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केदरानाथ त्रासदी के 6 साल: आखिर कैसे बचा रह गया था मंदिर?

केदारनाथ मंदिर का हिंदू धर्म शास्त्रों में बहुत महत्व है

केदारनाथ मंदिर का हिंदू धर्म शास्त्रों में बहुत महत्व है

मंदिर के सिवाय सब कुछ बह गया था, दुकानों, धर्मशालाओं से गुलजार रहने वाला इलाका मैदान में हो गया था तब्दील...

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    केदारनाथ हादसे के 6 साल बीत चुके हैं. मंदिर में फिर से श्रद्धालुओं का रेला लगा रह रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंदिर के फिर से निर्माण और वहां चल रहे कामकाज में बहुत रुचि ली. इस वजह से भी वहां काम तेजी से हो सका. श्रद्धालुओं की सुविधाओं और सुरक्षा के लिए भी इंतजाम किए गए हैं. लेकिन 6 साल पहले की इस भयानक त्रासदी में आखिर बाबा केदार का मंदिर कैसे बचा रह गया था? क्या हुआ था उस वक्त ये जानना लोगों के लिए आज भी रोचक है कि आखिर कैसे मंदिर और मंदिर के अंदर का शिवलिंग सुरक्षित बच गया था?

    तो आइए याद करते हैं उस समय के दृश्य को उत्तराखंड में बारिश के बाद अचानक आए सैलाब में केदारनाथ मंदिर को छोड़कर सबकुछ तबाह और जमींदोज हो गया. मंदिर के आसपास कुछ नहीं बचा. चट्टानों की बारिश के बीच आखिर कैसे केदारनाथ मंदिर और भीतर का शिवलिंग सुरक्षित रहा? शिव भक्त इसे भगवान भोलेनाथ का चमत्कार बता रहे हैं तो जानकार हजारों साल पुराने इस मंदिर की मजबूत बनावट को. आखिर कौन इस तबाही के दौरान मंदिर के लिए सुरक्षा कवच का काम कर रहा था?

    चट्टानों का मैदान बन गया था
    केदारनाथ धाम अब एक सपाट मैदान में बदल चुका है सफेद और सलेटी रंग की चट्टानों का समुद्र है यहां. न धर्मशाला बची, न होटल, न विश्रामगृह, न बैंक, न कुछ और. सब गिर गया, टूट गया, बह गया और जो बचा वो कम से कम 10 फीट मलबे में दब गया. तो फिर केदार यानि शिव का ये घर, ये मंदिर कैसे बचा रह गया. भयानक बारिश और ग्लेशियर टूटने के साथ जब पानी नीचे उतरा और अपने साथ हजारों टन मलबा नीचे लाया. उसकी चपेट में आकर सारी मकान ढह गए. लेकिन एक हजार साल तक पुराने मंदिर का बाल भी बांका न हुआ, न उसकी दीवार टूटी न कोई हिस्सा अलग हुआ.

    केदारनाथ में हर वक्त 6 से 7 हजार लोग एक साथ नजर आते थे, भगवान भोलेनाथ के जयकारे गूंजते थे, पैर रखने की जगह तक नहीं मिलती थी. लेकिन अब यहां जगह ही जगह है. आज यहां मरघट का सन्नाटा पसरा है. आखिर इस मंदिर में ऐसी क्या खासियत है. क्या ये मंदिर भी प्राचीन सभ्यता की उस अकलमंद तकनीक की निशानी थी जो उसने कुदरत के किसी भी कहर से बचने के लिए तैयार की थी. क्योंकि केदारनाथ धाम एक ऐसे इलाके में है जो कुदरत की उस गोद में है जो रह रह कर हिलोरें ले सकती है. केदारनाथ मंदिर तीन तरफ से ऊंचे पहाड़ों से घिरा है.

    22 हजार फीट ऊंचाई पर है मंदिर
    करीब 22 हजार फीट ऊंचा केदारनाथ, करीब 21,600 हजार फीट ऊंचा खर्चकुंड और 22,700 हजार फीट ऊंचा भरतकुंड. न सिर्फ तीन पहाड़ बल्कि पांच नदियों का संगम भी है यहां मंदाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णद्वरी. वैसे इसमें से कई नदियों को काल्पनिक माना जाता है. लेकिन यहां इस इलाके में मंदाकिनी का राज है, वो नदी जो पल में बढ़ती है तो पल में सिमट जाती है. यानि सर्दियों में भारी बर्फ और बारिश में जबरदस्त पानी. एक हजार साल पहले जब इस मंदिर की नींव रखी गई होगी तब भी शिव भाव का ध्यान रखा गया होगा. शिव जहां रक्षक हैं वहीं शिव विनाशक भी हैं, शिव प्रेम, घृणा, डर, मृत्यु और रहस्य के प्रतीक भी हैं. इसलिए शिव की आराधना के इस स्थल को खास तौर पर बनाया गया. ताकि वो रक्षा भी कर सके और विनाश भी झेल सके. केदारनाथ मंदिर उम्र को लेकर कोई दस्तावेजी सबूत नहीं मिलते, मगर ये पक्का है कि पिछले 1000 सालों से केदारनाथ एक बेहद अहम तीर्थस्थल है. घुमक्कड़ इतिहासकार राहुल सांस्कृतायन ने भी केदारनाथ मंदिर को 12-13वीं शताब्दी का बना हुआ माना था.

    बनवाने की कई कहानियां है प्रचलित
    आखिर इस बेहद मजबूत मंदिर को बनाया किसने, इसे लेकर भी कई कहानियां प्रचलित हैं. कुछ कहते हैं कि 1076 से लेकर 1099 विक्रमसंवत तक राज करने वाले मालवा के राजा भोज ने ये मंदिर बनवाया था. तो कुछ कहते हैं कि आठवीं शताब्दी में ये मंदिर आदिशंकराचार्य ने बनवाया था. बताया जाता है कि द्वापर युग में पांडवों ने मौजूदा केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे एक मंदिर बनवाया था. लेकिन वो वक्त के थपेड़े सह न सका. लेकिन केदारनाथ मंदिर डटा रहा, हर साल नवंबर से लेकर मार्च तक ये मंदिर बर्फ से ढक जाता है, बंद रहता है और यहां विराजमान केदारनाथ को नीचे ले जाकर पूजा जाता है. मुख्य मंदिर के दक्षिण की ओर भैरो नाथ का मंदिर है. भैरो नाथ को बर्फ पड़ने के दौरान बंद केदारनाथ का रखवाला माना जाता है. उस अभागी रात को जब भारी बारिश के बीच पत्थर, मिट्टी और चट्टानें लिए सैलाब पहाड़ों से नीचे उतरा तो कई लोगों ने भाग कर भैरो नाथ में शरण ले ली, लेकिन भैरो नाथ किसी को बचा नहीं सके.
    यही वो वक्त था जब घबराए और बुरी तरह डरे करीब 300 श्रद्धालों ने केदारनाथ मंदिर में शरण ली. पानी बढ़ता जा रहा था, देखते ही देखते मंदिर के अंदर 5 फीट पानी घुस गया. मौत को सामने देखकर मंदिर में मौजूद सैकडो़ं लोग भगवान को याद करने लगे. ऐसा लग रहा था कि सैलाब अपने रास्ते में आने वाला सब कुछ निगल जाएगा. पुजारी की मानें प्रलय की उस घड़ी में कुछ चमत्कार जैसा हुआ.

    अलग स्थापत्य शैली
    लेकिन ये दरअसल, इस मंदिर की बनावट का चमत्कार था. बताया जाता है कि केदारनाथ मंदिर नागर स्थापत्य कला से मिलती-जुलती कत्युरी स्पायर शैली से बना है. केदारनाथ मंदिर 85 फीट ऊंचा, 187 फीट लंबा और 80 फीट चौड़ा है. इसकी दीवारें 12 फीट मोटी हैं. केदारनाथ मंदिर को खास तौर पर बनाए गए 6 फीट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया था. ये मंदिर दक्षिण दिशा की ओर खुलता है जो ज्यादातर मंदिरों से अलग है, ज्यादातर मंदिरों का मुख पूर्व की ओर होता है.

    मजबूत चट्टानों से बना है मंदिर
    ये मंदिर बेहद मजबूत चट्टानों से बनाया गया है. ये पत्थर खासे बड़े थे और इन्हें एक ही आकार में तराशा गया है. इतना ही नहीं मंदिर के पीछे के हिस्से में एक बड़ी चट्टान नजर आती है. कहा जाता है कि ये चट्टान मंदिर की ओर आने वाली हर आफत में मंदिर के कवच का काम करती है. 16 जून को आए सैलाब को भी इस चट्टान ने दो हिस्सों में बांट दिया और मंदिर पर सीधे कोई वार नहीं हो सका.

    तकनीकि आज भी करती है हैरान
    ये हैरतअंगेज है कि इतने साल पहले इतने भारी पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर, यूं तराश कर कैसे मंदिर की शक्ल दी गई होगी. जानकारों का मानना है कि केदारनाथ मंदिर को बनाने में, बड़े पत्थरों को एक-दूसरे में फिट करने में इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया होगा. ये तकनीक ही नदी के बीचों-बीच खड़े मंदिरों को भी सदियों तक अपनी जगह पर रखने में कामयाब रही है. महेश्वर में भी नर्मदा के मध्य बाणेश्वर मंदिर एवं तट पर शिव व श्रीराम मंदिर का निर्माण भी इसी तकनीक से किया गया है.
    शायद इसीलिए जब पानी का रेला आया तो केदानारथ मंदिर के आसपास होटल, आश्रम, धर्मशाला व रेस्तरां तिनके की तरह बह गए, लेकिन मंदिर सलामत रहा.

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