मुर्गीपालन कर घर पर ही लाखों की कमाई कर रहे हैं अल्मोड़ा के युवा, कोरोना काल में बने प्रवासियों के लिए प्रेरणा
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मुर्गीपालन कर घर पर ही लाखों की कमाई कर रहे हैं अल्मोड़ा के युवा, कोरोना काल में बने प्रवासियों के लिए प्रेरणा
ल्मोड़ा के कई गांवों में हज़ारों मुर्गियों की क्षमता के मुर्गीफार्म बन गए है जहां युवा मुर्गीपालन के रूप में स्वरोज़गार कर रहे हैं.

मनीश शाह का कहना है कि पहले वह हल्द्वानी में नौकरी करते थे. वहां कमरे के किराए, खाने में ही पूरी सैलरी समाप्त हो जाती थी.

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अल्मोड़ा. अब पहाड़ में भी युवा तेजी से मुर्गीपालन को रोज़गार के रूप में अपना रहे हैं. अल्मोड़ा के कई गांवों में हज़ारों मुर्गियों की क्षमता के मुर्गीफार्म बन गए है जहां युवा मुर्गीपालन के रूप में स्वरोज़गार कर रहे हैं. पहाड़ की मुर्गियों की मांग पहाड़ के साथ मैदान में भी है. लोगों को आजीविका के साथ जोड़ने के लक्ष्य के साथ अल्मोड़ा में ग्राम्या परियोजना के तहत धौलादेवी ब्लॉक के 85 गांवों में काम किया जा रहा है. इसी परियोजना के तहत धौलादेवी के चार गांवों में मुर्गी पालन का काम शुरु किया गया है जिसमें हजारों की संख्या में मुर्गियां हैं.

कड़कनाथ समेत यह किस्में पाली जा रहींं 

आजीविका परियोजना के पशु चिकित्सक सुशील शाल का कहना है कि धौलादेवी ब्लाक के चार गांवों में चैंब्रो, क्रायलर, ब्रायलर और कड़कनाथ मुर्गी पहाड़ में ही पाली जा रही है. मुर्गीपालन करने वाले लोगों को डॉक्टरों की टीम लगातार सलाह दे रही है.



वह कहते हैं कि इन युवाओं को देखकर प्रवासी भी मुर्गीपालन को अपना रोज़गार बना सकते है. युवाओँ में मुर्गीपालन को लेकर काफी जोश है. इससे ये प्रतिमाह 20 हज़ार रुपये के आस-पास कमा रहे हैं. मुर्गीपालक दिनेश रावत का कहना है कि उन्होंने पिछले एक साल में एक लाख से अधिक मुर्गीपालन से ही कमा लिया है. इसके साथ ही घर पर ही सब्ज़ी उत्पादन भी कर रहे हैं.

किराए-खाने में जाती थी सैलेरी 

मुर्गीपालक मनीश शाह का कहना है कि पहले वह हल्द्वानी में नौकरी करते थे. वहां कमरे के किराए, खाने में ही पूरी सैलरी समाप्त हो जाती थी. कुछ भी बचत नहीं हो पा रही थी. उन्होंने गांव में लौटकर मुर्गीपालन का काम शुरु किया. शुरुआत में अनुभव कम होने के कारण बचत कम हो रही थी लेकिन अब ठीक पैसे बच जाते हैं. मुर्गियों की स्थानीय स्तर पर भी काफी मांग है.

कोरोना संक्रमण ने हजारों लोगों को बेरोज़गार कर दिया है. अल्मोड़ा जिले में ही 50,000 से अधिक युवा अपने घरों को लौट आए हैं. अब सरकार के सामने इन युवाओं को गांवों में ही रोज़गार देने की चुनौती है. अगर पहाड़ में मुर्गी पालन एक अच्छा रोजगार बन सकता है तो युवा अपने घरों में ही रोज़गार कर सकते हैं. पहाड़ के मुर्गों की मांग पहाड़ और मैदान में अधिक है.
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