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अल्मोड़ा के घरों में नक्काशी कभी थी शान की निशानी, अब मिट रही पहचान!

अल्मोड़ा

अल्मोड़ा के घरों में काष्ठकला के नमूने आज भी मौजूद हैं.

अल्मोड़ा के घरों में लकड़ी पर बनी नक्काशी पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है.

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    अल्मोड़ा के कुछ घरों में काष्ठकला के शानदार नमूने आज भी देखने को मिल जाते हैं. इन घरों में लकड़ी पर बनी नक्काशी पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है. घरों के बाहर दरवाजों और खिड़कियों पर करीने से की गई कारीगरी हर किसी को आकर्षित करती है. अब धीरे-धीरे समय बदल रहा है और यह दुख की बात है कि अगली पीढ़ी की काष्ठकला में दिलचस्पी कम होती जा रही है.

    उत्तराखंड के पहाड़ों में हर घर की शान मानी जाने वाली काष्ठकला को एक नया रूप देने के लिए अल्मोड़ा के पूर्व जिलाधिकारी नितिन सिंह भदौरिया ने इसके रंग-रोगन का बीड़ा उठाया था. घरों के बाहर लकड़ी पर नक्काशी एक समय में इतनी प्रचलित थी कि दूरदराज से लोग इस कारीगरी की एक झलक पाने के लिए अल्मोड़ा आते थे.

    काष्ठकला वाले मकान अब शहर में धीरे-धीरे कम हो रहे हैं. कुछ पुराने मकान खराब हो गए तो कुछ ने लकड़ी के बजाय दीवार उठाना किफायती समझा. इसके इतिहास की बात करें तो अल्मोड़ा चंदवंशी राजाओं की राजधानी रही है. चंद राजाओं ने यहां अनेक किलों और भवनों का निर्माण कराया था, जो आज भी यहां मौजूद हैं. चंदवंश के राजा बालो कल्याणचंद ने करीब 1563 ई. में अल्मोड़ा नगर की स्थापना की थी. जिसके बाद शहर में लकड़ी से बने घरों को खूबसूरत बनाने के लिए ही नक्काशी कराई जाती थी.

    शहर में अब कुछ ही लोग हैं, जिन्होंने इस विरासत को संभाला हुआ है. दन्या में रहने वाले धनीराम ने बताया कि वह करीब दो दशक से नक्काशी का काम कर रहे हैं. उनके दो बेटे भी इस कला को आगे बढ़ाने में उनका साथ दे रहे हैं. वह कई मशहूर जगहों पर नक्काशी कर चुके हैं.

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