Lockdown में रोजगार की राह, हर्बल चाय और जैम-जूस बेचकर एक हफ्ते में कमाए 10000
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Lockdown में रोजगार की राह, हर्बल चाय और जैम-जूस बेचकर एक हफ्ते में कमाए 10000
पहाड़ में जड़ी-बूटी सहित बहुत से हर्बल और ऑर्गेनिक उत्पाद होते हैं.

राज्य के बाहर काम से अर्जित अपने अनुभव और संपर्कों का फ़ायदा उठाकर Lockdown के बीच लौटे प्रवासी स्थानीय पहाड़ी उत्पादों की मार्केटिंग कर रहे हैं. अल्मोड़ा ज़िले में 2300 समूहों का गठन किया गया है जो इस काम में लगे हैं.

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अल्मोड़ा. लॉकडाउन (Lockdown 5.0) के कारण अपने घरों को वापस लौटे प्रवासियों की वजह से कोरोना वायरस संक्रमण के बाद कोई सबसे बड़ी चिंता है तो वह है रोज़गार की. उत्तराखंड ही नहीं यह समस्या पूरे देश की है कि वापस लौटे लोग अपने घरों में, ज़िलों में, राज्यों में काम क्या करेंगे, कमाएंगे कैसे. अल्मोड़ा लौटे प्रवासियों ने लोगों को एक राह दिखाई है. राज्य के बाहर काम से अर्जित अपने अनुभव और संपर्कों का फ़ायदा उठाकर ये लोग स्थानीय पहाड़ी उत्पादों की मार्केटिंग कर रहे हैं.ज़िले में आजीविका परियोजना के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों द्वारा बनाए जा रहे हर्बल चाय, बिस्कुट, जैम, जूस जैसे उत्पादों की मार्केटिंग कर एक एक युवक ने एक हफ़्ते में ही 10 हज़ार रुपये का कारोबार कर लिया है.

पहले से तैयार हो रहे उत्पाद 

आजीविका परियोजना के परियोजना निदेशक कैलाश भट्ट का कहना है कि आजीविका परियोजना के तहत ज़िले में 2300 समूहों का गठन किया गया है जो अपने-अपने क्षेत्र में उत्पादों की ग्रेडिंग कर पैंकिग कर रहे हैं. इससे महिलाओं को रोज़गार भी मिल रहा है.



पहाड़ में जड़ी-बूटी सहित बहुत से हर्बल और ऑर्गेनिक उत्पाद होते हैं. हर्बल टी, मसाले, जैसे कई उत्पाद महिला समिति तैयार करती हैं लेकिन बाज़ार के अभाव में कई लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं है. अब आजीविका परियोजना की नजर प्रवासियों पर है जो इन उत्पादों की मार्केटिंग कर इन्हें नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते हैं.



almora marketing of local produce 2, पहाड़ में जड़ी-बूटी सहित बहुत से हर्बल और ऑर्गेनिक उत्पाद होते हैं. हर्बल टी, मसाले, जैसे कई उत्पाद महिला समिति तैयार करती हैं
पहाड़ में जड़ी-बूटी सहित बहुत से हर्बल और ऑर्गेनिक उत्पाद होते हैं. हर्बल टी, मसाले, जैसे कई उत्पाद महिला समिति तैयार करती हैं.


पहले हफ़्ते में हज़ारों का कारोबार 

विक्रम सिंह भी लॉकडाउन के दौरान अपने गांव लौटे हैं. वह कहते हैं कि अब कोरोना संक्रमण की वजह से यह भी पता नहीं है कि कब तक मैदानों में जाकर काम मिलेगा. इसकी वजह से युवा परेशान हैं. लेकिन विक्रम ने इंतज़ार करने के बजाय पहाड़ी उत्पादों की मार्केटिंग का फ़ैसला किया और ऐसा लग रहा है कि सही किया.

विक्रम बताते हैं कि वह एक सप्ताह में ही 10,000 रुपये के पहाड़ी उत्पाद बेच चुके हैं. यही नहीं उन्हें हज़ारों रुपये की और डिमांड भी मिल गई है. वह कहते हैं कि पहाड़ में कई ऐसे ऑर्गेनिक उत्पाद हैं जिनकी मार्केटिंग न होने से उन्हें पहचान नहीं मिल पा रही है लेकिन कोशिश की जाए तो उनके लिए बड़ा बाज़ार तैयार हो सकता है.

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First published: June 1, 2020, 12:44 PM IST
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