VIDEO: अस्तित्व के संकट से जूझता परंपरागत दस्तकारी उद्योग

खराद पर घूमते लकड़ी के अनगढ़ टुकडों को आकार देते यह हाथ आज भी इस कला को बचाने में जुटे हैं. बर्तन बनाने की जरुरत की लकड़ी ये लोग वन विभाग से कर चुकाकर प्राप्त करते हैं.

Govind Patni | News18 Uttarakhand
Updated: April 1, 2018, 4:34 PM IST
Govind Patni
Govind Patni | News18 Uttarakhand
Updated: April 1, 2018, 4:34 PM IST
उत्तराखण्ड केवल प्राकृतिक सुन्दरता ही नहीं बल्कि पुरातन हस्तकलाओं के लिए भी जाना जाता है. पनचक्की बिजली की तरह ही पानी की शक्ति से चलने वाले यंत्र से परम्परागत लकड़ी के बर्तन बनाने का काम यहां की सांस्कृतिक पहचान का एक अहम हिस्सा है. स्टील, प्लास्टिक और चीनी मिट्टी के इस दौर में आज भी यहां लकडी के बर्तन बनाने का काम एक वर्ग विशेष द्वारा किया जाता है. पीढियों से चली आ रही यह अद्भुद काष्ठ कला आज बदलते वक्त के इस दौर में अपने अस्तित्व को बचाये रखने का संघर्ष कर रही है.

पीढियों से इस विरासत को संभाले मूल रूप से बागेश्वर जिले के इन दस्तकारों को स्थानीय भाषा में चुनेरे कहा जाता है. ये लोग हर साल रामनगर में आकर कोसी और बौर नदी किनारे अपना डेरा जमाकर पनचक्की की मदद से लकड़ी के बर्तन तैयार करते हैं.

ये दस्तकार इस प्रकार के बर्तनों को हर साल फरवरी से अप्रैल तक नदी के किनारे खराद लगाकर बनाते हैं. खराद पर लकडी के इन टुकडों को अपने अनुभवी और कुशल हाथों से संवार कर सुन्दर बर्तनों में बदल देते हैं.

दस्तकारों द्वारा बनाए गए लकड़ी के बर्तन.


ये दस्तकार सानन और गेठी की लकड़ी से नैया, ठेकी और पाई जैसे परम्परागत बर्तन बनाते हैं. लकड़ी के ये बर्तन आज भी उत्तराखण्ड के गांवों में दूध, दही, छांछ और खटाई रखने के काम आते हैं.

खराद पर घूमते लकड़ी के अनगढ़ टुकडों को आकार देते यह हाथ आज भी इस कला को बचाने में जुटे हैं. बर्तन बनाने की जरुरत की लकड़ी ये लोग वन विभाग से कर चुकाकर प्राप्त करते हैं. तीन-तीन माह अपने परिवार से दूर नदी के निर्जन किनारे पर बर्तन बनाकर ये दस्तकार दो जून की रोटी लायक ही जुगाड़ कर पाते हैं.

आधुनिकता के दौर में ये लोग अपने जीवन स्तर को बेहतर करने में भारी समस्याओं का सामना कर रहे हैं. इनकी शिकायत है कि सरकार ने कभी उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया. लकड़ी से बने बर्तन मात्र उपयोग की वस्तु नहीं बल्कि उत्तराखंड संस्कृति की पहचान भी है.

वक्त के साथ-साथ इनकी मांग कम होने से ये कला खतरे में हैं. अपनी विरासत को बचाने और इसे जीवन यापन का आधार बनाये रखने का प्रयास करने वालों की जद्दोजहद आज भी जारी है.
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