बीजेपी के लिए क्यों जरूरी है योगी के गढ़ में 'ऑपरेशन निषाद' की सफलता
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बीजेपी के लिए क्यों जरूरी है योगी के गढ़ में 'ऑपरेशन निषाद' की सफलता
निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद (फाइल फोटो)

गोरखपुर की सीट पर बीजेपी और योगी आदित्यनाथ के लिए साख दांव पर लगी है.

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  • Last Updated: March 30, 2019, 11:23 PM IST
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(प्रांशु मिश्रा)
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले 24 घंटे से सह-मात का खेल तेज हो गया है. उसमें एक तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं और दूसरी तरफ सपा-बसपा गठबंधन की ओर से अखिलेश यादव हैं. यह लड़ाई गोरखपुर की महत्वपूर्ण लोकसभा सीट और पिछड़ी जाति आधारित राजनीतिक संगठन 'निषाद पार्टी' पर केंद्रित है.

गोरखपुर की सीट पर बीजेपी और योगी आदित्यनाथ के लिए साख दांव पर लगी है. 2014 के लोकसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ इस सीट से जीते थे. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने यह सीट छोड़ दी और उसके बाद उपचुनाव में बीजेपी को सपा बसपा गठबंधन से हार का सामना करना पड़ा. बीजेपी मामूली अंतर से हारी और जीत का कारण 'निषाद फैक्टर' बताया गया.

वर्ष 2015 में अस्तित्व में आई निषाद पार्टी ने 2018 उपचुनाव में गोरखपुर से प्रवीण निषाद को एसपी बीएसपी के सिंबल पर लड़ाया था. प्रवीण निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के बेटे हैं. अब संजय निषाद चुनावी सौदेबाजी में लगे हैं. वे बीजेपी और विपक्ष दोनों गठबंधन के नेताओं को तनाव में डाल रहे हैं.
अभी तीन दिन पहले ही सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने निषाद पार्टी, राष्ट्रीय समानता दल और जनवादी सोशलिस्ट पार्टी के साथ समाजवादी पार्टी के गठबंधन का ऐलान किया था. संजय निषाद ने भी पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा की घोषणा की थी. अखिलेश यादव ने तुरंत प्रवीण को गोरखपुर से अपनी पार्टी का उम्मीदवार घोषित किया.



हालांकि तीन दिन बाद ही ये गठबंधन टूटता नजर आ रहा है. शनिवार शाम को इसमें यूटर्न तब दिखा जब संजय निषाद यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने पहुंचे. बाकायदा मीडिया ने उनके मुलाकात की तस्वीरें भी जारी की. इसके बाद संजय निषाद ने कहा कि सपा बसपा गठबंधन से तालमेल बैठाना मुश्किल है.

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ऐसी उम्मीद थी कि शनिवार को निषाद पार्टी कोई नई घोषणा कर सकती है. सूत्रों ने कहा कि संजय और उनके सांसद बेटे को आज सुबह बीजेपी कार्यालय बुलाया गया था और वहां पर गठबंधन की औपचारिक घोषणा की जानी थी. हालांकि ऐसा नहीं हुआ. पार्टी के अंतिम फैसले पर अभी भी सस्पेंस बना हुआ है.

वहीं स्थिति को भांपकर अखिलेश यादव ने प्रवीण निषाद को रिप्लेश करने का मना बना लिया था. शायद इसलिए उन्होंने गोरखपुर से रामभुआल निषाद को टिकट दिया है. रामभुआल दो बाद कौड़ीराम सीट से विधायक रहे हैं और बसपा की सरकार में मंत्री भी रहे हैं. वर्ष 2012 में वे हार गए थे.

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दरअसल, निषाद सब कास्ट अति पिछड़ा वर्ग में आती है. गोरखपुर क्षेत्र में निषाद, केवट, मल्लाह, मांझी, राजभर, गौंड, कश्यप और कछार सहित इन जातियों की मजबूत उपस्थिति है. इनमें से निषाद प्रमुख भूमिका निभाते हैं. पारंपरिक रूप से इन जातियों का एक जैसा काम रहा है. मछली पकड़ना और नाव चलाना जैसे काम निषाद जाति के लोग करते रहे हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि कैसे अचानक से बड़ी पार्टियां और नेता एक छोटी सी पार्टी को इतना महत्व देते हैं, इसका जवाब प्रदेश की जातीय व्यवस्था में छिपा हुआ है.

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