जागर कोकिला बसन्ती बिष्ट ने ऐसे तोड़ी सदियों पुरानी पुरुष परम्परा, ये है उनके संघर्ष की कहानी

जागर की दुनिया कई रहस्यों से भरी है. वेद, पुराण, शास्त्र, नागों और पहाड की लोक परम्पराओं का बखान जागरों में है. उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में देवताओं का स्तुति गान जागर के रूप में किया जाता है. धार्मिक अनुष्ठानों में जागर गाकर ही पूजा की जाती है. सदियों से पहाड़ में जागर की परम्परा को पुरुष ही गाते थे

Sandeep Gusai | ETV UP/Uttarakhand
Updated: August 20, 2016, 3:53 PM IST
जागर कोकिला बसन्ती बिष्ट ने ऐसे तोड़ी सदियों पुरानी पुरुष परम्परा, ये है उनके संघर्ष की कहानी
जागर गायिका बसंती बिष्ट Photo: Pradesh18
Sandeep Gusai
Sandeep Gusai | ETV UP/Uttarakhand
Updated: August 20, 2016, 3:53 PM IST
जागर की दुनिया कई रहस्यों से भरी है. वेद, पुराण, शास्त्र, नागों और पहाड की लोक परम्पराओं का बखान जागरों में है. उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में देवताओं का स्तुति गान जागर के रूप में किया जाता है. धार्मिक अनुष्ठानों में जागर गाकर ही पूजा की जाती है. सदियों से पहाड़ में जागर की परम्परा को पुरुष ही गाते थे, लेकिन प्रदेश में एक महिला ने जागर गाकर ना सिर्फ पुरुषों की इस परम्परा को तोड़ा, बल्कि जागर पर शोध कर इसे नई उचाइयों तक पहुंचाया. ये जागर गायिका हैं बसन्ती बिष्ट. आगे पढ़िए जागर कोकिला बसन्ती बिष्ट के संघर्ष की कहानी.

मां से प्रेरणा
मात्र 13 साल की उम्र में बसन्ती बिष्ट की शादी चमोली जनपद के सीमान्त गांव ल्वाणी में हुई. बसन्ती बिष्ट की मां जागर गाती थी और बचपन से ही बसन्ती बिष्ट भी जागरों को गुनगुनाने लग गई. बसन्ती की आवाज में अलग सा आकर्षण था, लेकिन पहाड़ की सुरम्य वादियों में गुनगुनाने के अलावा आवाज दबकर रह गई. कम उम्र में शादी होने के बाद बसन्ती बिष्ट घर परिवार की जिम्मेदारियों में खो गई. कई वर्षो तक वे गांव में रही लेकिन सेना में कार्यरत अपने पति के साथ कुछ सालों के बाद वे जलान्धर गई और वहां उनके पति ने बसन्ती बिष्ट की को पहचाना और शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दिलवाई.

देहरादून वापसी

पांच सालों तक शास्त्रीय संगीत सीखने के बाद जब वे देहरादून लौटी तो राज्य आंदोलन अपने चरम पर था. बसन्ती बिष्ट भी आंदोलन में शिरकत करने लगी. इसी बीच बसन्ती बिष्ट ने जन आंदोलन से जुड़े गीतों को गाया तो लोगों ने बसन्ती बिष्ट की आवाज तो काफी सराहा.

जादुई आवाज
धीरे धीरे बसन्ती बिष्ट की जादुई आवाज लोगों को आकर्षित करने लगी. इसी बीच बसन्ती बिष्ट ने आकाशवाणी में भी गाना शुरू कर दिया. आकाशवाणी में बसन्ती बिष्ट के जागरों को प्राथमिकता दी गई, जिन्हें काफी सराहा भी गया. उनके पति रणजीत सिंह बिष्ट बताते है कि बसन्ती बिष्ट का जीवन काफी संघर्षो भरा रहा है. वे कहते हैं 32 वर्षो तक बसन्ती बिष्ट घर-गृहस्थी में ही व्यवस्त रही, लेकिन उसके बाद धीरे-धीरे जागर गायन के क्षेत्र में उनकी दिलचस्पी बढती गई.
Loading...

पुरुषों ने किया विरोध
बसन्ती बिष्ट के जागर जब आकाशवाणी से गूंजने लगे तो पुरुषों ने इसका विरोध कर दिया. बसन्ती बिष्ट बताती है कि आकाशवाणी में तो इसका विरोध नहीं हुआ, लेकिन जब उन्होंने मंचों से जागर गाना शुरू किया तो इसका कुछ लोगों ने विरोध करना शुरू कर दिया. जागर उत्तराखंड में शास्त्रीय संगीत के रूप में जाना जाता है, जो अब धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है. पहाड में जागर गाने और इसकी जानकारी रखने वाले बहुत कम लोग रह गये है.

गायन ही नहीं शोध भी
बसन्ती बिष्ट ने ना सिर्फ जागरों को अपनी जादुई आवाज दी बल्कि अब वे इस विधा में शोध भी कर रही हैं. मां नंदा पर जागरों को उन्होंने एक किताब के रूप में संजोया है. बसन्ती बिष्ट कहती है कि पहाड़ में आज अदृश्य शक्तियां (परियां) विद्यमान है जिनपर वे शोध कर रही हैं. उत्तराखंड के उत्तरकाशी, टिहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, चमोली और कुमाऊं के कुछ जिलों में अछरियों (परियां) का वर्णन जागरों में मिलता है.बसन्ती बिष्ट कहती है कि जागर में आध्यात्म, पुराण, वेद, शास्त्र सहित पहाड़ की लोकपरम्पराएं, मान्यताओं का जिक्र है.

अलग मुकाम
बसन्ती बिष्ट ने जागर गायन की दुनिया में अपना अलग मुकाम हासिल कर लिया है. सिर्फ जागर ही नहीं बल्कि पारम्परिक वेशभूषा में बसन्ती बिष्ट जब मंचों पर आती हैं तो पहाड़ की संस्कृति की झलक जीवंत हो उठती है. उत्तराखंड में कई सम्मानों से नवाजी जा चुकी बसन्ती बिष्ट कहती है 6 बार उनका नाम पदश्री के लिए भेजा जा चुका है, लेकिन आजतक पदश्री पुरस्कार का उन्हें इन्तजार ही है.
First published: August 20, 2016, 3:53 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...