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अल्मोड़ा: हर्बल चाय के उत्पादन में जुटी महिलाएं, मिला रोजगार का नया अवसर

इन दिनों देश भर से हर्बल चाय की मांग काफी तेजी से बढ़ी है.

इन दिनों देश भर से हर्बल चाय की मांग काफी तेजी से बढ़ी है.

कोरोना संकट के दौरान देश भर में इम्यूनिटी (Immunity) बढ़ाने के लिए लोग हर्बल चीजों का प्रयोग कर रहे है. उत्तराखंड (Uttrakhand) की पहाड़ियों में भी जड़ी-बूटी का भंडार है. महिला समूह इसपर काम कर रही हैं.

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अल्मोड़ा. कोरोना संकट (Corona Crisis) के दौरान देश भर में इम्यूनिटी (Immunity) बढ़ाने के लिए लोग हर्बल चीजों का प्रयोग कर रहे है. उत्तराखंड (Uttrakhand) की पहाड़ियों में भी जड़ी-बूटी का भंडार है. अब हवालबाग की महिला समूहों ने हर्बल चाय का उत्पादन करना शुरू कर दिया है. यहां गिलॉय, तुलसी, बुरांश और बिच्छू के घास की चाय बनायी जा रही है. जिसकी मांग बाजार में तेजी से बढ़ी है. इस संबंध में आजीविका परियोजना के परियोजना प्रबंधक कैलास भट्ट का कहना है कि महिलाओं द्वारा हर्बल चाय (Herbal Tea) का उत्पादन किया जा रहा है. ये महिला जंगलों से बुरांश, गिलॉय को इकट्ठा कर ला रही हैं.

भट्ट का कहना है कि इससे महिलाओं को रोजगार का अवसर मिल रहा है. इन दिनों देश भर से हर्बल चाय की मांग काफी तेजी से बढ़ी है. महिला समूह अब खुद ही उत्पादन की जिम्मेदारी संभाल रही हैं.

जानिए क्या कह रही है महिलाएं
स्वयं सहायता समूह की प्रेमा का कहना है कि कोरोना संक्रमण के समय पीएम मोदी ने कहा कि इम्यूनिटी सिस्टम बढ़ाना है और गिलॉय और तुलसी की चाय से यह बढ़ता है. समूह की एक अन्य सदस्य मंजू देवी ने कहा कि वह सुबह से अपने घरों में कार्य करते है. दोपहर के बाद समिति के ऑफिस में आकर चाय पैंकिग करती हैं. जिनसे उनका घर भी चलता है और लोगों को हर्बल चाय भी मिल रही है.

अलमोड़ा की इन महिलाओं पर सटीक बैठती है ये कहावत
अगर आप में हुनर है तो सफलता आपके कदम चूमेगी. यह बात अल्मोड़ा की इन महिलाओं पर सटीक बैठती है. जो इस कठिन हालात पर भी कुछ न कुछ नया कर गुजरने की चाह रखती हैं. इन्होंने पहाड़ के जड़ी-बूटी से ही चाय का उत्पादन किया है और पैकिंग कर इसकी बिक्री भी की जा रही है. इसकी मांग अब तेजी से पूरे देश में हो रही है.



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अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज शुरू नहीं हुआ लेकिन 48 डॉक्टरों ने संभाला मोर्चा, रोज कमा रहे दुआ!

मेडिकल कॉलेज में ज्यादातर डॉक्टर देहरादून और हल्द्वानी से आए हैं.

मेडिकल कॉलेज में अब तक करीब 48 डॉक्टरों ने जॉइनिंग कर ली है, जिससे स्थानीय लोगों को बड़ी राहत मिली है.

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अल्मोड़ा का मेडिकल कॉलेज (Almora Medical College) अभी तक शुरू नहीं हो सका है. मेडिकल कॉलेज में अब तक करीब 48 डॉक्टरों ने जॉइनिंग कर ली है, जिससे स्थानीय लोगों को बड़ी राहत मिली है. दरअसल मेडिकल कॉलेज पहुंचे डॉक्टरों ने ओपीडी शुरू कर दी है.

अल्मोड़ा का मेडिकल कॉलेज शुरू नहीं होने के बावजूद बाहर से आए अनुभवी डॉक्टरों ने अपनी ओपीडी शुरू कर दी है, जिससे वह रोजाना अस्पताल में मरीजों का इलाज कर रहे हैं. पहले डॉक्टरों के अभाव में मरीजों को अन्य शहरों की ओर जाना पड़ता था लेकिन नए डॉक्टरों द्वारा ओपीडी शुरू किए जाने के बाद अल्मोड़ा व आसपास के लोगों ने चैन की सांस ली है.

चिकित्सा अधीक्षक डॉक्टर अजय कुमार ने बताया कि मेडिकल कॉलेज के लिए पहुंचे डॉक्टरों ने अपनी सेवाएं देनी शुरू कर दी हैं. सभी रोगियों का इलाज अब यहां हो रहा है. भविष्य में जल्द ही इमरजेंसी और अन्य सेवाएं देने की कोशिश रहेगी. रोजाना की ओपीडी करीब 200 से 250 के बीच हो रही है.

बता दें कि अल्मोड़ा के मेडिकल कॉलेज की घोषणा साल 2004 में हुई थी और 2012 में इसका निर्माण कार्य शुरू हो गया था, जो अभी तक पूरा नहीं हो सका है.

अल्मोड़ा ने नम आंखों से दी मां नंदा-सुनंदा को विदाई, 'देवता' भी हुए शामिल!

काफी संख्या में श्रद्धालु नंदा देवी मंदिर पहुंचे.

भक्तों ने डोले पर फूल बरसाए और अक्षत अर्पित कर देवी मां को भावभीनी विदाई दी.

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अल्मोड़ा में मां नंदा देवी मेले के 206 साल पूरे हो गए हैं. मां नंदा-सुनंदा के डोले के संग शहर में भव्य शोभायात्रा निकाली गई. लोगों ने बालकनी और छतों पर आकर मां नंदा-सुनंदा के दर्शन किए. भक्तों ने डोले पर फूल बरसाए और अक्षत अर्पित कर देवी मां को भावभीनी विदाई दी. देर शाम मां नंदा-सुनंदा की मूर्तियों का विसर्जन किया गया.

मां नंदा-सुनंदा की विदाई में पूरा शहर उमड़ पड़ा. बच्चों से लेकर बूढ़े तक शोभा यात्रा में देवी मां के जयकारे लगाते नजर आए. मूर्ति विसर्जन से पहले नंदा देवी मंदिर प्रांगण में आरती की गई. इसके बाद शाम करीब चार बजे शंख ध्वनि के साथ डोले की शोभायात्रा निकली.

अलग-अलग रास्तों से होकर मां नंदा-सुनंदा की शोभायात्रा निकाली गई. डोले के आगे देवता भी नाचते हुए दिखे. साथ ही महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में दिखीं और छोलिया नृत्य करते कलाकार मां के डोले के आगे-आगे चलते रहे.

अल्मोड़ा का ऐतिहासिक रैमजे इंटर कॉलेज, सहेज कर रखी हैं ब्रिटिश काल की धरोहर

रैमजे इंटर कॉलेज उत्तराखंड के अल्मोड़ा में स्थित है.

रैमजे इंटर कॉलेज का निर्माण ब्रिटिश काल में कुमाऊं के कमिश्नर रहे सर हेनरी रैमजे ने कराया था.

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अल्मोड़ा के रैमजे इंटर कॉलेज (Ramsay Inter College Almora) का इतिहास बेहद शानदार है. यह कॉलेज अल्मोड़ा के चौक बाजार में स्थित है. यह कुमाऊं के सबसे प्राचीन शिक्षण संस्थानों में शुमार है. रैमजे इंटर कॉलेज का निर्माण ब्रिटिश काल में कुमाऊं के कमिश्नर रहे सर हेनरी रैमजे ने कराया था. स्कूल की स्थापना 1851 में हुई थी जोकि सबसे पहले चीनाखान में खुला था, इसके बाद अल्मोड़ा के इस भवन में स्कूल को शिफ्ट किया गया.

रैमजे इंटर कॉलेज में आज भी ब्रिटिश काल की धरोहर सहेज कर रखी गई हैं. कॉलेज के प्रिंसिपल विनय विल्सन ने न्यूज 18 लोकल की टीम को ब्रिटिश काल की वह घंटी दिखाई, जो आज भी बजाई जाती है.

इस कॉलेज में 19वीं सदी का बिगुल, भारत का संविधान का बोर्ड, ट्रॉफी और ब्लैकवुड की कुर्सियां भी रखी हुई हैं. यहां एक लाइब्रेरी भी है, जो ब्रिटिश काल की है. इसमें बहुत सी पुरानी किताबें रखी हैं.

रैमजे इंटर कॉलेज का आजादी के आंदोलन में भी बहुत बड़ा योगदान रहा है. भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत, महान स्वतंत्रता सेनानी विक्टर मोहन जोशी और मुकुंदी लाल समेत देश की कई दिग्गज हस्तियों ने यहां से शिक्षा प्राप्त की है.

आधुनिकता की चपेट में अल्मोड़ा का तांबा उद्योग, कहीं इतिहास न बन जाए 'ताम्र नगरी' की पहचान

ताम्र उद्योग अल्मोड़ा के टम्टा मोहल्ला में स्थित है.

अल्मोड़ा के टम्टा मोहल्ला में चल रहा ताम्र उद्योग करीब 400 साल पुराना है.

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अल्मोड़ा के टम्टा मोहल्ला में चल रहा ताम्र उद्योग करीब 400 साल पुराना है. एक जमाने में लोग तांबे के बर्तनों का काफी इस्तेमाल करते थे लेकिन अब आधुनिकता की चमक ने तांबे की अनूठी चमक को फीका कर दिया है. पहले हर घर में लोग पीने का पानी सिर्फ तांबे के बर्तन में ही रखते थे. तांबे के बर्तन में रखा पानी स्वास्थ्य के लिए काफी अच्छा माना जाता है लेकिन अब हर घर में फिल्टर लग गए हैं.

यहां के ताम्र कारीगरों के हाथों से बने तांबे के बर्तन आज भी काफी प्रसिद्ध हैं. एक समय था, जब यहां कई परिवार इस उद्योग से जुड़े थे लेकिन अब चंद लोग ही इस कला को बचाए रखने के लिए जी-जान से जुटे हैं. इसे रोजी-रोटी की जरूरत के तौर पर भी समझा जा सकता है.

यहां पर तांबे से तौला, गागर, परात, पूजा के बर्तनों के अलावा वाद्य यंत्र रणसिंघ, तुतरी आदि बहुत चीजें बनाई जाती हैं. टम्टा मोहल्ला में काम करने वाले लोगों का कहना है किसी भी सरकार ने उनकी किसी भी तरह की मदद नहीं की, अगर हुक्मरान मदद करते तो ताम्र उद्योग आज काफी ऊंचाइयों पर होता.

उद्योग विभाग के महाप्रबंधक दीपक मुरारी ने बताया कि पिछले दिनों मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत टम्टा मोहल्ला में ताम्र से बनने वाले बर्तनों की ट्रेनिंग दी गई थी. जो लोग इसका काम करना चाहते हैं, उन्हें लोन की सुविधा भी दी जाएगी.

बताते चलें कि इस साल आयोजित हुए कुंभ मेले में अल्मोड़ा पुलिस ने तांबे से बनी गगरी को मेले में आने वाले वीआईपी और मुख्य अतिथियों को भेंट देने के लिए अल्मोड़ा से करीब 500 गागर भेजी थीं.

कसार देवी मंदिर के रहस्य से NASA भी हैरान, जानिए ये चुंबकीय शक्तियां शरीर पर कैसे करती हैं काम?

कसार देवी मंदिर उत्तराखंड के अल्मोड़ा में स्थित है.

कसार देवी मंदिर में देवी मां की मूर्ति के ठीक पीछे पत्थर पर एक शेर की आकृति है, जो साफ नजर आती है.

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उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में कसार देवी मंदिर (Kasar Devi Temple Almora) स्थित है. इस मंदिर में हमेशा श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. इस स्थान पर चुंबकीय शक्तियां हैं. NASA के वैज्ञानिक भी इस रहस्य पर शोध कर रहे हैं. मंदिर में माता की मूर्ति के ठीक पीछे पत्थर पर एक शेर की आकृति है. बहुत कम लोगों को इस बारे में पता है.

दुनिया में तीन पर्यटक स्थल ऐसे हैं, जहां कुदरत की खूबसूरती के दर्शन तो होते ही हैं, साथ ही मानसिक शांति भी महसूस होती है. यहां चुंबकीय शक्ति का केंद्र भी है. इनमें से एक भारत के उत्तराखंड में अल्मोड़ा में स्थित कसार देवी शक्तिपीठ है. नासा के वैज्ञानिक चुंबकीय रूप से इन तीनों जगहों के चार्ज होने के कारणों और प्रभावों पर शोध कर रहे हैं.

कसार देवी मंदिर के आसपास का पूरा क्षेत्र वैन एलेन बेल्ट है, जहां धरती के भीतर विशाल भू-चुंबकीय पिंड है. मंदिर के आसपास श्रद्धालु ध्यान मुद्रा में बैठते हैं, जिससे उन्हें एक अलग किस्म की शांति की अनुभूति होती है. इस अलग अहसास के लिए ही देश-विदेश से लोग यहां आते हैं.

अब तक हुए इस अध्ययन में पाया गया है कि अल्मोड़ा स्थित कसार देवी मंदिर, दक्षिण अमेरिका के पेरू स्थित माचू-पिच्चू और इंग्लैंड के स्टोन हेंग में यह अद्भुत समानताएं हैं. इन तीनों जगहों पर चुंबकीय शक्ति का विशेष पुंज है.

नवरात्रि के मौके पर यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं. हर साल कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर कसार देवी मंदिर में मेला भी लगता है. स्वामी विवेकानंद भी कसार देवी मंदिर में आ चुके हैं. 1890 में मंदिर में स्थित एक गुफा में उन्होंने ध्यान किया था.

इंसानियत की मिसाल हैं 78 वर्षीय मनोरमा जोशी, दिव्यांगों को 'आत्मनिर्भर' बनाना ही जीवन का मकसद

मनोरमा जोशी मंगलदीप विद्या मंदिर की संस्थापक हैं.

उत्तराखंड के अल्मोड़ा की रहने वालीं मनोरमा जोशी ने अपना पूरा जीवन दिव्यांग बच्चों पर न्योछावर कर दिया.

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उत्तराखंड के अल्मोड़ा की रहने वालीं मनोरमा जोशी इंसानियत की मिसाल हैं. उन्होंने अपना पूरा जीवन दिव्यांग बच्चों पर न्योछावर कर दिया. 78 वर्षीय मनोरमा ने 1 जुलाई, 1998 को मंगलदीप विद्या मंदिर की स्थापना की थी. इस मंदिर के निर्माण का मकसद दिव्यांगों का सहारा बनना था.

शुरुआत में स्कूल में सिर्फ 6 ही बच्चे थे. आज मनोरमा जोशी के स्कूल में करीब 48 दिव्यांग बच्चे और 12 शिक्षक हैं. मनोरमा जोशी ने बताया कि शुरुआती दौर में उन्हें काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला लेकिन उनके परिवार और साथियों ने उनकी काफी मदद की.

मनोरमा देवी ने बताया कि मंगलदीप विद्या मंदिर के बच्चों को कई तरह के उत्पाद बनाना सिखाया जाता है, जिसमें- मोमबत्ती, लिफाफे, फूलों से रंग बनाना, ग्रीटिंग कार्ड, सिलाई, पोस्टकार्ड आदि प्रमुख हैं. साथ ही बच्चों के लिए म्यूजिक और डांस की क्लासेस भी आयोजित की जाती हैं. विद्या मंदिर में पिछले पांच साल से बच्चों को हैंडलूम संबंधी कार्यों का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है.

स्वामी विवेकानंद 3 बार आए थे अल्मोड़ा, आज भी रखी हैं चरण पादुका, छड़ी और ये सामान

स्वामी विवेकानंद का सामान खजांची मोहल्ले में रखा हुआ है.

अल्मोड़ा के खजांची मोहल्ले में स्वामी विवेकानंद का सामान आज भी मौजूद है.

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उत्तराखंड का अल्मोड़ा वह शहर रहा है, जहां ऋषि-मुनियों और संतों ने आकर इस भूमि के महत्व को बढ़ाया है. कई महान संतों का अल्मोड़ा से गहरा लगाव रहा है. स्वामी विवेकानंद का भी अल्मोड़ा से गहरा नाता रहा है. स्वामी विवेकानंद यहां तीन बार आए थे और उन्होंने यहां कई दिनों तक रहकर साधना की थी.

अल्मोड़ा के खजांची मोहल्ले में स्वामी विवेकानंद का सामान आज भी मौजूद है. यहां उनकी चरण पादुका, छड़ी, किताबें और टेबल लैंप रखा हुआ है. स्वामी विवेकानंद की दवात की शीशियां भी यहां रखी हुई हैं. जिस कप में वह चाय पीते थे, वह भी इस भवन में देखने को मिल जाएगा.

स्वामी विवेकानंद को पहली बार 1890 की यात्रा के दौरान अल्मोड़ा के काकड़ीघाट स्थित पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था. अल्मोड़ा में वह कई दिनों तक खजांची मोहल्ला में स्व. बद्री शाह के मेहमान बनकर भी रहे.

स्वामी विवेकानंद जब दूसरी बार अल्मोड़ा पहुंचे तो अल्मोड़ा में उनका भव्य स्वागत हुआ. पूरे शहर को सजाया गया था और लोधिया से एक सजे घोड़े में उन्हें नगर में लाया गया. 11 मई, 1897 को खजांची बाजार में उन्होंने एक जनसभा को संबोधित किया था. उन्हें सुनने के लिए करीब 5000 लोग जमा हुए थे.

1890 की अल्मोड़ा यात्रा के दौरान कर्बला के पास स्वामी विवेकानंद जब बेहोश हो गए थे, तो एक फकीर ने ककड़ी का रस पिलाकर उनकी जान बचाई थी. विवेकानंद अक्सर फकीर की काफी तारीफ करते हुए कहते थे कि आज वह उसकी वजह से ही जिंदा हैं.

अल्मोड़ा : बस आवाज सुनकर खिंचे चले आयेेंगे आप, नंदा देवी मेले की रौनक है ये नेत्रहीन जोडा.

संतराम और आनंदी देवी करीब 15 साल से मेले में आ रहे हैं.

संतराम और आनंदी देवी करीब 15 साल से अल्मोड़ा में आयोजित नंदा देवी मेले में आ रहे हैं.

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अल्मोड़ा के धौलछीना के रहने वाले संतराम और आनंदी देवी नेत्रहीन हैं. दिव्यांग होने के बावजूद दोनों हर साल नंदा देवी मेले की रौनक बढ़ाने आ जाते हैं. यह दंपति करीब 15 साल से इस मेले में आते हैं और लोकगीतों से हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देते हैं.

संतराम कुमाऊंनी लोकगीतों को गाते हुए, हुड़के की थाप देते हैं और आनंदी देवी उनके साथ सुर-ताल मिलाकर जो गाती हैं, उसके सभी मुरीद हो जाते हैं. दोनों लोकगीतों में न्यौली, चाचरी, झोड़ा समेत कई गानों को गाकर मेले में समां बांध देते हैं.

बताते चलें कि कुछ समय पहले दंपति का घर क्षतिग्रस्त हो गया था, जिसको तत्कालीन जिलाधिकारी नितिन सिंह भदौरिया ने दोबारा से बनाने के निर्देश दिए थे. उनका घर बनकर तैयार हो चुका है.

डॉक्टर अजीत तिवारी को इसकी देखरेख का जिम्मा सौंपा गया था. उन्होंने बताया कि घर का काम लगभग पूरा हो चुका है और संतराम और उनकी पत्नी को जल्द ही उस मकान में शिफ्ट कर दिया जाएगा. घर में उनके लिए ढोलक, हारमोनियम व अन्य वाद्य यंत्र भी रखे जाएंगे. जो कोई भी उनसे लोक संगीत सीखना चाहता है, वह सीख सकता है.

'सरकार' से मदद मांग रहा अल्मोड़ा का ऐतिहासिक इंटर कॉलेज, जान जोखिम में डाल पढ़ाई को मजबूर बच्चे

कॉलेज के छात्र इस जर्जर भवन में पढ़ने को मजबूर हैं.

अल्मोड़ा के राजकीय इंटर कॉलेज को अटल उत्कृष्ट विद्यालय का भी दर्जा दिया गया है.

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अल्मोड़ा में राजकीय इंटर कॉलेज (GIC Almora) 1889 में स्थापित हुआ था. यह कॉलेज शहर के ऐतिहासिक भवनों में गिना जाता है. GIC को अटल उत्कृष्ट विद्यालय का भी दर्जा दिया गया है लेकिन शिक्षा विभाग और शासन स्तर पर इसके रखरखाव के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है, जिसके चलते छात्र जर्जर भवनों में पढ़ने को मजबूर हैं.

GIC के कुछ भवनों की स्थिति इतनी जर्जर है कि कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है. रसायन विभाग की लैब की हालत बेहद खस्ता है, इसके बावजूद इस प्रयोगशाला का इस्तेमाल किया जा रहा है. वर्तमान में राजकीय इंटर कॉलेज के 40 टीचर करीब 600 छात्रों को पढ़ा रहे हैं.

बताते चलें कि इस कॉलेज से कई जानी-मानी हस्तियां पढ़ चुकी हैं. पूर्व जनरल बीसी जोशी, मशहूर कवि सुमित्रा नंदन पंत, जनसंघ के संस्थापक सदस्य सोबन सिंह जीना, पूर्व राज्यपाल बीडी पांडे और अल्मोड़ा के मौजूदा सांसद अजय टम्टा जैसे कई बड़े नाम इस फेहरिस्त में शामिल हैं. भवनों की जर्जर हालत को लेकर कॉलेज और विभाग की तरफ से कई पत्र भी लिखे गए लेकिन अभी तक इसकी सुध नहीं ली गई है.

अल्मोड़ा में लगाया जुरासिक काल का 'जिंको बाइलोबा' पेड़, जानिए खासियत

यह पेड़ 29 करोड़ साल पुरानी प्रजाति का है.

जुरासिक युग का माना जाने वाला जिंको बायलोबा नाम का यह पेड़ अल्मोड़ा के पंत पार्क में लगाया गया है.

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अल्मोड़ा उत्तराखंड के प्राचीन शहरों में शुमार है. यहां की ऐतिहासिक व सांस्कृतिक विरासतें इस शहर की शान हैं. अब इस प्राचीन पहाड़ी नगर की खूबसूरती में करीब 29 करोड़ वर्ष पुरानी प्रजाति का एक पेड़ चार चांद लगाएगा. जिंको बायलोबा नाम का यह पेड़ अल्मोड़ा के पंत पार्क में लगाया गया है. इस पेड़ की मूल उत्पत्ति चीन की मानी जाती है.

यह पेड़ काफी दुर्लभ प्रजाति का है. अल्मोड़ा के पंत पार्क में जिंको बाइलोबा नाम के पौधे को जीबी पंत पर्यावरण संस्थान की मदद से लगाया गया था. नगरपालिका अध्यक्ष प्रकाश चंद जोशी और जीबी पंत हिमालयी पर्यावरण संस्थान के सहयोग से इसको लगाया गया.

वैज्ञानिक डॉक्टर सतीश चंद्र आर्य ने बताया कि जिंको बाइलोबा इस पेड़ का वैज्ञानिक नाम है. इसको मेडेनहेयर ट्री नाम से भी जाना जाता है. यह पेड़ जुरासिक युग का यानी 29 करोड़ वर्ष पूर्व प्रजाति का पेड़ है. मूल रूप से इसकी उत्पत्ति चीन में हुई थी.

बताते चलें कि अल्मोड़ा के पंत पार्क में देवदार के पेड़ पर लिपटी बोगनविलिया की बेल शहर की खूबसूरती में चार चांद लगाती थीं. 100 साल से ज्यादा समय से शहर के माल रोड पर यह पेड़ मुख्य आकर्षण का केंद्र था. पिछले साल भारी बारिश से पेड़ गिर गया था, जिसके बाद उस जगह पर भरपाई के लिए इस खूबसूरत व दुर्लभ प्रजाति के पेड़ को लगाया गया, जो आने वाले समय में शहर की सुंदरता को बढ़ाएगा.

अल्मोड़ा में है महात्मा गांधी का लोटा, बापू ने इस वजह से किया था नीलाम

महात्मा गांधी ने अपने लोटे को नीलाम कर दिया था.

अल्मोड़ा में महात्मा गांधी के द्वारा नीलाम किया गया लोटा आज भी सुरक्षित है.

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स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अल्मोड़ा भ्रमण पर भी आए थे. बापू ने 20 जून, 1929 को लक्ष्मेश्वर मैदान में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया था और अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए देश की आजादी के लिए युवाओं में अलख जगाई थी. इस मैदान को अब गांधी सभा स्थल शहीद पार्क लक्ष्मेश्वर के नाम से जाना जाता है. बापू ने अपने एक लोटे को यहां नीलाम किया था.

अल्मोड़ा में महात्मा गांधी के द्वारा नीलाम किया गया लोटा आज भी सुरक्षित है. उस दौर में व्यापारी धनी शाह ने इसे खरीदा था. चांदी का यह लोटा शाह परिवार के पास ही है. भारत की आजादी के लिए महात्मा गांधी ने अपने बर्तन तक नीलाम कर दिए थे.

बताते चलें कि कुमाऊं भ्रमण के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 19 जून, 1929 की शाम अल्मोड़ा पहुंचे थे. राष्ट्रपिता ने रानीधारा में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हरीश चंद्र जोशी के घर पर रात्रि विश्राम किया था. वर्तमान में इस भवन में ग्रेस स्कूल संचालित है. पालिका परिषद ने गांधी सभा स्थल लक्ष्मेश्वर को संरक्षित किया है. यहां पर शहीद स्मारक स्थापित किया गया है, जिसे अब गांधी सभा स्थल शहीद पार्क लक्ष्मेश्वर के नाम से जाना जाता है.

उत्तराखंड की पहचान है बाल मिठाई और सिंगौड़ी, अल्मोड़ा में कैसे हुई इसकी शुरुआत?

अल्मोड़ा की बाल मिठाई दुनियाभर में मशहूर है.

अल्मोड़ा की बाल मिठाई का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है. वहीं सिंगौड़ी भी इस शहर की पहचान है.

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आज हम आपको उत्तराखंड की एक ऐसी मिठाई से रूबरू कराने जा रहे हैं, जो न केवल राज्य में बल्कि देश-दुनिया में अपनी पहचान बना चुकी है. हम बात कर रहे हैं अल्मोड़ा की बाल मिठाई की. इस मिठाई का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है. उत्तराखण्ड के पर्वतीय शहर अल्मोड़ा में बाल मिठाई के अविष्कारक हलवाई स्व. जोगा लाल शाह माने जाते हैं.

जोगा लाल शाह ने ही 1865 में पहली बार बाल मिठाई बनाई थी. तब अंग्रेजों को यह मिठाई काफी पसंद आई थी. जिसके बाद वे लोग इसे ब्रिटेन व अन्य देश ले जाने लगे. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जब अल्मोड़ा आए थे, तो बापू को भी बाल मिठाई भेंट की गई थी.

बाल मिठाई के बारे में यह भी कहा जाता है कि यह मिठाई सबसे पहले सातवीं शताब्दी में नेपाल से आई थी और इसे सूर्य देवता को समर्पित करने वाले प्रसाद के रूप में जाना जाता था.

वहीं अल्मोड़ा शहर एक और खास मिठाई के लिए जाना जाता है, जिसका नाम सिंगौड़ी है. यह मिठाई शुद्ध खोया की बनती है. इसे मालू के पत्ते में लपेटकर ग्राहकों को परोसा जाता है. अल्मोड़ा के अलावा अब ये मिठाइयां कई शहरों में आसानी से मिल जाती हैं लेकिन अगर आपको इनका असली स्वाद चखना है, तो आपको अल्मोड़ा आना ही पड़ेगा.

अल्मोड़ा में है उत्तराखंड की देवी का मंदिर, 350 साल से हो रही मां नंदा की पूजा

यह राज्य के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है.

अल्मोड़ा में करीब 350 साल से मां नंदा देवी की पूजा की जाती है.

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मां नंदा देवी को शैलपुत्री का रूप माना जाता है. यह देवी मां के 9 रूपों में से एक हैं. अल्मोड़ा में करीब 350 साल से मां नंदा देवी की पूजा की जाती है. वैसे मां नंदा देवी की पूजा समूचे उत्तराखंड में होती है और उन्हें उत्तराखंड की देवी माना जाता है. देवी भागवत में नंदा को शैलपुत्री के रूप में 9 देवियों में एक माना गया है.

अल्मोड़ा में नंदा देवी का प्राचीन मंदिर स्थापित है. 1670 में कुमाऊं के चंद वंशीय शासक राजा बाज बहादुर चंद बधाणगढ़ के किले से नंदा देवी की स्वर्ण प्रतिमा को अल्मोड़ा लाए थे. इस प्रतिमा को उन्होंने मल्ला महल (वर्तमान कलक्ट्रेट) परिसर में प्रतिष्ठित किया और अपनी कुलदेवी के रूप में पूजन शुरू किया.

कुमाऊं अंचल में नंदा देवी की पूजा को व्यापक स्वरूप चंद शासकों के काल में मिला. कत्यूरी, चंद और गढ़वाल के नरेश मां नंदा को कुलदेवी के रूप में पूजते रहे. 1699 में राजा ज्ञानचंद भी बधानकोट से देवी मां की एक स्वर्ण प्रतिमा अल्मोड़ा लाए थे.

1710 में राजा जगत चंद को बधानकोट विजय के अवसर पर नंदा देवी की प्रतिमा नहीं मिली तो उन्होंने अपने खजाने से 200 अशर्फियों को गलाकर नंदा देवी की प्रतिमा का निर्माण कराया और यह मूर्ति भी मल्ला महल स्थित नंदा देवी मंदिर में प्रतिष्ठित की गई.

अल्मोड़ा के इस मंदिर में चिट्ठी लिखने से पूरी होती है हर मन्नत!

अल्मोड़ा का चितई गोलू देवता मंदिर.

चितई गोलू देवता का मंदिर अल्मोड़ा से 8 किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ हाईवे पर स्थित है.

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उत्तराखंड में गोलू देवता (गोल्ज्यू महाराज) को न्याय का देवता माना जाता है. राज्य में गोलू देवता के कई मंदिर हैं लेकिन इनमें सबसे लोकप्रिय और आस्था का केंद्र अल्मोड़ा में स्थित चितई गोलू देवता का मंदिर है. आमतौर पर इस मंदिर में हमेशा भक्तों की भारी भीड़ नजर आती है, लेकिन इस समय कोरोना के चलते यहां श्रद्धालुओं की संख्या में कमी देखने को मिल रही है.

गोलू देवता को स्थानीय संस्कृति में सबसे बड़े और त्वरित न्याय के देवता के तौर पर पूजा जाता है. इन्हें राजवंशी देवता के तौर पर भी पुकारा जाता है. गोलू देवता को उत्तराखंड में कई नामों से पुकारा जाता है, इनमें से एक नाम गौर भैरव भी है.

गोलू देवता को भगवान शिव का ही एक अवतार माना जाता है. भक्त इस मंदिर में चिट्ठियों पर अपनी मनोकामना लिखते हैं और इन्हें परिसर में ही रख देते हैं. मन्नत पूरी होने पर वे भगवान को घंटी चढ़ाते हैं.

उत्तराखंड ही नहीं बल्कि विदेशों से भी गोलू देवता के इस मंदिर में लोग न्याय मांगने के लिए आते हैं. मंदिर की घंटियों को देखकर आपको इस बात का अंदाजा लग जाएगा कि यहां मांगी गई किसी भी भक्त की मनोकामना कभी अधूरी नहीं रहती है.

बताते चलें कि चितई गोलू मंदिर अल्मोड़ा से 8 किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ हाईवे पर है.

उत्तराखंड में जन आशीर्वाद यात्रा से BJP जोश में,केंद्रीय मंत्री अजय भट्ट ने किया ये दावा

भाजपा उत्तराखंड में जन आशीर्वाद रैली निकाल रही है. (File Photo)

BJP Jan Ashirwad Yatra : उत्तराखंड के भाजपा नेता अजय भट्ट कह रहे हैं कि केंद्र की मोदी सरकार को धन्यवाद देने के मकसद से राज्य में जन आशीर्वाद निकाली जा रही है, जिसमें लोगों का उत्साह पार्टी में अपना विश्वास जताता दिख रहा है.

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अल्मोड़ा. उत्तराखंड में ​अगले साल के शुरुआती महीनों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों की तैयारी करते हुए राज्य में भाजपा ने जन आशीर्वाद यात्रा का जो आयोजन किया, उसमें भाजपा को भारी जन समर्थन मिलने का दावा किया जा रहा है. भाजपा के नेता गदगद हैं और 2022 चुनाव में पिछली बार से भी अधिक सीटें मिलने का दावा कर रहे हैं. इस यात्रा का दूसरा चरण सांसद और केंद्रीय मंत्री अजय भट्ट के नेतृत्व में जारी है. अल्मोड़ा में इस यात्रा के दौरान भट्ट और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक ने राज्य में भाजपा के फिर सत्ता में आने का दावा किया.

भाजपा ने मैदान से लेकर कुमाऊं और गढ़वाल तक जन आशीर्वाद यात्रा का आयोजन किया, जिसमें युवा और महिलाओं के भारी संख्या में शामिल होने का दावा किया जा रहा है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सहित पूरा संगठन इन खबरों से खुश नज़र आ रहा है. कौशिक का कहना है कि केन्द्र और राज्य सरकार ने जनकल्याणकारी योजनाएं चलाईं. जन आशीर्वाद यात्रा में जन सैलाब को देखकर लगता है कि भाजपा दोबारा राज्य में सरकार बनाएगी और 2022 से भी अधिक सीटें जीतेगी.

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एक पब्लिक रैली के दौरान सांसद अजय भट्ट. (File Photo)

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बीते दिनों केन्द्रीय राज्य मंत्री बनाए गए अजय भट्ट ने कहा ‘इस बार उत्तराखण्ड में पिछले बार से भी अधिक सीटें भाजपा जीतेगी. राज्य में अलग-अलग जगहों पर जनसभा में लोगों के समर्थन से विश्वास जगता है कि लोग आशीर्वाद देंगे.’ गौरतलब है कि उत्तराखंड में चुनावी राजनीति ज़ोरों पर आ रही है. भाजपा की जन आशीर्वाद यात्रा के मुकाबले कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा भी सुर्खियों में है. 2022 चुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है तो आम आदमी पार्टी सहित अन्य दलों की भी सक्रियता बढ़ गई है.

Good News : अल्‍मोड़ा के लोगों को 70 साल बाद 120 सीढ़ी चढ़ने से मिली निजात, नये कलेक्ट्रेट में शिफ्ट हो रहे विभाग

अल्‍मोड़ा के नये कलेक्ट्रेट में 1 महीने में सभी विभाग शिफ्ट हो जाएंगे.

Almora News: अल्‍मोड़ा में नया कलेक्ट्रेट (Almora Collectorate) बनकर तैयार हो गया है. यही नहीं, इसमें सभी विभागों के शिफ्ट होने का दौर शुरू हो गयाहै. जबकि राजाओं, ब्रिटिश कमिश्नरी और आजाद भारत में 7 दशकों तक प्रशासनिक व्यवस्था का केंद्र रहे मल्ला और रानी महल (Rani Mahal) अब पर्यटक स्‍थल बनेंगे.

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अल्मोड़ा. उत्तराखंड (Uttarakhand) के अल्‍मोड़ा का नया कलेक्ट्रेट (Almora Collectorate) स्यालीधार के पास बनकर तैयार हो गया है और अब अधिकारियों सहित फरियादियों को 120 सीढ़ी चढ़ने से निजात मिल जाएगी. वहीं, अपर जिलाधिकारी सीएस मर्तोलिया के मुताबिक, एक महीने के अंदर से सभी विभाग नये भवन में शिफ्ट हो जाएंगे. वहीं, 500 सालों तक प्रशासनिक व्यवस्था का केन्द्र रहा मल्ला और रानी महल (Rani Mahal) अब पर्यटकों को आकर्षित करेगा.

इतिहासकार व वरिष्ठ पत्रकार नवीन बिष्ट ने बताया कि चंद राजाओं, ब्रिटिस शासन और आजाद भारत में अल्मोड़ा के मल्ला महल से ही कई शदियों तक प्रशासनिक व्यवस्था चली. अब प्रशासनिक व्यवस्था के लिए स्यालीधार में नया कलक्ट्रेट बना दिया है जिस पर डीएम सहित अन्य विभागों के शिफ्ट होने का काम जारी है. एक महीने के अन्दर सभी प्रशासनिक व्यवस्था स्यालीधार के नये कलेक्ट्रेट भवन से संचालित होंगी. मल्ला महला और रानी महल इतिहास में दर्ज हो जायेगा.

नये भवन में सभी विभाग होंगे शिफ्ट
अल्‍मोड़ा के अपर जिलाधिकारी सीएस मर्तोलिया का कहना है कि कलेक्ट्रेट का नया भवन स्यालीधार के पास बनकर तैयार हो गया है. जबकि विभागों का शिफ्ट होना शुरू हो गया है. एक महीने तक सभी विभाग शिप्ट हो जाएंगे. कुछ फर्नीचर के आने में देरी हो रही है, उसके आते ही जिलाधिकारी सहित सभी विभाग शिफ्ट हो जाएंगे. वहीं, लोगों को वहां आने जाने के लिए परिवहन विभाग की मदद से व्यवस्था भी की जा रही है.

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इस वजह सेअल्‍मोड़ा को मिली चर्चा
उत्तराखंड का एकमात्र 100 से अधिक सीढ़ी चढ़कर जाने वाला कलक्ट्रेट भी अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है. जहां से चंद राजाओं, फिर ब्रिटिश कमिश्नरी और आजाद भारत में 7 दशकों तक प्रशासनिक व्यवस्था चली. पर्यटकों के लिए मल्ला और रानी महल को विकसित करने से यहां आने वाले पर्यटक इतिहास के बारे में जान सकेंगे.

शहीदों को श्रद्धांजलि देने धामदेव में जुटे उत्तराखंड कांग्रेस कार्यकर्ता, नहीं दिखे भाजपाई

अगस्त क्रांति के शहीदों को श्रद्धांजलि कार्यक्रम में पहुंचे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल.

Uttarakhand Politics : कांग्रेस विधायक ने भाजपा पर शहीदों की सुध न लेने वाली औश्र विकास विरोधी पार्टी होने का आरोप लगाया. वहीं, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत का दावा किया.

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अल्मोड़ा. सालम स्थित धामदेव अगस्त क्रांति का मुख्य केन्द्र रहा है. 25 अगस्त 1942 को अंग्रेजों की गोली से दो लोग शहीद हो गए थे, तबसे आंदोलन की आग कुमाऊं भर में भड़की थी. उन्हीं शहीदों को याद करने के लिए बुधवार को कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल शहीद स्थल पहुंचे. गोदियाल के साथ स्थानीय विधायक गोविन्द सिंह कुंजवाल, प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष जीत राम सहित कुमाऊं भर के कांग्रेस कार्यकर्ता इस मौके पर मौजूद रहे लेकिन भाजपा का कोई जनप्रतिनिधि या नेता शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए शहीद स्थल नहीं पहुंचा.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल का कहना है कि उत्तराखण्ड शहीदों की भूमि है. अल्मोड़ा ज़िला तो आंदोलन का मुख्य गढ़ रहा है. ‘अल्मोड़ा की जेल हो, सल्ट के देघाट हो, सोमेश्वर का चनौदा या फिर जैती का सालम, सभी जगहों पर अंग्रेंजों के खिलाफ लोगों ने मोर्चा खोल दिया था.’ इसके साथ ही गोदियाल ने कहा, ‘मैं प्रदेश की जनता को विश्वास दिलाता हूं कि आगामी सरकार राज्य में कांग्रेस की ही बनेगी.’

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शहीदों को श्रद्धांजलि देने के कांग्रेस के कार्यक्रम में उमड़ी भीड़.

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इस अवसर पर जागेश्वर विधायक गोविन्द सिंह कुंजवाल ने कहा कि पिछले कई दशकों से यहां शहीदों को श्रद्धांजलि का कार्यक्रम विकास महोत्सव के रूप में मनाया जाता है. कुंजवाल के मुताबिक ‘यह विकास की घोषणाओं का मंच रहा है लेकिन भाजपा के किसी मंत्री ने इस पर ध्यान नहीं दिया. उन्होंने शहीदों के नाम पर राजनीति तो की लेकिन शहीदों को कभी नमन नहीं किया.’ कुंजवाल ने कहा कि कांग्रेस ही गरीबों और विकास की पक्षधर रही है.

उत्तराखंड का अजब सिस्टम, मरीजों के लिए मिली एंबुलेंस को दवाओं की ढुलाई में लगाया!

अल्मोड़ा में स्वास्थ्य विभाग की एंबुलेंस सेवा.

Uttarakhand News : जिस प्रदेश में मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस की उपलब्धता बड़ी चुनौती है, वहां एंबुलेंस को दवाओं की ढुलाई में लगाने को कैसे उचित कह सकते हैं? आइए जानते हैं कि सांसद और लोगों की राय क्या है और इसके उलट विभाग की क्या दलील है?

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अल्मोड़ा. उत्तराखंड के पहाड़ों में दूरदराज के इलाकों तक यह समस्या आम है कि मरीज़ों को समय पर एंबुलेंस सुविधा नहीं मिल पाती. ऐसे में, स्वास्थ्य विभाग की एक व्यवस्था चर्चा में आ गई है, क्योंकि जिस एंबुलेंस का उपयोग मरीजों को अस्पताल तक ले जाने में किया जाना चाहिए, उसका इस्तेमाल सीएमओ दफ्तर से ब्लॉक अस्पतालों के लिए दवाई भेजने के लिए किया जा रहा है. अब स्थानीय लोग इस व्यवस्था से अचंभे में हैं, तो सांसद भी इसे वाजिब कदम नहीं कह रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग का नज़रिया यही है कि एंबुलेंस का यह उपयोग करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए.

अल्मोड़ा के स्वास्थ्य विभाग ने एंबुलेंस को लोडिंग वाहन बना दिए जाने के बारे में आरोपों से पल्ला झाड़ लिया है. सीएमओ ड़ॉ. सविता ह्यांकि का दावा है कि सभी ब्लॉकों के 108 सेवा चल रही है. उनके मुताबिक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के प्रभारियों के पास गाड़ियां नहीं हैं और ‘इस स्थिति में अगर किसी एंबुलेंस को दवाई पहुंचाने में उपयोग किया जाता है तो कोई गलत बात नही है.’ दूसरी तरफ, जन और जनप्रतिनिधि कुछ और ही कह रहे हैं.

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अल्मोड़ा में एंबुलेंस का इस्तेमाल दवाओं के ट्रांसपोर्ट के लिए किया जा रहा है.

‘लोगों को बेहतर सुविधा मिलना चाहिएः सांसद
दवाई के परिवहन के लिए जिस एंबुलेंस के इस्तेमाल की बात सामने आई है, वह सासंद अजय टम्टा की सांसद निधि से खरीदी गई थी. इस बारे में न्यूज़18 ने सांसद से बातचीत की, तो सांसद टम्टा ने कहा कि जिस उद्देश्य के लिए एंबुलेंस दी गई है, उसका उपयोग उसी के लिए होना चाहिए. स्वास्थ्य विभाग को तय करना चाहिए कि ज़रूरी क्या है, जिससे लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें.

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क्या कहते हैं लोग
वहीं, स्थानीय निवासी लक्ष्मी दत्त ने बताया कि धौलादेवी ब्लॉक में कई बार ऐसा होता है कि 108 को फोन करो तो एंबुलेंस के व्यस्त होने की बात कही जाती है. कई बार लोग आधे रास्ते तक गर्भवती महिलाओं और मरीजों को अपने निजी वाहनों से ले जा चुके होते हैं, तब जाकर एंबुलेंस पहुंचती है. दत्त का कहना है कि दवाइयां पहुंचाने या अन्य कामों के लिए दूसरे वाहनों का इस्तेमाल किया जा सकता है और एंबुलेंस को तत्काल राहत के लिए ही रखा जाना चाहिए.

Uttarakhand: रेलवे पेंशन बंद होने से भुखमरी की हालात में दिव्यांग, CM से लगाई गुहार

उत्तराखंड के बनबसा निवासी एक दिव्यांग आश्रित की रेलवे पेंशन बंद हो गई है. इससे आश्रित भुखमरी की हालात में पहुंच गया है.

Uttarakhand News: उत्तराखंड के बनबसा निवासी दिव्यांग देव सिंह को को रेलवे विभाग द्वारा आश्रित पेंशन न दिए जाने से उनके सामने भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है. दिव्यांग ने अब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मदद की गुहार लगाई है.

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बनबसा. उत्तराखंड के बनबसा निवासी दिव्यांग देव सिंह को रेलवे विभाग की आश्रित पेंशन नहीं मिलने से उसके सामने भुखमरी के हालात पैदा हो गए हैं. परेशान होकर दिव्यांग ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मदद की गुहार लगाई है. 70 प्रतिशत दिव्यांग देव सिंह आश्रित पेंशन हेतु तीन साल से मुरादाबाद मंडल कार्यालय के चक्कर काट रहा है, लेकिन उसे हर बार निराश और हताश होना पड़ा है.

देश व प्रदेश में भले ही दिव्यांगों के कल्याण व उनके जीवन को आसान बनाने हेतु सरकारों द्वारा तमाम योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन इन योजनाओं को खुद देश का सबसे बड़ा महकमा पलीता लगा रहा है. बनबसा चंदनी निवासी देव सिंह ने अब थक हार कर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मदद मांगी है. जन्म से ही देव सिंह के पास जिला मेडिकल बोर्ड द्वारा जारी 70 प्रतिशत दिव्यांगता का प्रमाण पत्र भी है.

पीड़ित दिव्यांग देव सिंह ने बताया कि उनके पिता रेलवे आरपीएफ के कर्मचारी रहे थे. दिव्यांग होने के चलते वह पूर्ण रूप से अपने माता पिता पर आश्रित थे. पिता का देहांत 2006 में हो गया था. उनकी माता भी 2013 में कैंसर के चलते चल बसी. उनके दोनों भाई भी बेरोजगार हैं, जिसके चलते वह अपने परिवार का भरण पोषण भी बमुश्किल से कर पा रहा है. वहीं इस दौरान उन्हें पता चला की जिन दिव्यांग के माता पिता सरकारी सेवा में हो, अगर उनका देहांत हो जाये तो दिव्यांग को अपने जीवन को चलाने हेतु सरकार आश्रित पेंशन जारी करती है. इस सूचना के बाद दिव्यांग देव सिंह वर्ष 2017 में आरपीएफ मुरादाबाद मंडल में कागजी कार्यवाही शुरू की गई, लेकिन अभी तक उसे लाभ नहीं मिल पाया है.

Almora News: अल्मोड़ा जेल के नेहरू वार्ड को पर्यटकों के लिए खोलने की कवायद तेज, जानें क्‍या है अगस्त क्रांति से संबंध

अल्मोड़ा जेल में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू समेत कई लोग बंद रहे थे.

Almora Jail: अंग्रेजों द्वारा 1872 में स्थापित अल्मोड़ा जेल (Almora Jail) का अगस्त क्रांति से खास संबंध रहा है. वहीं, इस जेल में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) के नाम से बने वार्ड को खोलने की योजना को लेकर जेल प्रशासन कवायद कर रहा है.

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अल्मोड़ा. उत्तराखंड के अल्मोड़ा की ऐतिहासिक जेल (Almora Jail) 1872 में अंग्रेजों द्वारा स्थापित की गयी थी. यह जेल अगस्त क्रांति की प्रमुख गवाह रही है. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू (Jawaharlal Nehru), हरगोविन्द पंत, विक्टर मोहरन जोशी, देवी दत्त पंत, आर्चाय नरेन्द्र देव, बद्री दत्त पांडेय, खान अब्दुल गफ्फार खां, सैय्यद अली जहीर और दुर्गा सिंह रावत सहित 476 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जेल में निरुद्ध रहे थे. हालांकि इस वक्‍त जेल नेहरू वार्ड को खोलने की कवायद को लेकर चर्चा में है.

जेल अधीक्षक संजीव सिंह कहा कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू दो बार इस जेल में बंद रहे. जबकि उन्‍होंने अपनी बुक ‘मेरी आत्मकथा’ के कुछ अंश भी इसी जेल में लिखे थे. इसके अलावा उनकी चारपाई, कुर्सी, चरखा और खाने के बर्तन जेल के वार्ड में आज भी हैं. वहीं, नेहरू वार्ड को पर्यटकों के लिए खोलने का प्रस्ताव शासन को भेजा है.

मंत्री बिशन सिंह चुफाल ने कही ये बात
जिले के प्रभारी मंत्री बिशन सिंह चुफाल का कहना है कि अल्मोड़ा की जेल ऐतिहासिक है. मुझे में जेल में जाने का मौका मिला है. जेल अगस्त आजादी की गवाह है. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू दो बार इस जेल में निरुद्ध रहे. इसके साथ ही कई स्वतंत्रता संग्रास सेनानी इस जेल में रहे हैं. नेहरू वार्ड को पर्यटकों के लिए खोलने की योजना बनायी जायेगी.

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अल्मोड़ा जेल अगस्त क्रांति की प्रमुख गवाह रही है.

उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पीसी तिवारी का कहना है कि भाजपा और कांग्रेस सत्ता में आने के बाद पर्यटक स्थलों की तरफ ध्यान नहीं रख रहे हैं. सरकार को पर्यटकों के लिए नेहरू वार्ड को खोलना चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़ी को जेल के इतिहास के बारे में जानकारी मिल सके.
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बता दें कि राज्य बनने के बाद ही अल्मोड़ा के नेहरू वार्ड को पर्यटकों के लिए खोलने की मांग समय-समय पर उठती रही, लेकिन भाजपा और कांग्रेस बारी-बारी से सत्ता का खुश भोगने के बाद योजना को फाइलों में दौडाते रहे, लेकिन अगस्त क्रांति की गवाह रही जेल को पर्यटकों के लिए नहीं खोला जा सका है.

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