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भगवान शिव ने गुरु द्रोणाचार्य को यहां सिखाई थी धनुर्विद्या, यहीं हुआ था अश्वत्थामा का जन्म

टपकेश्वर

टपकेश्वर महादेव मंदिर तमसा नदी के तट पर स्थित है.

इस शिवलिंग की सबसे रोचक बात यह है कि द्वापर युग में इस पर दूध की धाराएं गिरती थीं.

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    हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के लिए विख्यात देवभूमि उत्तराखंड न जाने कितने रहस्यमयी तथ्य अपने पास समेटे हुए है, जो न केवल पौराणिक कालखंडों को जीवंत स्वरूप देते हैं बल्कि मान्यताओं को और स्पष्ट भी करते हैं. राजधानी देहरादून से मात्र 10 किमी दूर गढ़ी कैंट छावनी क्षेत्र में तमसा नदी के तट पर स्थित है टपकेश्वर महादेव मंदिर.

    मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल से पूर्व गुरु द्रोणाचार्य के तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें यही दर्शन दिए थे. भगवान शिव ने उन्हें वर मांगने को कहा था, जिस पर द्रोणाचार्य ने भगवान से धनुर्विद्या सीखने का आग्रह किया था.

    कहा जाता है कि भगवान शिव ने द्रोणाचार्य के वर को स्वीकारते हुए उन्हें प्रतिदिन यहां धनुर्विद्या सिखाई थी. इसके बाद गुरु द्रोणाचार्य के अनुरोध पर ही भगवान शिव जगत कल्याण के लिए यहां लिंग के रूप में स्थापित हो गए. इस शिवलिंग की सबसे रोचक बात यह है कि द्वापर युग में इस पर दूध की धाराएं गिरती थीं.

    यहां हुआ था अश्वत्थामा का जन्म

    मान्यताओं के अनुसार, इसी जगह को गुरु द्रोण पुत्र अश्वत्थामा की जन्मस्थली व तपस्थली भी माना गया है, जहां अश्वत्थामा के माता-पिता गुरु द्रोणाचार्य व कृपि की पूजा-अर्चना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया था. जिसके बाद ही उनके घर अश्वत्थामा का जन्म हुआ था.

    ऐसा कहा जाता है कि एक बार अश्वत्थामा ने दूध पीने की इच्छा जताई, जो किसी कारणवश पूरी न हो सकी. इस पर द्रोण पुत्र ने लगातार 6 महीनों तक एक पांव पर खड़े होकर होकर घोर तप किया था, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने शिवलिंग के ऊपर स्थित चट्टान में गऊ थन बना दिए और दूध की धारा यहां बहने लगी.

    इसी वजह से भगवान शिव का नाम द्वापरयुग में दूधेश्वर पड़ गया. हालांकि कलयुग में यही दूध की धारा जल में परिवर्तित हो गई, जो आज भी निरंतर शिवलिंग पर गिर रही है. इस कारण इस स्थान का नाम टपकेश्वर पड़ गया.

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