108 एंबुलेंसः दो महीने के लिए मिली सांसें..... आगे क्या?

Rajesh Dobriyal | News18India
Updated: September 17, 2017, 5:31 PM IST
108 एंबुलेंसः दो महीने के लिए मिली सांसें..... आगे क्या?
Rajesh Dobriyal | News18India
Updated: September 17, 2017, 5:31 PM IST
एक समय देवभूमि में देवदूत सी मानी जाने वाली 108 एंबुलेंस वाली को कुछ सांसें और मिल गई हैं. पैसा न होने की वजह से लगभग बंदी के कगार पर पहुंच गई 108 की एंबुलेंसों के पहिए सरकार से 6 करोड़ रुपये की सहायता मिलने के बाद फ़िलहाल चलते रहेंगे, लेकिन बड़ा सवाल है कि कब तक?

दरअसल नौ साल के इतिहास में 108 ने बहुत अच्छा और अब पिछले कुछ समय से ख़राब समय भी देखा है. पहले किसी भी एमरजेंसी के समय 108 तुरंत पहुंच जाती थी और इसी वजह से इसने नौ साल के समय में 30,000 से ज़्यादा जानें बचाई हैं. लेकिन पिछले कुछ समय से एंबुलेंस के बार-बार ख़राब होने और समय पर न पहुंच पाने की शिकायतें बढ़ती जा रही हैं. और इसी महीने ऐसा पहली बार हुआ कि तनख्वाह न मिलने की वजह से संस्था के कर्मचारियों ने काम पर आना छोड़ दिया.

ऐसा हुआ क्यों यह समझने से पहले जीवीके ईएमआरआई और 108 के संचालन के बारे में समझ लेते हैं...

2008 में राज्य सरकार ने जीवीके ईएमआरआई के साथ राज्य में 108 एंबुलेंस सेवा चलाने के लिए करार किया. इस करार के तहत राज्य सरकार जीवीके ईएमआरआई (जो एक लाभ के लिए काम न करने वाली संस्था है) को सारा ढांचा उपलब्ध करवाती है और जीवीके इस सेवा का संचालन करती है. मतलब उपकरण सरकार के और उन्हें इस्तेमाल करने वाले कर्मचारी जीवीके के इस संचालन के लिए राज्य सरकार जीवीके को हर महीने एक निश्चित राशि (दो करोड़ रुपये प्रतिमाह) का भुगतान  करती है.

समस्या क्या हुई?

समस्या टीडीएस (टैक्स डिडक्टेड ऐट सोर्स) को लेकर शुरू हुई. शुरुआत में तो सरकार ने जीवीके को गाड़ियां, उपकरण और संचालन के लिए पैसे उपलब्ध करवाए और 108 एंबुलेंस पहाड़ों में दौड़-दौड़ कर लोगों की ज़िंदगी बचाने लगीं. लेकिन फिर वित्त वर्ष 2010-11 से सरकार संस्था को किए जाने वाले भुगतान पर टीडीएस लगाने लगी. यह सिलसिला वित्त वर्ष 2015-16 तक चला. जीवीके का कहना है कि चूंकि वह लाभ कमाने वाली संस्था नहीं है और पूरी तरह अनुदान पर चलती है इसलिए उस पर टीडीएस नहीं लगता. लेकिन सरकार टीडीएस जमा करती रही और इस वित्तीय वर्ष में उसने संस्था को यह कहकर पैसा देने से इनकार कर दिया कि वह टीडीएस का पैसा वापस ले और उससे खर्च चलाए.

108 ambulance call center

पैसा नहीं तो काम नहीं

पैसा न मिलने से 108 एंबुलेंस की हालत ख़राब होने लगी. हालत इतने दयनीय हो गए कि संस्था के पास अपने कर्मचारियों का वेतन तक देने के लिए पैसे नहीं बचे. 108 एंबुलेंस भी रखरखाव के अभाव में बार-बार ख़राब होने लगीं और पहले जो सेवा अच्छे काम के लिए ख़बरों में जगह पाती थी अब समय पर न पहुंच पाने के लिए उसकी ख़बरें छपने लगीं. कर्मचारियों का तीन-तीन महीने का वेतन नहीं मिला तो उनके लिए किराया, राशन और बच्चों की फ़ीस भर पाना भी मुश्किल होने लगा. यह ख़बरें भी स्थानीय अख़बारों, टीवी में छपीं और आशंका जताई जाने लगी कि 108 एंबुलेंस का समय पूरा हो गया है.

इसके बाद जीवीके ईएमआरआई ने उत्तराखंड शाखा को चार करोड़ रुपये का उधार दिया कि कर्मचारियों का वेतन  दिया जाए और बेहद ज़रूरी मेंटेनेंस की जा सके. लेकिन इस पैसे से भी दो महीने का ही वेतन बांटा जा सका और सितंबर आते-आते फिर दो महीने का बकाया हो गया. संस्था से जुड़े करीह साढ़े नौ सौ कर्मचारियों में से कॉल सेंटर में काम करने वाले 25 का सब्र टूट गया और उन्होंने वेतन के लिए पहले देहरादून प्रशासन का दरवाज़ा खटखटाया और फिर कार्य बहिष्कार कर दिया.

जीवीके ईएमआरआई उत्तराखंड स्टेट हेड मनीष टिंकू कहते हैं कि इन लोगों को समझाने की कोशिश की गई कि इस मुश्किल में वह अकेले नहीं हैं और सब उनके साथ हैं. साथ ही यह भी कि संस्था पैसा जुटाने के लिए कई स्तर पर कोशिश कर रही है और सबसे बढ़कर बात यह कि 108 एंबुलेंस आपातकालीन सेवा है और यहां लोग हड़ताल नहीं कर सकते. लेकिन एक सितंबर से देहरादून स्थित कॉल सेंटर के 40 में से 25 लोगों ने काम पर आना बंद कर दिया. मनीष टिंकू के अनुसार तुरंत बैक अप स्टाफ़ को काम पर लगाया गया और इन 25 लोगों को नोटिस जारी किया गया. उन्हें एक और नोटिस जारी किया जा चुका है और जल्द ही उनका हिसाब कर उनकी छुट्टी कर दी जाएगी.

हरकत में सरकार

108 ambulance manish tinku

108 एंबुलेंस के अपने अस्तितत्व से जूझने की ख़बरों और बार-बार सवाल पूछे जाने के बाद सरकार हरकत में आई और जीवीके को 6 करोड़ रुपये जारी करने का ऐलान कर दिया. लेकिन आखिर इन छह करोड़ रुपये से होगा क्या-क्या?

मनीष टिंकू कहते हैं कि इससे स्टाफ़ का बकाया भुगतान हो जाएगा, पैट्रोल पंपों, मेंटेनेंस करने वालों का उधार चुकता हो जाएगा और जिनमें ज़रूरी है, उन एंबुलेंस के टायर बदले जा सकेंगे.

तो कितने दिन तक सब कुछ आराम से चलेगा इन पैसों से, मतलब कितने महीने तनख्वाह मिल पाएगी, कितने दिन डीज़ल भरा जा सकेगा और मेंटेनेंस किया जा सकेगा?

"लगभग दो महीने तक", टिंकू कहते हैं. उसके बाद?

टिंकू कहते हैं, "उसके बाद के लिए कोशिश तो कर ही रहे हैं कि टीडीएस का पैसा वापस मिल जाए जो अब तक मिल जाना चाहिए था और पहले तो अपील पर फ़ैसले में देर हुई फिर तेलंगाना बन जाने के कारण (जीवीके आंध्र स्थित संस्थान है और अब तेलंगाना में है), फिर यह फ़ाइल देखने वाले अधिकारी छुट्टी पर चले गए और अब न जाने क्यों? सरकारी काम है, आप भी जानते हैं, कब होंगे कुछ कह नहीं सकते."

सरकार क्या चाहती है?

राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी में 108 एंबुलेंस सेवा एक बड़ा और ज़रूरी कदम था. लेकिन सरकारों की लापरवाही और उदासीनता की वजह से इस शानदार सेवा की हालत ख़स्ता हो गई. 2010 के बाद कोई नई एंबुलेंस नहीं खरीदी गई और अब हालत यह है कि 138 (दो ख़राब हैं) के बेड़े में से आधी एंबुलेंस को बदलने की ज़रूरत है.  सभी गाड़ियां तीन लाख किलोमीटर से ऊपर चल चुकी हैं और कुछ तो पांच लाख तक भी. आखिर आप अपनी निजी कार को भी इतना नहीं चलाते, तो फिर आपातकालीन सेवा वाली एंबुलेंस को क्यों?

टिंकू कहते हैं कि अच्छा तो यह है कि हर साल 20-20 एंबुलेंस ख़रीदी जाएं और पुरानी को रिटायर कर दिया जाए. ऐसे में आपका बेड़ा हमेशा नया सा बना रहता है. जिन अन्य 16 राज्यों में जीवीके 108 एंबुलेंस सेवा संचालित कर रही है उनमें ज़्यादातर ऐसा ही करते हैं. जीवीके के साथ सरकार का करार मार्च 2018 में ख़त्म होना है. उसके बाद या तो जीवीके (अगर इसे फिर मौका मिलता है तो) या कोई और संस्था 108 एंबुलेंस सेवा को संचालित करेगी. लेकिन संचालन चाहे जो करे एंबुलेंस समेत आधारभूत ढांचा तो सरकार को ही देना है. और अगर वह नहीं देगी तो फिर लोग 108 पर फ़ोन कर एंतज़ार करते रह जाएंगे और एंबुलेंस कहीं ख़राब खड़ी होगी.

 
First published: September 17, 2017
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