कौन हैं गोपाल सिंह विशारद, जिन्होंने राम मंदिर को लेकर किया था पहला मुकदमा

राम मंदिर मामले को लेकर पहला केस करने वाले गोपाल सिंह विशारद (File Photo)
राम मंदिर मामले को लेकर पहला केस करने वाले गोपाल सिंह विशारद (File Photo)

राम मंदिर आंदोलन में नींव के पत्थर थे गोपाल सिंह विशारद, 16 जनवरी, 1950 को फैजाबाद की अदालत में दायर किया था केस, इसके बाद हिंदुओं को मिला था पूजा-अर्चना का अधिकार

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  • Last Updated: August 5, 2020, 12:07 PM IST
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नई दिल्ली. अयोध्या (Ayodhya) में राम मंदिर को लेकर हिंदुओं की लड़ाई करीब पांच सौ साल पुरानी है. लेकिन आजाद भारत में इसे लेकर पहला मुकदमा किया गया था 1950 में, जिसका अंत 2019 में हुआ. केस दायर करने वाले थे गोपाल सिंह विशारद. उनके बेटे राजेंद्र सिंह विशारद राम मंदिर भूमि पूजन कार्यक्रम में शामिल होंगे. लेकिन नई पीढ़ी को गोपाल सिंह विशारद के बारे में शायद ही पता हो. दरअसल, वो राम मंदिर आंदोलन में नींव के पत्थर थे.

आजादी के बाद पहला मुकदमा (नियमित वाद क्रमांक 2/1950) एक दर्शनार्थी भक्त गोपाल सिंह विशारद ने 16 जनवरी, 1950 ई. को सिविल जज, फ़ैज़ाबाद की अदालत में दायर किया था. वे उत्तर प्रदेश के तत्कालीन ज़िला गोंडा, वर्तमान ज़िला बलरामपुर के निवासी और हिंदू महासभा, गोंडा के ज़िलाध्यक्ष थे. गोपाल सिंह विशारद 14 जनवरी, 1950 को जब भगवान के दर्शन करने श्रीराम जन्मभूमि जा रहे थे, तब पुलिस ने उनको रोका. पुलिस अन्य दर्शनार्थियों को भी रोक रही थी.

गोपाल सिंह विशारद ने ज़िला अदालत से प्रार्थना की कि-‘‘प्रतिवादीगणों के विरुद्ध स्थायी व सतत निषेधात्मक आदेश जारी किया जाए ताकि प्रतिवादी स्थान जन्मभूमि से भगवान रामचन्द्र आदि की विराजमान मूर्तियों को उस स्थान से जहां वे हैं, कभी न हटावें तथा उसके प्रवेशद्वार व अन्य आने-जाने के मार्ग बंद न करें और पूजा-दर्शन में किसी प्रकार की विघ्न-बाधा न डालें.’’



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श्रीराम मंदिर भूमि पूजन के लिए अयोध्या को भव्य तरीके से सजाया गया है

विश्व हिंदू परिषद (VHP) की वेबसाइट पर लिखी जानकारी के मुताबिक़ अदालत ने सभी प्रतिवादियों को नोटिस देने के आदेश दिए. तब तक के लिए 16 जनवरी, 1950 को ही गोपाल सिंह विशारद के पक्ष में अंतरिम आदेश जारी कर दिया. भक्तों के लिए पूजा-अर्चना चालू हो गई. सिविल जज ने ही 3 मार्च, 1951 को अपने अंतरिम आदेश की पुष्टि कर दी.

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मुस्लिम समाज के कुछ लोग इस आदेश के विरुद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चले गए. मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मूथम व न्यायमूर्ति रघुवर दयाल की पीठ ने 26 अप्रैल, 1955 को अपने आदेश के द्वारा सिविल जज के आदेश को पुष्ट कर दिया. ढांचे के अंदर निर्बाध पूजा-अर्चना का अधिकार सुरक्षित हो गया.

झांसी से आया था विशारद का परिवार: विशारद का परिवार मूल रूप से झांसी का रहने वाला था. वो बाद में अयोध्या आकर बस गए थे. उन्होंने यहां बुंदेलखंड स्टोर के नाम से दुकान खोली थी और हिन्दू महासभा से भी जुड़े थे. 1968 में उनके बेटे राजेंद्र सिंह विशारद बैंक की नौकरी करने बलरामपुर गए और वहीं के होकर रह गए. 1986 में गोपाल सिंह विशारद का स्वर्गवास हो गया. इसके बाद केस की पैरवी उनके बेटे राजेंद्र सिंह करने लगे.

आजादी से पहले पहला केस महंत रघुबर दास ने किया

साल 1853 में अयोध्या में मंदिर और मस्जिद को लेकर फसाद हुआ था. तब अयोध्या, अवध के नवाब वाजिद अली शाह के शासन में आती थी. उस वक़्त हिंदू धर्म को मानने वाले निर्मोही पंथ के लोगों ने दावा किया था कि मंदिर को तोड़कर यहां पर बाबर के समय मस्जिद बनवाई गई थी.

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सन् 1859 में अंग्रेज़ी हुकूमत ने मस्जिद के आसपास तार लगवा दिए और दोनों समुदायों के पूजा स्थल को अलग-अलग कर दिया. मुस्लिमों को अंदर की जगह दी गई, हिंदुओं को बाहर की. मगर इस झगड़े के बाद पहली बार 1885 में मामला अदालत पहुंचा. महंत रघुबर दास ने फैजाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद के पास राम मंदिर के निर्माण की इजाज़त के लिए अपील दायर की.
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