मकर संक्रांति पर बागेश्वर में लगता है उत्तराखंड का सबसे बड़ा मेला, जिसमें स्टॉल लगाते हैं राजनीतिक दल भी
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मकर संक्रांति पर बागेश्वर में लगता है उत्तराखंड का सबसे बड़ा मेला, जिसमें स्टॉल लगाते हैं राजनीतिक दल भी
3,254 फ़ीट की ऊंचाई पर बसे बागेश्वर ज़िले का नाम बागनाथ मंदिर से पड़ा है.

ऋषि मार्कंडेय को बाघ के रूप में आशीर्वाद देने आए थे भगवान शिव... इसलिए क्षेत्र का नाम पड़ा बागेश्वर

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1997 में यूपी की मुख्यमंत्री मायावती ने अल्मोड़ा से अलग बागेश्वर जनपद की स्थापना की थी. सरयू और गोमती नदी के संगम पर बसा बागेश्वर जिला सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक महत्व के लिए जाना जाता है. 3,254 फ़ीट की ऊंचाई पर बसे बागेश्वर ज़िले का नाम बागनाथ मंदिर से पड़ा है. हिन्दू पौराणिक कथा के अनुसार ऋषि बाबा मार्कंडेय यहां शिव जी पूजा किया करते थे. शिव जी एक बाघ के रूप में ऋषि मार्कंडेय को आशीर्वाद देने आए थे. इसी के बाद यह क्षेत्र कहलाने लगा बागेश्वर.

राजनीतिक चेतना का केंद्र

ऐतिहासिक सूत्रों के अनुसार चन्द शासक लक्ष्मी चन्द ने 1602 में बागनाथ मंदिर समूह का निर्माण कराया था. हर साल मकर सक्रांति के दिन यहां उत्तराखंड का सबसे बड़ा मेला लगता है. इस उत्तराखंड का संभवतः अकेला ऐसा  मेला है जिसमें सभी प्रमुख राजनीतिक दल भी अपने स्टॉल लगाते हैं. इनके माध्यम से राजनीतिक पार्टियां लोगों को अपनी नीतियों से रूबरू कराती हैं.



Bageshwar, मकर सक्रांति के दिन यहां लगने वाले मेले में सभी प्रमुख राजनीतिक दल भी अपने स्टॉल लगाते हैं.
मकर सक्रांति के दिन यहां लगने वाले मेले में सभी प्रमुख राजनीतिक दल भी अपने स्टॉल लगाते हैं.

इस धरती पर पहुंच कर 1921 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को भी शुरु किया था जिसे कुली-बेगार आंदोलन चला रहे लोगों ने शिखर पर पहुंचाया. 2 लाख 60 हजार की आबादी वाले बागेश्वर का ऊन 1950 से 60 के दौर तक लाल इमली धारीवाल जैसी विख्यात कपड़ा कम्पनियां खरीदा करती थीं.

Bageshwar, चन्द शासक लक्ष्मी चन्द ने 1602 में बागनाथ मंदिर समूह का निर्माण कराया था.
चन्द शासक लक्ष्मी चन्द ने 1602 में बागनाथ मंदिर समूह का निर्माण कराया था.


अंग्रेज़ों ने की थी ट्रेन पहुंचाने की कोशिश

प्रथम विश्व युद्द से पहले यहां अंग्रेजों ने ट्रेन पहुंचाने की भी कोशिश की थी. 1905 में बागेश्वर को ट्रेन से जोड़ने के लिए ब्रिटिश हुकुमत ने टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन का सर्वे कराया था. यह बात अलग है कि आजाद भारत में इस पहाड़ी इलाके को ट्रेन से जोड़ने की कोई कोशिश नहीं हुई.

बागेश्वर जिले के पश्चिम में नीलेश्वर जबकि पूर्व में भीलेश्वर पर्वत है. यही नहीं इसकी उत्तर दिशा में सूर्य कुंड और दक्षिण में अग्निकुंड भी मौजूद है. प्रशासनिक रूप से अलग जिला बनने के बाद यहां 3 विकासखंड हैं. बागेश्वर कभी तांबे की कारीगरी के लिए भी मशहूर था लेकिन अब तांबे का काम करने वाले कारीगर गिने-चुने ही रह गए हैं.

Bageshwar, माना जाता है कि भगवान शिव एक बाघ के रूप में ऋषि मार्कंडेय को आशीर्वाद देने यहां आए थे.
माना जाता है कि भगवान शिव एक बाघ के रूप में ऋषि मार्कंडेय को आशीर्वाद देने यहां आए थे.


राज्य बनने के बाद इस जिले में 3 विधानसभाएं हुआ करती थीं लेकिन परिसीमन के बाद ये घटकर सिर्फ 2 रह गई हैं.फिलहाल यहां बागेश्वर और कपकोट नाम से दो विधानसभाएं हैं. अंतरिम सरकार के मुख्यमंत्री और वर्तमान में महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी मूल रूप से बागेश्वर जिले के ही रहने वाले हैं.
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