'प्लान गंगाजल' से हारेगा कोरोना वायरस! BHU के रिसर्च में मिला इलाज का कारगर तरीका
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'प्लान गंगाजल' से हारेगा कोरोना वायरस! BHU के रिसर्च में मिला इलाज का कारगर तरीका
बीएचयू के शोधकर्ताओं ने अपनी रिसर्च में पता लगाया है कि गंगा नदी के पानी में ऐसे तत्व हैं जो कोरोना वायरस से लड़ने में कारगर है

काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में हुए रिसर्च के बाद यह दावा किया जा रहा है कि गंगाजल (Gangajal) में मौजूद बैक्टीरियोफेज यानी जीवाणुभोजी में कोरोना (Corona Virus) को शिकस्त देने का माद्दा है

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 15, 2020, 7:44 PM IST
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वाराणसी. चीन के वुहान (Wuhan) शहर से निकले कोरोना वायरस (Corona Virus) से समस्त विश्व खतरे में है. इस महामारी का अभी तक कोई ठोस और कारगर वैक्सीन (Covid-19 Vaccine) नहीं ढूंढा जा सका है. कोरोना वायरस (Covid-19) के खात्मे और असर को कम करने के लिए दुनिया के अलग-अलग देशों में लगातार शोध हो रहे हैं. दवाइयों और वैक्सीन के ट्रायल (Vaccine Trial) चल रहे हैं. कुछ देशों ने ट्रायल कामयाब होने के दावे किए हैं लेकिन इन सबके बीच धर्मनगरी वाराणसी से मोक्षदायिनी गंगा को लेकर बड़ा शोध हुआ है. काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में हुए रिसर्च के बाद यह दावा किया जा रहा है कि गंगाजल में मौजूद बैक्टीरियोफेज यानी जीवाणुभोजी में कोरोना को शिकस्त देने का माद्दा है.

इस रिसर्च टीम के लीडर और बीएचयू के पूर्व एमएस डॉ. विजयनाथ मिश्र की मानें तो एक ओर जहां इस रिसर्च के ह्यूमन ट्रायल की तैयारियां हैं तो दूसरी ओर इंटरनेशनल जर्नल ऑफ माइक्रोबायोलॉजी के आगामी अंक में इसको जगह देने का स्वीकृति पत्र भी मिलने की खबर है. रिसर्च में इस बात का भी अध्ययन किया गया है कि गंगा किनारे बसे शहरों में वो लोग जो प्रतिदिन गंगा स्नान करते हैं या फिर किसी न किसी तरीके से गंगाजल ग्रहण करते हैं, उन पर संक्रमण का प्रभाव कम दिखा. यही नहीं, गंगा किनारे के चालीस के करीब शहरों में या तो कोरोना संक्रमण के केस कम आए या फिर रिकवर होने की क्षमता अन्य जगहों के मुकाबले ज्यादा रही.

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बीएचयू के इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में हुए रिसर्च के बाद यह दावा किया जा रहा है कि गंगाजल में मौजूद बैक्टीरियोफेज यानी जीवाणुभोजी में कोरोना को शिकस्त देने का माद्दा है





गंगाजल में ए-बायोटिकफेज की मात्रा सबसे बेहतर और ज्यादा हो

रिसर्च के शुरुआती अध्ययन में गंगाजल के इस महत्व के सामने आने के बाद यह पता करना भी एक चुनौती था कि गौमुख से गंगासागर तक किस जगह गंगाजल में सबसे ज्यादा ए-बायोटिकफेज की मात्रा सबसे बेहतर और ज्यादा हो. ए-बायोटिकफेज का मतलब ऐसे बैक्टीरियोफेजी जिनकी खोज अब तक किसी बीमारी के इलाज में नहीं हुई हो. इसके लिए करीब सौ जगह पर रिसर्च किया गया. रिचर्स के बाद गंगोत्री से करीब 35 किलोमीटर नीचे गंगनानी में मिलने वाले गंगाजल चिन्हित हुआ और इसे ह्यूमन ट्रायल में प्रयोग किए जाने की तैयारी तेज हो गई है.

ह्यूमन ट्रायल में बिना दवा से छेड़छाड़ किए आधे लोगों की नाक में गंगनानी का गंगा जल और बाकी को सादा डिस्टल वाटर डाला जाएगा. रिजल्ट को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) को भेजा जाएगा.

बता दें कि अब तक जो कुछ भी इस रिचर्स में हुआ, उसकी सिलसिलेवार रिपोर्ट आईएमएस की एथिकल कमेटी को भी भेजी गई है. कमेटी की मंजूरी के बाद कोरोना संक्रमितों पर फेज थेरेपी का ट्रायल शुरू होगा. लॉकडाउन के दौरान बीएचयू के प्रोफेसर और डाक्टर वायरोफेज नाम से इस रिसर्च में जुटे हैं. इस टीम में न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विजयनाथ मिश्र के साथ न्यूरोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर चौरसिया भी शामिल रहे.
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