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आसान नहीं है कोसी का पुनर्जीवन... रिचार्ज करने वाले प्राकृतिक स्रोत भी सूखे

अल्मोड़ा में कोसी नदी का जलस्तर इतना कम हो गया है कि नदी सूखने के कगार पर है. प्राकृतिक जल स्रोत नौले भी उपेक्षा के शिकार हैं.

अल्मोड़ा में कोसी नदी का जलस्तर इतना कम हो गया है कि नदी सूखने के कगार पर है. प्राकृतिक जल स्रोत नौले भी उपेक्षा के शिकार हैं.

जीबी पंत हिमालय पर्यावरण और विकास संस्थान के अनुसार जो 1200 प्राकृतिक जल स्रोत हैं वह जल संवर्धन में अपनी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं.

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अल्मोड़ा में कोसी नदी का जलस्तर इतना कम हो गया है कि नदी सूखने के कगार पर है. प्राकृतिक जल स्रोत नौले भी उपेक्षा के शिकार हैं. जीबी पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान ने कोसी की स्थिति को लेकर जो आंकड़े दिए हैं वह डराने वाले हैं. ऐसे में कोसी नदी को पुनर्जिवित करने के अभियान का महत्व और बढ़ गया है.

जीबी पंत हिमालय पर्यावरण और विकास संस्थान के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया कि कोसी नदी में मिलने वाली 14 धाराओं की स्थिति ठीक नहीं हैं. संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक किरकिट कुमार कहते हैं कि सिर्फ़ इतना नहीं जो 1200 प्राकृतिक जल स्रोत हैं वह भी उपेक्षित हैं. अब ये नौले जल संवर्धन में अपनी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं.

डिप्टी स्पीकर रघुनाथ सिंह चौहान कोसी के पुनर्जीवन के सरकारों के प्रयास की सराहना करते हैं. वह कहते हैं कि मुख्यमंत्री ने कोसी और रिस्पना के पुनर्जीवन के लक्ष्य को अपना निजी एजेंडा बना लिया है. चौहान दावा करते हैं कि सरकार और लोग मिलकर कोसी नदी को एक पानी से भरी जीवनदायिनी नदी बना देंगे.

जीबी पंत इंस्टीट्यूट ने राज्य सरकार के सामने एक ख़ाका पेश कर दिया है कि कैसे कोसी को पुनर्जीवन दिया जा सकता है. इसलिए बेहतर है कि राज्य सरकार भी अपने तारीफों के पुल बांधने के बजाय ज़्यादा संजीदगी से कोसी के पुनर्जीवन के लिए काम करे.

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