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दौड़ नहीं सकती तो अब व्हील चेयर से ही भारत के लिए ओलंपिक पदक जीतने की तैयारी में है गरिमा जोशी

मई 2018 तक गरिमा कई पदक जीत चुकी थीलेकिन 31 मई 2018 को बेंगलुरु में प्रैक्टिस के दौरान जो एक्सीडेंट हुआ उसने उसकी जिंदगी को नई राह पर डाल दिया.

मई 2018 तक गरिमा कई पदक जीत चुकी थीलेकिन 31 मई 2018 को बेंगलुरु में प्रैक्टिस के दौरान जो एक्सीडेंट हुआ उसने उसकी जिंदगी को नई राह पर डाल दिया.

अल्मोड़ा की गरिमा की कहानी एक प्रतिभावान खिलाड़ी से भी ज़्यादा मजबूत इरादों की कहानी है

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अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट की एथलीट गरिमा जोशी की कहानी एक प्रतिभावान खिलाड़ी से भी ज़्यादा मजबूत इरादे और मुश्किलों को हराकर जीत की तैयारी की कहानी है. गरिमा का खेल का सफर 2013 से शुरु हुआ था जब उसने 2013 में देहरादून में आयोजित मैराथन में तीसरा स्थान पाया था. इसके बाद 2014 में उसने नेशनल गेम्स का हिस्सा लिया और 2015 में नेशनल बास्केटबाँल चैंपियन भी खेली. गरिमा की प्रतिभा और हिम्मत को राज्य सरकार ने 'बेटी बचाओ, बेटी बढ़ाओ' अभियान में उसकी तस्वीर लगाकर सम्मान दिया. मई 2018 तक गरिमा कई पदक जीत चुकी थीलेकिन 31 मई 2018 को बेंगलुरु में प्रैक्टिस के दौरान जो एक्सीडेंट हुआ उसने उसकी जिंदगी को नई राह पर डाल दिया. गरिमा विक्लांग हो गई लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी और अब पैरा ओलंपिक में देश को मेडल दिलाने के लिए तैयारी कर रही है.

पदक जीतने का विश्वास 

न्यूज 18 से बात करते हुए गरिमा जोशी ने कहा कि लॉकडाउन के कारण वह मार्च से अपने गांव द्वाराहाट में ही है. जल्दी ही वह बेंगलुरु, दिल्ली और फिर मुंबई जाकर पैरा ओलंपिक की तैयारी शुरु कर देंगी. गरिमा 2021 में देश को पैरा ओलंपिक में पदक दिलाने के लिए तैयारी कर रही हैं और उन्हें पदक जीतने का पूरा भरोसा है.

लेकिन यह सब इतना आसान नहीं जितना लग रहा है. गरिमा जोशी भले ही द्वाराहाट से निकलकर देश के लिए पदक जीतने के लिए पूरी तैयारी कर रही है लेकिन परिवार की स्थिति ऐसी नहीं कि उसकी तैयारी पर लाखों खर्च कर दे. सरकार से जो आश्वासन मिले थे, जो वादे किए गए थे वह पूरे नहीं हुए और गरिमा के पिता को यह पता नहीं कि बेटी के सपने पूरे कैसे होंगे?

गरीबी से जूझता परिवार 

गरिमा के पिता पूरन जोशी बताते हैं कि उनकी पत्नी की मौत कैंसर से हुई थी. उनके पास पत्नी के इलाज के लिए ही पैसे नहीं थे कि बेंगलुरु में बेटी का एक्सीडेंट हो गया. एक तरफ़ पत्नी का कैंसर का इलाज चल रहा था और दूसरी तरफ़ बेटी विक्लांग हो गई थी. सही इलाज नहीं मिलने के कारण गरिमा की मां की मौत हो गई.

पूरन जोशी कहते हैं कि राज्य सरकार ने बेटी के इलाज के लिए पूरे पैसे देने के साथ ही पत्नी के इलाज के लिए भी पैसा देने का वादा किया था. बेटी के अस्पताल का 13 लाख रुपये का बिल तो चुका दिया गया पत्नी और बेटी के अन्य इलाज के पैसे देने के लिए मना कर दिया. आज भी वह सीएम ऑफ़िस के कई काट चुके हैं ताकि जिस मदद का वादा किया गया था वह पूरी हो सके और वह उस समय के कर्ज़ चुका दें, बेटी की ट्रेनिंग करवा पाएं.

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