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उत्तराखंड: देवीधुरा की ऐतिहासिक बग्वाल, जानें क्यों इस 4 खाम के लोग एक-दूसरे को मारते हैं पत्थर?

उत्तराखंड: देवीधुरा की ऐतिहासिक बग्वाल, जानें क्यों इस 4 खाम के लोग एक-दूसरे को मारते हैं पत्थर?

देवीधुरा मंदिर के आचार्य कीर्ति बल्लभ जोशी ने बताया कि पहले यहां नर बलि की प्रथा होती थी. यहां पर चम्याल खाम की बुजुर्ग महिला के बेटे की बलि की बारी आई, तो उस महिला ने उस बलि को रुकवाया.

रिपोर्ट: रोहित भट्ट

देवीधुरा: उत्तराखंड के अल्मोड़ा से तकरीबन 75 किलोमीटर की दूरी पर है विश्व प्रसिद्ध देवीधुरा का मंदिर, यहां प्राचीन काल से बग्वाल खेली जाती है. देवीधुरा चंपावत जिले में आता है. रक्षाबंधन के दिन यहां बग्वाल खेलने की प्रथा है. यहां फलों और पत्थरों से एक दूसरे को मारा जाता है. लाखों लोगों की मौजूदगी में होने वाली बग्वाल में 4 खामों चम्याल, गहरवाल, लमगड़िया और वालिग के अलावा सात थोकों के योद्धा फरों के साथ हिस्सा लेते हैं. रक्षाबंधन पर्व पर यहां देश ही नहीं विदेश से भी दर्शक इस बग्वाल को देखने के लिए आते हैं.

बताया जाता है कि यहां पहले नर बलि दी जाती थी. जब गांव की एक बुजुर्ग महिला के बेटे की बारी आई, तो उस महिला ने देवी मां की तपस्या की. देवी ने महिला को बताया कि नर बलि न देकर एक व्यक्ति के बराबर रक्त होना चाहिए. तबसे लेकर अभी तक इस बग्वाल में लोग फलों और पत्थरों से खेलते हैं. जब तक लोगों को चोट नहीं लग जाती और उनके खून नहीं निकल जाता, तब तक बग्वाल खेली जाती है.

देवीधुरा की बग्वाल में चार खाम के लोग हिस्सा लेते हैं. पुजारी की शंखनाद से इस बग्वाल को शुरू किया जाता है और जब तक वहां एक मनुष्य के बराबर रक्त नहीं बहता, तब तक यह युद्ध चलता रहता है. इस बार की बग्वाल करीब 9 मिनट तक चली, जिसमें 50 से ज्यादा लोग घायल हुए.

बग्वाल खेलने पहुंचे मदन जोशी ने बताया कि वह पिछले 5 सालों से बग्वाल खेल रहे हैं. उन्हें बग्वाल खेलते समय चोट लगी है और वह काफी खुश हैं कि मां ने उन्हें आशीर्वाद दिया है. इस मंदिर में लोगों की मनोकामना भी पूरी होती है. वहीं, मुंबई से पहुंचे प्रेम सिंह ने बताया कि वह हर साल बग्वाल खेलने के लिए यहां पहुंचते हैं. उन्हें भी चोट आई है और वह काफी खुश हैं कि मां ने उन्हें भी आशीर्वाद दिया है.

देवीधुरा मंदिर के आचार्य कीर्ति बल्लभ जोशी ने बताया कि पहले यहां नर बलि की प्रथा होती थी. यहां पर चम्याल खाम की बुजुर्ग महिला के बेटे की बलि की बारी आई, तो उस महिला ने उस बलि को रुकवाया. देवी मां ने उसे दर्शन देते हुए कहा कि एक मनुष्य के बराबर का रक्त होना चाहिए. तब से यहां चार खामों के बीच बग्वाल खेलने की प्रथा चली आ रही है. जोशी बताते हैं कि उन्होंने अपने समय में 45-45 मिनट तक बग्वाल होते हुए देखी है.

Tags: Almora News, Uttarakhand news

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