजे बाबा का षोडषोपचार पूजन होगा. सुबह सात से नौ बजे तक महंत परिवार के सदस्यों द्वारा लोकाचार किया जाएगा. नौ बजे से बाबा का श्रंगार चालू होगा. बाबा की आंखों में लगाने के लिए काजल, विश्वनाथ मंदिर के खप्पड़ से लाया जाएगा. गौर के माथे पर सजाने के लिए सिंदूर परंपरानुसार अन्नपूर्णा मंदिर के मुख्य विग्रह से लाया जाएगा. टेढ़ीनीम स्थित नवीन महंत आवास के भूतल स्थित हॉल में बाबा को विराजमान कराया जाएगा. दोपहर 11:30 बजे भोग और महाआरती होगी . बाबा के गौना के लिए 151 किलो गुलाब का अबीर खासतौर से मथुरा से मंगाया गया है.

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इससे पहले बाबा की पालकी पर उड़ाने के लिए 51 किलो अबीर मथुरा से मंगाया जाता था. बीते 357 सालों के इतिहास में यह दूसरा मौका है जब बाबा की पालकी को मंदिर तक पहुंचाने के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक दूरी तय करनी होगी. पहले मंदिर और महंत आवास आमने-सामने होने के कारण सिर्फ 25 से 30 कदम की बारात होती थी. पिछले साल से टेढ़ीनीम से साक्षी विनायक, कोतलवालपुरा, ढुंढिराज गणेश, अन्नपूर्णा मंदिर होते हुए बाबा की पालकी मुख्य द्वार से विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश करने लगी है. यह दूरी कम से कम साढ़े चार सौ मीटर होगी. पालकी यात्रा में डमरूदल और शंखनाद करने वाले 108 सदस्य भी शामिल होंगे. नादस्वरम् और बंगाल का ढाक भी बाबा की पालकी यात्रा में गूंजेंगे.

साल 1934 से बाबा पहनते हैं खादी

बाबा को खादी का वस्त्र पहनाने की शुरुआत साल 1934 में पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की मां स्वरूपरानी की पहल पर हुई. बताया जाता है कि साल 1933 में रंगभरी एकादशी के मौके पर स्व स्वरूपरानी नेहरू दर्शन करने पहुंची और उन्होंने तत्कालीन महंत महावीर प्रसाद तिवारी से बाबा की रजत प्रतिमा को खादी धारण कराने का अनुरोध किया था. पूर्व महंत डा कुलपति तिवारी ने बताते हैं कि बुजुर्गो से सुना है कि उन दिनो हर देशवासी के मन में स्वदेशी का भाव उबाल मार रहा था. इसलिए तत्कालीन महंत महावीर प्रसाद तिवारी ने उनका प्रस्ताव स्वीकार करते हुए अगले साल यानी 1934 से बाबा को खादी धारण कराने का ऐलान किया. तब से ये परंपरा चली आ रही है.



मुस्लिम तैयार करते हैं बाबा की पगड़ी

बाबा की रेशमी पगड़ी लल्लापुरा निवासी गयासुद्दीन और उनके परिवार के सदस्य तैयार करते हैं. गयासुद्दीन का परिवार बीते सात पुश्तों से बाबा की पगड़ी तैयार कर रहा है.
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