उत्तराखंड के 21 साल के राजनीतिक इतिहास में BJP ने चला बहुत बड़ा दांव, 48 घंटे में कर डाला दूसरा स‍ियासी फेरबदल

बीजेपी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए खास रणनीति बनाई है. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)

बीजेपी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए खास रणनीति बनाई है. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)

Political Reshuffle in Uttarakhand: बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत को उनके पद से हटा दिया गया और उनकी जगह हरिद्वार से विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया. हालांकि माना जा रहा है भगत को तीरथ सिंह रावत की कैबिनेट में शामिल किया जा सकता है.

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शैलेंद्र सिंह नेगी

48 घंटों के भीतर बीजेपी ने उत्तराखंड में दूसरा सबसे बड़ा सियासी फेरबदल किया है. 10 मार्च शाम 4 बजे त्रिवेंद्र सिंह रावत की जगह तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया, जबकि उसके ठीक 48 घंटे बाद हो रहे तीरथ सिंह रावत के कैबिनेट गठन से पहले ही बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत को उनके पद से हटा दिया गया और उनकी जगह हरिद्वार से विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया. हालांकि माना जा रहा है भगत को तीरथ सिंह रावत की कैबिनेट में शामिल किया जा सकता है. जानकार मानते हैं कि पिछले पांच सालों में प्रदेश की सियासत में आनन-फानन में हुए ये दो बदलाव सबसे बड़े बदलाव हैं.

इसलिए हुई भगत की विदाई

छह बार के विधायक बंशीधऱ भगत साल 2020 में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए. 70 साल के भगत जब से प्रदेश अध्यक्ष बने तब से लेकर अब तब लगातार गढ़वाल और कुमाऊं के दौरे पर रहे. उन्होंने हर विधानसभा का दौरा किया, लेकिन इसी दौरान उनके कुछ विवादित बयानों से पार्टी के सामने परेशानी खड़ी कर दी. उन्होंने एक बार पीएम मोदी का असर खत्म होने संबंधी बयान दे डाले थे, जिसके कारण पार्टी की काफी किरकिरी हुई थी. साथ ही नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश के लिए उनके द्वारा कहे गए बुढ़िया शब्द से भी पार्टी बैकफुट पर आई थी.
तत्कालीन सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत को इस मामले में अपनी तरफ से नेता प्रतिपक्ष से माफी भी मांगनी पड़ी थी. पार्टी आलाकमान ने भी भगत के इन बयानों को सही नहीं माना जा रहा था. सूत्रों के मुताबिक, तभी से भगत को हटाने की रणनीति चल रही थी, लेकिन त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के इस्तीफे के बाद पार्टी को आसान रास्ता नजर आया और मौका देखते हुए अध्यक्ष पद से भगत को विदाई दे दी गई. भगत की जगह नए अध्यक्ष बने मदन कौशिक उनकी तुलना में कम उम्र के हैं. इसलिए चुनावी साल में ज्यादा भागदौड़ को देखते हुए उन्हें कमान सौंपी गई है.

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किसान आंदोलन को देखते हुए लिया गया निर्णय



मदन कौशिक ब्राह्मण कम्युनिटी का प्रतिनिधित्व करते हैं. उन्हें एक तेज-तर्रार नेता माना जाता है. त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार में शहरी विकास के अलावा कई अहम मंत्रालय संभालने वाले कौशिक को संघ का भी आशीर्वाद मिला हुआ है. क्योंकि कृषि कानून के खिलाफ जारी किसान आंदोलन के बाद मैदानी जिलों हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर में बीजेपी की स्थिति बेहतर नहीं मानी जा रही है. जानकार मानते हैं कि बीजेपी ने मैदानी जिले से आने वाले मदन कौशिक को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाने का फैसला लिया है. ​

मैदान से पहली बार बना कोई प्रदेश अध्यक्ष

बंशीधर भगत के बाद प्रदेश अध्यक्ष बने मदन कौशिक बीजेपी के 11वें प्रदेश अध्यक्ष हैं. जनरल (रि) बीसी खंडूरी प्रदेश बीजेपी के पहले अध्यक्ष जिनके बाद पूरन चंद्र शर्मा, भगत सिंह कोश्यारी, मनोहर कांत ध्यानी, भगत सिंह कोश्यारी, बच्ची सिंह रावत, बिशन सिंह चुफाल, तीरथ सिंह रावत, अजय भट्ट, बंशीधर भगत के अध्यक्ष बनने का सिलसिला जारी रहा, लेकिन कौशिक से पहले बने सभी 10 प्रदेश अध्यक्ष कुमाऊं और गढ़वाल के पहाड़ी जिलों से ही ताल्लुक रखने वाले थे. लेकिन ये पहला मौका है जब किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी ने पहाड़ी जिलों से मैदानी जिले से ताल्‍लुक रखने वाले नेता को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. कांग्रेस भी ऐसी हिम्मत अभी तक नहीं कर पाई है. कांग्रेस में अभी तक हरीश रावत, यशपाल आर्य, किशोर उपाध्याय, प्रीतम सिंह अध्यक्ष रहे हैं, जिनका संबंध पहाड़ी जिलों से ही रहा है. ऐसे में हरिद्वार से संबंध रखने वाले मदन कौशिक को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर बीजेपी ने नया सियासी दांव खेला है.

तोड़ा गढ़वाल-कुमाऊं का फॉर्मूला

आमतौर पर देखा गया है कि सरकार होने की स्थिति में कोई भी पार्टी मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष में जातीय और क्षेत्रीय समीकरण का विशेष खयाल रखती है, लेकिन मदन कौशिक को बनाने से बीजेपी ने क्षेत्रीय समीकरण को भी तोड़ दिया है. आमतौर पर माना जाता है कि मुख्यमंत्री गढ़वाल का राजपूत होने की स्थिति में कुमाऊं के ब्राह्मण को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाता है. वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री कुमाऊं का राजपूत होने की स्थिति में गढ़वाल के ब्राह्मण को पार्टियां प्रदेश अध्यक्ष बनाते रही हैं. विपक्ष पर रहते हुए पार्टियां नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष को लेकर इसी क्षेत्रीय फॉर्मूले को फॉलो करती रही हैं, लेकिन इस बार बीजेपी ने गढ़वाल मंडल से ही मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष बना नया सियासी समीकरण गड़ने की कोशिश की है.
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