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उत्तराखंड: गांव में रोजगार शुरू करने वाले प्रवासियों के लिए अच्छा अवसर, जल्द करें इस साइट पर आवेदन

उत्तराखंड: गांव में रोजगार शुरू करने वाले प्रवासियों के लिए अच्छा अवसर, जल्द करें इस साइट पर आवेदन

बिहार में बेरोजगारी दर 42 फीसदी के पार पहुंच गई है

उधोग विभाग के महाप्रबंधक दीपक मुरारी (Deepak Murari) ने बताया कि जिले में 35 हजार प्रवासी पिछले दो माह में पहुंचे हैं.

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अल्मोड़ा. उत्तराखंड के अल्मोड़ा (Almora) जिले में लॉकडाउन के बाद 35 हजार से अधिक प्रवासी अपने घरों को लौट आए हैं. यह सभी लोग अन्य राज्यों में जाकर नौकरी करते थे. लेकिन प्रदेश लौटे इन प्रवासियों को लॉकडाउन (Lockdown) के कारण होटल सहित अन्य संस्थानों के बंद होने से जल्दी कोई रोजगार मिलने की उम्मीद भी नहीं है. अब ये प्रवासी अपने गांवों में ही रोजगार (Employment) करना चाहते हैं, जिसके लिए वे लगातार विभागों के चक्कर काट रहे हैं या फिर फोन कर अधिकारियों से संपर्क कर रहे हैं.

प्रवासियों को स्थानीय स्तर पर ही रोजगार देने के लिए राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना शुरू की शुरुआत की है. प्रवासी ऑनलाइन आवेदन www.msy.gov.in पर कर सकते हैं. इसके साथ ही जिले की अधिक जानकारी के लिए 9412131922 पर भी संपर्क कर सकते हैं. इस ऑनलाइन में पंजीकरण प्रवासी ही नहीं स्थानीय स्तर पर जो भी रोजगार करना चाहता है वह भी कर सकता है.

35 हजार प्रवासी पिछले दो माह में ही पहुंचे हैं
उधोग विभाग के महाप्रबंधक दीपक मुरारी ने न्यूज 18 को बताया कि जिले में 35 हजार प्रवासी पिछले दो माह में ही पहुंचे हैं. मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत भी सैकड़ों लोगों ने आवेदन किया है. इसके साथ ही विभाग गांवों में लौटे प्रवासियों से सीधे संपर्क कर रहा है. एक हजार लोगों से बात चल रही है कि वे स्थानीय स्तर पर ही कौन सा रोजगार कर सकते हैं.

पिछले कई सालों से दिल्ली में ही नौकरी करता था
दिल्ली से लौटे दीपू कुमार का कहना है कि वह पिछले कई सालों से दिल्ली में ही नौकरी करता था लेकिन लॉकडाउन के चलते उसे अपने घर आना पड़ा. अब वह गांव में ही रोजगार करना चाहता है. अगर राज्य सरकार उसे गांवों में ही रोजगार उपलब्ध कराएगी तो वह फिर दिल्ली नहीं जाएगा. अगर कोई काम नहीं मिला तो फिर मजबूरी में ही सही रोजगार के लिए मैदानी क्षेत्रों का रुख करना पड़ेगा.

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कसार देवी मंदिर के रहस्य से NASA भी हैरान, जानिए ये चुंबकीय शक्तियां शरीर पर कैसे करती हैं काम?

कसार देवी मंदिर के रहस्य से NASA भी हैरान, जानिए ये चुंबकीय शक्तियां शरीर पर कैसे करती हैं काम?

कसार देवी मंदिर में देवी मां की मूर्ति के ठीक पीछे पत्थर पर एक शेर की आकृति है, जो साफ नजर आती है.

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उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में कसार देवी मंदिर (Kasar Devi Temple Almora) स्थित है. इस मंदिर में हमेशा श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. इस स्थान पर चुंबकीय शक्तियां हैं. NASA के वैज्ञानिक भी इस रहस्य पर शोध कर रहे हैं. मंदिर में माता की मूर्ति के ठीक पीछे पत्थर पर एक शेर की आकृति है. बहुत कम लोगों को इस बारे में पता है.

दुनिया में तीन पर्यटक स्थल ऐसे हैं, जहां कुदरत की खूबसूरती के दर्शन तो होते ही हैं, साथ ही मानसिक शांति भी महसूस होती है. यहां चुंबकीय शक्ति का केंद्र भी है. इनमें से एक भारत के उत्तराखंड में अल्मोड़ा में स्थित कसार देवी शक्तिपीठ है. नासा के वैज्ञानिक चुंबकीय रूप से इन तीनों जगहों के चार्ज होने के कारणों और प्रभावों पर शोध कर रहे हैं.

कसार देवी मंदिर के आसपास का पूरा क्षेत्र वैन एलेन बेल्ट है, जहां धरती के भीतर विशाल भू-चुंबकीय पिंड है. मंदिर के आसपास श्रद्धालु ध्यान मुद्रा में बैठते हैं, जिससे उन्हें एक अलग किस्म की शांति की अनुभूति होती है. इस अलग अहसास के लिए ही देश-विदेश से लोग यहां आते हैं.

अब तक हुए इस अध्ययन में पाया गया है कि अल्मोड़ा स्थित कसार देवी मंदिर, दक्षिण अमेरिका के पेरू स्थित माचू-पिच्चू और इंग्लैंड के स्टोन हेंग में यह अद्भुत समानताएं हैं. इन तीनों जगहों पर चुंबकीय शक्ति का विशेष पुंज है.

नवरात्रि के मौके पर यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं. हर साल कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर कसार देवी मंदिर में मेला भी लगता है. स्वामी विवेकानंद भी कसार देवी मंदिर में आ चुके हैं. 1890 में मंदिर में स्थित एक गुफा में उन्होंने ध्यान किया था.

इंसानियत की मिसाल हैं 78 वर्षीय मनोरमा जोशी, दिव्यांगों को 'आत्मनिर्भर' बनाना ही जीवन का मकसद

इंसानियत की मिसाल हैं 78 वर्षीय मनोरमा जोशी, दिव्यांगों को 'आत्मनिर्भर' बनाना ही जीवन का मकसद

उत्तराखंड के अल्मोड़ा की रहने वालीं मनोरमा जोशी ने अपना पूरा जीवन दिव्यांग बच्चों पर न्योछावर कर दिया.

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उत्तराखंड के अल्मोड़ा की रहने वालीं मनोरमा जोशी इंसानियत की मिसाल हैं. उन्होंने अपना पूरा जीवन दिव्यांग बच्चों पर न्योछावर कर दिया. 78 वर्षीय मनोरमा ने 1 जुलाई, 1998 को मंगलदीप विद्या मंदिर की स्थापना की थी. इस मंदिर के निर्माण का मकसद दिव्यांगों का सहारा बनना था.

शुरुआत में स्कूल में सिर्फ 6 ही बच्चे थे. आज मनोरमा जोशी के स्कूल में करीब 48 दिव्यांग बच्चे और 12 शिक्षक हैं. मनोरमा जोशी ने बताया कि शुरुआती दौर में उन्हें काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला लेकिन उनके परिवार और साथियों ने उनकी काफी मदद की.

मनोरमा देवी ने बताया कि मंगलदीप विद्या मंदिर के बच्चों को कई तरह के उत्पाद बनाना सिखाया जाता है, जिसमें- मोमबत्ती, लिफाफे, फूलों से रंग बनाना, ग्रीटिंग कार्ड, सिलाई, पोस्टकार्ड आदि प्रमुख हैं. साथ ही बच्चों के लिए म्यूजिक और डांस की क्लासेस भी आयोजित की जाती हैं. विद्या मंदिर में पिछले पांच साल से बच्चों को हैंडलूम संबंधी कार्यों का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है.

स्वामी विवेकानंद 3 बार आए थे अल्मोड़ा, आज भी रखी हैं चरण पादुका, छड़ी और ये सामान

स्वामी विवेकानंद 3 बार आए थे अल्मोड़ा, आज भी रखी हैं चरण पादुका, छड़ी और ये सामान

अल्मोड़ा के खजांची मोहल्ले में स्वामी विवेकानंद का सामान आज भी मौजूद है.

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उत्तराखंड का अल्मोड़ा वह शहर रहा है, जहां ऋषि-मुनियों और संतों ने आकर इस भूमि के महत्व को बढ़ाया है. कई महान संतों का अल्मोड़ा से गहरा लगाव रहा है. स्वामी विवेकानंद का भी अल्मोड़ा से गहरा नाता रहा है. स्वामी विवेकानंद यहां तीन बार आए थे और उन्होंने यहां कई दिनों तक रहकर साधना की थी.

अल्मोड़ा के खजांची मोहल्ले में स्वामी विवेकानंद का सामान आज भी मौजूद है. यहां उनकी चरण पादुका, छड़ी, किताबें और टेबल लैंप रखा हुआ है. स्वामी विवेकानंद की दवात की शीशियां भी यहां रखी हुई हैं. जिस कप में वह चाय पीते थे, वह भी इस भवन में देखने को मिल जाएगा.

स्वामी विवेकानंद को पहली बार 1890 की यात्रा के दौरान अल्मोड़ा के काकड़ीघाट स्थित पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था. अल्मोड़ा में वह कई दिनों तक खजांची मोहल्ला में स्व. बद्री शाह के मेहमान बनकर भी रहे.

स्वामी विवेकानंद जब दूसरी बार अल्मोड़ा पहुंचे तो अल्मोड़ा में उनका भव्य स्वागत हुआ. पूरे शहर को सजाया गया था और लोधिया से एक सजे घोड़े में उन्हें नगर में लाया गया. 11 मई, 1897 को खजांची बाजार में उन्होंने एक जनसभा को संबोधित किया था. उन्हें सुनने के लिए करीब 5000 लोग जमा हुए थे.

1890 की अल्मोड़ा यात्रा के दौरान कर्बला के पास स्वामी विवेकानंद जब बेहोश हो गए थे, तो एक फकीर ने ककड़ी का रस पिलाकर उनकी जान बचाई थी. विवेकानंद अक्सर फकीर की काफी तारीफ करते हुए कहते थे कि आज वह उसकी वजह से ही जिंदा हैं.

अल्मोड़ा : बस आवाज सुनकर खिंचे चले आयेेंगे आप, नंदा देवी मेले की रौनक है ये नेत्रहीन जोडा.

अल्मोड़ा : बस आवाज सुनकर खिंचे चले आयेेंगे आप, नंदा देवी मेले की रौनक है ये नेत्रहीन जोडा.

संतराम और आनंदी देवी करीब 15 साल से अल्मोड़ा में आयोजित नंदा देवी मेले में आ रहे हैं.

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अल्मोड़ा के धौलछीना के रहने वाले संतराम और आनंदी देवी नेत्रहीन हैं. दिव्यांग होने के बावजूद दोनों हर साल नंदा देवी मेले की रौनक बढ़ाने आ जाते हैं. यह दंपति करीब 15 साल से इस मेले में आते हैं और लोकगीतों से हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देते हैं.

संतराम कुमाऊंनी लोकगीतों को गाते हुए, हुड़के की थाप देते हैं और आनंदी देवी उनके साथ सुर-ताल मिलाकर जो गाती हैं, उसके सभी मुरीद हो जाते हैं. दोनों लोकगीतों में न्यौली, चाचरी, झोड़ा समेत कई गानों को गाकर मेले में समां बांध देते हैं.

बताते चलें कि कुछ समय पहले दंपति का घर क्षतिग्रस्त हो गया था, जिसको तत्कालीन जिलाधिकारी नितिन सिंह भदौरिया ने दोबारा से बनाने के निर्देश दिए थे. उनका घर बनकर तैयार हो चुका है.

डॉक्टर अजीत तिवारी को इसकी देखरेख का जिम्मा सौंपा गया था. उन्होंने बताया कि घर का काम लगभग पूरा हो चुका है और संतराम और उनकी पत्नी को जल्द ही उस मकान में शिफ्ट कर दिया जाएगा. घर में उनके लिए ढोलक, हारमोनियम व अन्य वाद्य यंत्र भी रखे जाएंगे. जो कोई भी उनसे लोक संगीत सीखना चाहता है, वह सीख सकता है.

'सरकार' से मदद मांग रहा अल्मोड़ा का ऐतिहासिक इंटर कॉलेज, जान जोखिम में डाल पढ़ाई को मजबूर बच्चे

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अल्मोड़ा के राजकीय इंटर कॉलेज को अटल उत्कृष्ट विद्यालय का भी दर्जा दिया गया है.

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अल्मोड़ा में राजकीय इंटर कॉलेज (GIC Almora) 1889 में स्थापित हुआ था. यह कॉलेज शहर के ऐतिहासिक भवनों में गिना जाता है. GIC को अटल उत्कृष्ट विद्यालय का भी दर्जा दिया गया है लेकिन शिक्षा विभाग और शासन स्तर पर इसके रखरखाव के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है, जिसके चलते छात्र जर्जर भवनों में पढ़ने को मजबूर हैं.

GIC के कुछ भवनों की स्थिति इतनी जर्जर है कि कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है. रसायन विभाग की लैब की हालत बेहद खस्ता है, इसके बावजूद इस प्रयोगशाला का इस्तेमाल किया जा रहा है. वर्तमान में राजकीय इंटर कॉलेज के 40 टीचर करीब 600 छात्रों को पढ़ा रहे हैं.

बताते चलें कि इस कॉलेज से कई जानी-मानी हस्तियां पढ़ चुकी हैं. पूर्व जनरल बीसी जोशी, मशहूर कवि सुमित्रा नंदन पंत, जनसंघ के संस्थापक सदस्य सोबन सिंह जीना, पूर्व राज्यपाल बीडी पांडे और अल्मोड़ा के मौजूदा सांसद अजय टम्टा जैसे कई बड़े नाम इस फेहरिस्त में शामिल हैं. भवनों की जर्जर हालत को लेकर कॉलेज और विभाग की तरफ से कई पत्र भी लिखे गए लेकिन अभी तक इसकी सुध नहीं ली गई है.

अल्मोड़ा में लगाया जुरासिक काल का 'जिंको बाइलोबा' पेड़, जानिए खासियत

अल्मोड़ा में लगाया जुरासिक काल का 'जिंको बाइलोबा' पेड़, जानिए खासियत

जुरासिक युग का माना जाने वाला जिंको बायलोबा नाम का यह पेड़ अल्मोड़ा के पंत पार्क में लगाया गया है.

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अल्मोड़ा उत्तराखंड के प्राचीन शहरों में शुमार है. यहां की ऐतिहासिक व सांस्कृतिक विरासतें इस शहर की शान हैं. अब इस प्राचीन पहाड़ी नगर की खूबसूरती में करीब 29 करोड़ वर्ष पुरानी प्रजाति का एक पेड़ चार चांद लगाएगा. जिंको बायलोबा नाम का यह पेड़ अल्मोड़ा के पंत पार्क में लगाया गया है. इस पेड़ की मूल उत्पत्ति चीन की मानी जाती है.

यह पेड़ काफी दुर्लभ प्रजाति का है. अल्मोड़ा के पंत पार्क में जिंको बाइलोबा नाम के पौधे को जीबी पंत पर्यावरण संस्थान की मदद से लगाया गया था. नगरपालिका अध्यक्ष प्रकाश चंद जोशी और जीबी पंत हिमालयी पर्यावरण संस्थान के सहयोग से इसको लगाया गया.

वैज्ञानिक डॉक्टर सतीश चंद्र आर्य ने बताया कि जिंको बाइलोबा इस पेड़ का वैज्ञानिक नाम है. इसको मेडेनहेयर ट्री नाम से भी जाना जाता है. यह पेड़ जुरासिक युग का यानी 29 करोड़ वर्ष पूर्व प्रजाति का पेड़ है. मूल रूप से इसकी उत्पत्ति चीन में हुई थी.

बताते चलें कि अल्मोड़ा के पंत पार्क में देवदार के पेड़ पर लिपटी बोगनविलिया की बेल शहर की खूबसूरती में चार चांद लगाती थीं. 100 साल से ज्यादा समय से शहर के माल रोड पर यह पेड़ मुख्य आकर्षण का केंद्र था. पिछले साल भारी बारिश से पेड़ गिर गया था, जिसके बाद उस जगह पर भरपाई के लिए इस खूबसूरत व दुर्लभ प्रजाति के पेड़ को लगाया गया, जो आने वाले समय में शहर की सुंदरता को बढ़ाएगा.

अल्मोड़ा में है महात्मा गांधी का लोटा, बापू ने इस वजह से किया था नीलाम

अल्मोड़ा में है महात्मा गांधी का लोटा, बापू ने इस वजह से किया था नीलाम

अल्मोड़ा में महात्मा गांधी के द्वारा नीलाम किया गया लोटा आज भी सुरक्षित है.

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स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अल्मोड़ा भ्रमण पर भी आए थे. बापू ने 20 जून, 1929 को लक्ष्मेश्वर मैदान में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया था और अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए देश की आजादी के लिए युवाओं में अलख जगाई थी. इस मैदान को अब गांधी सभा स्थल शहीद पार्क लक्ष्मेश्वर के नाम से जाना जाता है. बापू ने अपने एक लोटे को यहां नीलाम किया था.

अल्मोड़ा में महात्मा गांधी के द्वारा नीलाम किया गया लोटा आज भी सुरक्षित है. उस दौर में व्यापारी धनी शाह ने इसे खरीदा था. चांदी का यह लोटा शाह परिवार के पास ही है. भारत की आजादी के लिए महात्मा गांधी ने अपने बर्तन तक नीलाम कर दिए थे.

बताते चलें कि कुमाऊं भ्रमण के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 19 जून, 1929 की शाम अल्मोड़ा पहुंचे थे. राष्ट्रपिता ने रानीधारा में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हरीश चंद्र जोशी के घर पर रात्रि विश्राम किया था. वर्तमान में इस भवन में ग्रेस स्कूल संचालित है. पालिका परिषद ने गांधी सभा स्थल लक्ष्मेश्वर को संरक्षित किया है. यहां पर शहीद स्मारक स्थापित किया गया है, जिसे अब गांधी सभा स्थल शहीद पार्क लक्ष्मेश्वर के नाम से जाना जाता है.

उत्तराखंड की पहचान है बाल मिठाई और सिंगौड़ी, अल्मोड़ा में कैसे हुई इसकी शुरुआत?

उत्तराखंड की पहचान है बाल मिठाई और सिंगौड़ी, अल्मोड़ा में कैसे हुई इसकी शुरुआत?

अल्मोड़ा की बाल मिठाई का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है. वहीं सिंगौड़ी भी इस शहर की पहचान है.

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आज हम आपको उत्तराखंड की एक ऐसी मिठाई से रूबरू कराने जा रहे हैं, जो न केवल राज्य में बल्कि देश-दुनिया में अपनी पहचान बना चुकी है. हम बात कर रहे हैं अल्मोड़ा की बाल मिठाई की. इस मिठाई का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है. उत्तराखण्ड के पर्वतीय शहर अल्मोड़ा में बाल मिठाई के अविष्कारक हलवाई स्व. जोगा लाल शाह माने जाते हैं.

जोगा लाल शाह ने ही 1865 में पहली बार बाल मिठाई बनाई थी. तब अंग्रेजों को यह मिठाई काफी पसंद आई थी. जिसके बाद वे लोग इसे ब्रिटेन व अन्य देश ले जाने लगे. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जब अल्मोड़ा आए थे, तो बापू को भी बाल मिठाई भेंट की गई थी.

बाल मिठाई के बारे में यह भी कहा जाता है कि यह मिठाई सबसे पहले सातवीं शताब्दी में नेपाल से आई थी और इसे सूर्य देवता को समर्पित करने वाले प्रसाद के रूप में जाना जाता था.

वहीं अल्मोड़ा शहर एक और खास मिठाई के लिए जाना जाता है, जिसका नाम सिंगौड़ी है. यह मिठाई शुद्ध खोया की बनती है. इसे मालू के पत्ते में लपेटकर ग्राहकों को परोसा जाता है. अल्मोड़ा के अलावा अब ये मिठाइयां कई शहरों में आसानी से मिल जाती हैं लेकिन अगर आपको इनका असली स्वाद चखना है, तो आपको अल्मोड़ा आना ही पड़ेगा.

अल्मोड़ा में है उत्तराखंड की देवी का मंदिर, 350 साल से हो रही मां नंदा की पूजा

अल्मोड़ा में है उत्तराखंड की देवी का मंदिर, 350 साल से हो रही मां नंदा की पूजा

अल्मोड़ा में करीब 350 साल से मां नंदा देवी की पूजा की जाती है.

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मां नंदा देवी को शैलपुत्री का रूप माना जाता है. यह देवी मां के 9 रूपों में से एक हैं. अल्मोड़ा में करीब 350 साल से मां नंदा देवी की पूजा की जाती है. वैसे मां नंदा देवी की पूजा समूचे उत्तराखंड में होती है और उन्हें उत्तराखंड की देवी माना जाता है. देवी भागवत में नंदा को शैलपुत्री के रूप में 9 देवियों में एक माना गया है.

अल्मोड़ा में नंदा देवी का प्राचीन मंदिर स्थापित है. 1670 में कुमाऊं के चंद वंशीय शासक राजा बाज बहादुर चंद बधाणगढ़ के किले से नंदा देवी की स्वर्ण प्रतिमा को अल्मोड़ा लाए थे. इस प्रतिमा को उन्होंने मल्ला महल (वर्तमान कलक्ट्रेट) परिसर में प्रतिष्ठित किया और अपनी कुलदेवी के रूप में पूजन शुरू किया.

कुमाऊं अंचल में नंदा देवी की पूजा को व्यापक स्वरूप चंद शासकों के काल में मिला. कत्यूरी, चंद और गढ़वाल के नरेश मां नंदा को कुलदेवी के रूप में पूजते रहे. 1699 में राजा ज्ञानचंद भी बधानकोट से देवी मां की एक स्वर्ण प्रतिमा अल्मोड़ा लाए थे.

1710 में राजा जगत चंद को बधानकोट विजय के अवसर पर नंदा देवी की प्रतिमा नहीं मिली तो उन्होंने अपने खजाने से 200 अशर्फियों को गलाकर नंदा देवी की प्रतिमा का निर्माण कराया और यह मूर्ति भी मल्ला महल स्थित नंदा देवी मंदिर में प्रतिष्ठित की गई.

अल्मोड़ा के इस मंदिर में चिट्ठी लिखने से पूरी होती है हर मन्नत!

अल्मोड़ा के इस मंदिर में चिट्ठी लिखने से पूरी होती है हर मन्नत!

चितई गोलू देवता का मंदिर अल्मोड़ा से 8 किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ हाईवे पर स्थित है.

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उत्तराखंड में गोलू देवता (गोल्ज्यू महाराज) को न्याय का देवता माना जाता है. राज्य में गोलू देवता के कई मंदिर हैं लेकिन इनमें सबसे लोकप्रिय और आस्था का केंद्र अल्मोड़ा में स्थित चितई गोलू देवता का मंदिर है. आमतौर पर इस मंदिर में हमेशा भक्तों की भारी भीड़ नजर आती है, लेकिन इस समय कोरोना के चलते यहां श्रद्धालुओं की संख्या में कमी देखने को मिल रही है.

गोलू देवता को स्थानीय संस्कृति में सबसे बड़े और त्वरित न्याय के देवता के तौर पर पूजा जाता है. इन्हें राजवंशी देवता के तौर पर भी पुकारा जाता है. गोलू देवता को उत्तराखंड में कई नामों से पुकारा जाता है, इनमें से एक नाम गौर भैरव भी है.

गोलू देवता को भगवान शिव का ही एक अवतार माना जाता है. भक्त इस मंदिर में चिट्ठियों पर अपनी मनोकामना लिखते हैं और इन्हें परिसर में ही रख देते हैं. मन्नत पूरी होने पर वे भगवान को घंटी चढ़ाते हैं.

उत्तराखंड ही नहीं बल्कि विदेशों से भी गोलू देवता के इस मंदिर में लोग न्याय मांगने के लिए आते हैं. मंदिर की घंटियों को देखकर आपको इस बात का अंदाजा लग जाएगा कि यहां मांगी गई किसी भी भक्त की मनोकामना कभी अधूरी नहीं रहती है.

बताते चलें कि चितई गोलू मंदिर अल्मोड़ा से 8 किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ हाईवे पर है.

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