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सीएम के साथ-साथ अंदर ही अंदर चल रही मंत्री पद के लिए जोड़तोड़

सीएम के साथ-साथ अंदर ही अंदर चल रही मंत्री पद के लिए जोड़तोड़

उत्तराखंड के जनमानस ने अपना भविष्य संवारने की जिम्मेदारी भारतीय जनता पार्टी को सौंपी है. उनके चुनावी वादों को पूरा करके जनता की कसौटी पर खरा उतरने की जिम्मेदारी नए मुखिया पर होगी. लिहाजा प्रचंड बहुमत के बाद नए तारणहार का चुनाव बेहद अहम है. उत्तराखंड की चौथी विधानसभा की तस्वीर साफ हो गई और अब सबको नई सरकार के गठन का इंतजार है.

उत्तराखंड के जनमानस ने अपना भविष्य संवारने की जिम्मेदारी भारतीय जनता पार्टी को सौंपी है. उनके चुनावी वादों को पूरा करके जनता की कसौटी पर खरा उतरने की जिम्मेदारी नए मुखिया पर होगी. लिहाजा प्रचंड बहुमत के बाद नए तारणहार का चुनाव बेहद अहम है. उत्तराखंड की चौथी विधानसभा की तस्वीर साफ हो गई और अब सबको नई सरकार के गठन का इंतजार है.

उत्तराखंड के जनमानस ने अपना भविष्य संवारने की जिम्मेदारी भारतीय जनता पार्टी को सौंपी है. उनके चुनावी वादों को पूरा करके जनता की कसौटी पर खरा उतरने की जिम्मेदारी नए मुखिया पर होगी. लिहाजा प्रचंड बहुमत के बाद नए तारणहार का चुनाव बेहद अहम है. उत्तराखंड की चौथी विधानसभा की तस्वीर साफ हो गई और अब सबको नई सरकार के गठन का इंतजार है.

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    उत्तराखंड के जनमानस ने अपना भविष्य संवारने की जिम्मेदारी भारतीय जनता पार्टी को सौंपी है. उनके चुनावी वादों को पूरा करके जनता की कसौटी पर खरा उतरने की जिम्मेदारी नए मुखिया पर होगी. लिहाजा प्रचंड बहुमत के बाद नए तारणहार का चुनाव बेहद अहम है.

    उत्तराखंड की चौथी विधानसभा की तस्वीर साफ हो गई और अब सबको नई सरकार के गठन का इंतजार है. जनमानस ने अटल के बनाए उत्तराखंड को संवारने के लिए भारतीय जनता पार्टी पर भरोसा जताया है. मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी के वादों पर इस कदर यकीन किया कि बीजेपी को छप्परफाड जनादेश दे दिया.

    लाख टके का सवाल ये है आखिर नई सरकार की बागडोर किसको सौंपी जाएंगी. वैसे पूर्व स्पीकर एवं मंत्री प्रकाश पंत, पूर्व मंत्री त्रिवेंद्र सिह रावत और पूर्व केंद्रीय मंत्री सतपाल महाराज समेत कुछ अन्य इस रेस में बताए जा रहे हैं. मुख्यमंत्री पद के ये तीनों बड़े दावेदार हालिया चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं.

    जनआकांक्षाओं का पूरा होना इस बात पर निर्भर करेगा कि नई सरकार का मुखिया कौन होगा. अतीत इस बात का गवाह है कि सरकार के काम में रोड़ा डालने वाले बाहरी नहीं खुद पार्टी के पुराने मठाधीश रहे हैं. जिसकी वजह ये हर बार विधायकों की राय को दरकिनार करके हाईकमान ने अपनी मरजी थोपी है.

    कहने की जरूरत नहीं है कि 9 नवंबर 2000 को राज्य गठन के वक्त नित्यानंद स्वामी को अंतरिम सरकार की बागडोर सौंपी गई. उनके विरोध का आलम ये था कि अपने उत्तराखंड बनने के बाद हुए पहले शपथग्रहण का एक तबके ने खुला विरोध किया था. जिसकी परिणती नेतृत्व परिवर्तन के रूप में भगत सिंह कोश्यारी की ताजपोशी के बाद खत्म हुई.

    यह सिलसिला खत्म नहीं हुआ और साल 2007 में बीजेपी सरकार बनने पर भी जारी रहा. उस वक्त वक्त बीजेपी हाईकमान ने मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाया जिनका भगत सिंह कोश्यारी ने कड़ा विरोध किया. क्योंकि तत्कालीन विधानसभा चुनाव उनकी सदारत में हुए थे. भगतदा के लगातार विरोध की रोशनी में नेतृत्व परिवर्तन हुआ और खंडूरी को 2009 में हटाना पड़ा.

    बीजेपी हाईकमान ने डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक को उत्तराखंड की बागडोर सौंप दी लेकिन 2012 के आम चुनाव से पहले राजनैतिक हालात ऐसे बने की निशंक की कुर्सी नहीं बच पाई. दिलचस्प बात ये है कि निशंक को हटाने के लिए खंडूरी और कोश्यारी ने हाथ मिला लिए और बीजेपी हाईकमान भुवन चंद्र खंडूरी को दुबारा मुख्यमंत्री बनाने पर मजबूर हुआ.

    लेकिन मौजूदा सियासी हालात एकदम जुदा हैं क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रचंड लहर में ऐतिहासिक दो तिहाई से ज्यादा बहुमत बीजेपी को मिला है. दिलचस्प ये कि विजय बहुगुणा के नेतृत्व में हरीश रावत का तख्तापलट करने वाले सभी बागी चुनाव जीते हैं उसके पहले रावत विरोधी सतपाल महाराज भी बीजेपी के विधायक बन गए हैं. अब ये देखना है कि मोदी और शाह देवभूमि का भविष्य संवारने के लिए किस पर दांव लगाते हैं.

    Tags: Uttarakhand news

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