चुनाव से डेढ़ साल पहले ही यूपी की राजनीति में क्यों छिड़ी है जातियों की जंग?

चुनाव में सपा-बसपा को अपर कास्ट का ज्यादा समर्थन् नहीं मिलता (प्रतीकात्मक फोटो)

चुनाव में सपा-बसपा को अपर कास्ट का ज्यादा समर्थन् नहीं मिलता (प्रतीकात्मक फोटो)

सपा-बसपा जैसी पार्टियां क्यों अपने कोर वोटरों के सवालों को हाशिए पर करके ब्राह्मण वोटबैंक पर फोकस कर रही हैं?

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 25, 2020, 12:32 PM IST
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नई दिल्ली. यूपी विधानसभा चुनाव (Up Election) में अभी डेढ़ साल का वक्त बाकी है   लेकिन पार्टियों ने राजनीति की चौसर पर जातियों की गोटियां सजानी शुरू कर दी हैं. तो क्या यह माना जाए कि 2022 के यूपी चुनाव में विकास, उपलब्धियों और नाकामियों पर ‘जाति गणित’ भारी पड़ेगी? क्या भारतीय राजनीति में जातियां ही एकमात्र सच हैं. जिसका रंग हर साल गहरा होता जा रहा है? फिलहाल, कानपुर कांड के बाद ब्राह्मण वोटर सियासी बहस के केंद्र में हैं. भाजपा विरोधी पार्टियों ने इन्हें लुभाना शुरू कर दिया है.

दिलचस्प यह है कि दलितों और पिछड़ों की हिमायती रही बसपा (BSP) और सपा (SP) जैसी पार्टियां अब अपने कोर वोटरों के सवालों को पीछे छोड़कर 8-9 फीसदी ब्राह्मण वोट बैंक (Brahmin Vote Bank) पर फोकस कर रही हैं. इसकी वजह क्या है? दूसरी ओर, आंदोलन की उपज रही आम आदमी पार्टी ने पिछड़ों, दलितों के हक का सवाल उठाना शुरू कर दिया है.

सपा-बसपा इसलिए लगा रहे हैं अपर कास्ट पर दांव

चुनावी सर्वे करने वाली एजेंसी सीएसडीएस (CSDS) के निदेशक संजय कुमार कहते हैं कि यूपी में आजकल पार्टियों का जो उथल-पुथल चल रहा है उसे 2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम से समझना पड़ेगा. तब की यूपी की राजनीति को देखें तो एसपी बीएसपी ने यह सोचकर गठबंधन किया था कि दलित, मुस्लिम, यादव व अन्य ओबीसी वोटर (OBC Voter) एकत्र हो जाएंगे. यह गठजोड़ इतनी बड़ी न्यूमेरिकल स्ट्रेंथ बनेगा कि बीजेपी हार जाएगी. लेकिन हुआ इसके उलट.
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बीजेपी इस चुनाव में सपा-बसपा के पारंपरिक वोटबैंक दलित और ओबीसी में सेंध लगा चुकी थी. यादव तक सपा का साथ छोड़कर बीजेपी के साथ खड़े दिख रहे थे. साथ ही बीजेपी ने अपर कास्ट के वोटबैंक पर पकड़ और मजबूत कर ली. इस वर्ग का पहले उसे 60-65 फीसदी वोट मिलता था लेकिन 2019 में उसे 83 फीसदी तक मिला. जबकि सपा-बसपा को अपर कास्ट का 5-6 फीसदी ही समर्थन मिला था.

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ऐसे में अब सपा-बसपा और कांग्रेस नए तरह से सोच रहे हैं. वे अपना वोटबैंक बचाने की कोशिश के साथ-साथ बीजेपी के अपर कास्ट वाले किले भेदने की रणनीति में जुटे हुए हैं. उन्हें पता है कि बीजेपी के ट्रेडिशनल वोटरों को रिझाए बिना उसे नहीं हराया जा सकता. इसीलिए यूपी की राजनीति में चुनाव के इतने पहले से कास्ट कार्ड खेला जा रहा है.

राजनीति का नया दौर

कुमार के मुताबिक, हमने यह देखा है कि पहले दलित, मुस्लिम और ओबीसी वोटबैंक पर डोरे डाले जाते थे, लेकिन अब राजनीति में एक नया दौर है. जिसमें बीजेपी की मजबूती की वजह से पहली बार अपर कास्ट और खासतौर पर ब्राह्मणों को वो पार्टियां भी अपनी तरफ लाने की कोशिश कर रही हैं जो दलित, मुस्लिम और ओबीसी की राजनीति करती हैं.

SANJAY SINGH
'आप' नेता संजय सिंह उठा रहे हैं सत्ता से वंचित जातियों का सवाल (File Photo)


भारतीय राजनीति का सच है जाति

दूसरी ओर, दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार कहते हैं कि भारत की राजनीति का केंद्र उत्तर प्रदेश है, जहां जातियों का बोलबाला शुरू से रहा है. यहां मध्यकालीन सोच का बड़ा वर्ग रहा है. अभी भी समाज में यह सोच और व्यवस्था कायम है. हर पार्टी ने जातियों का राजनीतिकरण किया है. इससे कुछ दबी-कुचली जातियों को भी सत्ता में भागीदारी का मौका मिला है. जातियां भारतीय राजनीति का सच हैं.

अब फिर यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर जातिवाद का चूरन बनाया जा रहा है. सपा-बसपा ब्राह्मणों की बात कर रहे हैं तो आम आदमी पार्टी (AAP) ने ओबीसी की उन जातियों के सवालों को आगे कर दिया है, जो सत्ता से बाहर ही दिखाई पड़ती हैं. अभी तो डेढ़ साल का वक्त बाकी है, देखते रहिए किन-किन जातियों के मुद्दे उठेंगे और सम्मेलन होंगे.

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जहां तक यूपी में ब्राह्मण वोटबैंक का सवाल है तो सपा और बसपा यूपी की सियासत में राजपूत और ब्राहमण के झगड़े का फायदा लेना चाहते हैं. ब्राह्मण हमेशा या तो सत्ता में या फिर उसके बहुत नजदीक रहा है. वो टेक्टिकल वोटिंग करता है. जिसका पलड़ा भारी रहेगा वो उसी के साथ जाएगा. कोशिश सपा-बसपा या कांग्रेस कोई भी कर ले.

अपराधियों की जाति नहीं होती लेकिन...?

आमतौर पर कहा जाता है कि अपराधियों (Criminals) की कोई जाति नहीं होती. लेकिन यह सब सहूलियत का मामला है. कभी-कभार बड़े फलक पर अपराधियों की जाति को लेकर बात होने लगती है और इसकी राजनीतिक फसल भी काट ली जाती है. जैसा कि कानपुर के बिकरू कांड (Kanpur Encounter) के बाद प्रतिक्रिया देखने को मिली.

यूपी के डीजीपी हितेश चंद्र अवस्थी ने कहा है कि अपराधियों का कोई जाति और धर्म नहीं होता. पुलिस एनकाउंटर में मारे गए सभी का आपराधिक इतिहास रहा है. कई तो पुलिस कर्मियों की हत्या में शामिल थे.

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एनकाउंटर और जाति का सवाल

>>31 मार्च 2017 से लेकर 9 अगस्त 2020 तक हुए पुलिस एनकाउंटर में 124 अपराधी मारे गए.

>>इनमें 47 अल्पसंख्यक, 11 ब्राह्मण और 8 यादव थे. अल्पसंख्यक समुदाय के ज्यादातर अपराधी पश्चिमी यूपी के थे.

>>शेष 58 अपराधियों में ठाकुर, वैश्य, पिछड़े, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति शामिल थे.

>>जिन 11 ब्राह्मणों का एनकाउंटर हुआ है उनमें से सात बीते डेढ़ महीने में ढेर किए गए. छह तो कानपुर के बिकरू कांड में शामिल थे. इनका एनकाउंटर जुलाई में हुआ था.
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