कुमाऊंनी कवि गौर्दा के गीतों से प्रेरणा लेकर जगाई थी बिश्नी देवी ने आजादी की अलख

स्वाधीनता संग्राम में उत्तराखंड की महिलाओं का भी अहम योगदान रहा है, जिसमें बिश्नी देवी शाह का नाम अग्रणी महिला आंदोलनकारियों में शामिल है. 12 अक्टूबर, 1902 को बागेश्वर में जन्मी बिश्नी देवी ने महज चौथी क्लाास तक ही पढ़ाई की थीं. एक ओर विधवा और दूसरी ओर सामाजिक कुरीतियों से बीच जकड़ी बिश्नी देवी राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़ी और आजादी के लिए लगातार संघर्षरत रहीं.

Pushkar Rawat | ETV UP/Uttarakhand
Updated: August 15, 2016, 12:17 PM IST
कुमाऊंनी कवि गौर्दा के गीतों से प्रेरणा लेकर जगाई थी बिश्नी देवी ने आजादी की अलख
Bishni Devi Shah
Pushkar Rawat | ETV UP/Uttarakhand
Updated: August 15, 2016, 12:17 PM IST
स्वाधीनता संग्राम में उत्तराखंड की महिलाओं का भी अहम योगदान रहा है, जिसमें बिश्नी  देवी शाह का नाम अग्रणी महिला आंदोलनकारियों में शामिल है. 12 अक्टूबर, 1902 को बागेश्वर में जन्मी बिश्नी देवी ने महज चौथी क्लाास तक ही पढ़ाई की थीं. एक ओर विधवा और दूसरी ओर सामाजिक कुरीतियों से बीच जकड़ी बिश्नी देवी राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़ी और आजादी के लिए लगातार संघर्षरत रहीं. लेकिन आजादी के बाद उनके योगदान को भुला दिया गया.

कुमाऊंनी कवि गौर्दा के गीतों से प्रेरणा




बिश्नीन देवी का राष्ट्र प्रेम 19 वर्ष की आयु में राष्ट्रीय गीत के गायन से शुरू हुआ. कुमाऊंनी कवि गौर्दा के गीतों को महिलाएं रात्रि जागरण में गाया करती थी. इससे स्त्रियों में राष्ट्रीय भावना का संचार हुआ. अल्मोड़ा में नन्दा देवी के मन्दिर में होने वाली सभाओं में भाग लेने और स्वदेशी प्रचार कार्यों में बिश्नी देवी काम करने लगीं. आन्दोलनकारियों को महिलाएं प्रोत्साहित करती थीं, जेल जाते समय सम्मानित कर पूजा करती, आरती उतारतीं और फूल चढ़ाया करती थीं.

महिलाओं में जगी आजादी की भावना

1929 से 1930 के बीच महिलाओं में जागृति व्यापक होती गई. 1930 तक ये स्त्रियां सीधे आन्दोलन में भाग लेने लगीं. तब अल्मोड़ा ही नहीं, रामनगर और नैनीताल की महिलाओं में भी जागृति आने लगी थी. 25 मई, 1930 को अल्मोड़ा नगर पालिका में राष्ट्रीय ध्वज फहराने का निश्चय हुआ. स्वयं सेवकों का एक जुलूस, जिसमें महिलाएं भी शामिल थीं उसे गोरखा सैनिकों ने रोक दिया. इसमें मोहनलाल जोशी तथा शांतिलाल त्रिवेदी पर हमला हुआ और वे लोग घायल हुये.
Loading...

तब बिश्नी देवी शाह, दुर्गा देवी पन्त, तुलसी देवी रावत, भक्तिदेवी त्रिवेदी आदि के नेतृत्व में महिलाओं ने संगठन बनाया. कुन्ती देवी वर्मा, मंगला देवी पाण्डे, भागीरथी देवी, जीवन्ती देवी तथा रेवती देवी की मदद के लिये बद्रीदत्त पाण्डे और देवीदत्त पन्त अल्मोड़ा के कुछ साथियो सहित वहां आए. इससे महिलाओं का साहस बढ़ा. अंततः वह झंडारोहण करने में सफल हुईं, दिसम्बर, 1930 में बिश्नी देवी शाह को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें अल्मोड़ा जेल में रखा गया.

खादी के प्रचार के साथ जारी रहा आंदोलन

जेल से छूटने के बाद बिश्नी देवी जी खादी के प्रचार में जुट गईं. उन्होंने अल्मोतड़ा में चरखे का मूल्य घटवाकर 5 रुपये करवाया और घर-घर जाकर महिलाओं को दिलवाया. उन्हें संगठित कर चरखा कातना सिखाया. उनका कार्यक्षेत्र अल्मोड़ा से बाहर भी बढ़ने लगा. 2 फरवरी, 1931 को बागेश्वर में महिलाओं का एक जुलूस निकला तो बिश्नी देवी ने उन्हें बधाई दी. सेरा दुर्ग (बागेश्वर) में आधी नाली जमीन और 5 रुपये दान में दिये. वे आन्दोलनकारियों के लिये छुपकर धन जुटाने, सामग्री पहुंचाने तथा पत्रवाहक का कार्य भी करतीं थीं. राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रियता के कारण जुलाई 1933 में उन्हें गिरफ्तार कर फतेहगढ़ जेल भेज दिया गया. उन्हें 9 माह की सजा और 200 रुपये जुर्माना हुआ. जुर्माना न देने पर सजा और बढ़ाई गई. वहां से रिहा होने के बाद 1934 में बागेश्वर मेले में धारा 144 लगी होने के बावजूद उन्होंने स्वदेशी प्रदर्शनी करवाई.

भारत छोड़ो आंदोलन

26 फरवरी, 1940 को नन्दा देवी के प्रांगण में 10 बजे फिर झंडारोहण किया. बिश्नी दवी ने 1940-41 को व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया. उन्होंने अनेक शराब की दुकानों पर धरना दिया और विदेशी वस्त्रों की होलियां जलाई. 17 अप्रैल, 1940 को वे नन्दा देवी मन्दिर के समीप खुलने वाले कताई केन्द्र की संचालिका बनीं. 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन में ब्रिटिश सरकार को बिश्नी देवी ने आन्दोलनकारी महिला की भूमिका का एहसास कराया. पंडित जवाहरलाल नेहरु और आचार्य नरेन्द्र देव की अल्मोड़ा जेल से रिहाई के समय बिश्नी देवी ने उनकी अगवानी की. नन्दा देवी प्रांगण में 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता दिवस के दिन बिश्नी देवी शाह राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को पकड़कर नारे लगातीं हुई एक मील लम्बे जुलूस शामिल हुईं.

अपने विधवा जीवन के खाली पन को स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़कर पूरा कर दिया.  महिला कार्यकर्ता होने के कारण स्वाधीनता के बाद उन्हें भी कोई महत्व नहीं मिला, उनका अपना कोई न था. आर्थिक अभाव में उनका अन्तिम समय अत्यन्त कष्टपूर्ण स्थिति में बीता. वर्ष 1974 में 73 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ.


First published: August 15, 2016, 10:43 AM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...