सामाजिक सौहार्द की मिसाल पेश करती है अल्मोड़ा की रामलीला

रावण के पुतलों को बाजार में घुमाते लोग

यहां रावण परिवार के पुतलों का तो अपने आप में इतिहास है ही, साथ ही यहां की रामलीला सामाजिक सौहार्द का जीता जागता उदारहरण है.

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अल्मोड़ा की रामलीला समाजिक सौहार्द की एक बड़ी मिशाल पेश करती है. कहा जाता है कि यहां की रामलीला कई मायनों में खास है. यहां रावण परिवार के पुतलों का तो अपने आप में इतिहास है ही, साथ ही यहां की रामलीला सामाजिक सौहार्द का जीता जागता उदारहरण है.

देवभूमि उत्तराखंड में दशहरा के दौरान रामलीला का लंबा इतिहास रहा है. सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा के इस रामलीला में सबसे पहले 1865 में मात्र रावण का पुतला बनाया गया था, लेकिन अब रावण के साथ मेघनाथ, कुंभकरण, ताड़िका, खर-दूषण के अलावा रावण के परिवार के दो दर्जन से अधिक पुलते बनाए जाते हैं. इन विशालकाय पुतलों को तैयार करने के लिए कलाकार एक महीने तक कड़ी मेहनत करते हैं. पुतला बनाने वाले कलाकारों का कहना है कि पुतला तैयार करने के लिए वे दिन रात मेहनत करते हैं.

बता दें कि अल्मोड़ा में दशहरे के दिन रावण परिवार के पुतलों को पूरे शहर में उल्लास के साथ घुमाया जाता हैं. इसके बाद स्टेडियम में लाकर इन पुतलों का दहन किया जाता हैं.  हिन्दू और मुस्लिम कारीगर मिलकर इन पुतलों पूरी लगन से बनाते है.

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता हैं कि अल्मोड़ा की रामलीला ऐतिहासिक सामाजिक एकता को मनोरंजन के जरिए एक सूत्र में बांधने का काम करती है. दशकों गुजर जाने के बाद भी रामलीला का आकर्षण ज्यों का त्यों बना हुआ है.

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