जानिए सैकड़ों साल से बदरीनाथ में कौन बनाता है भोग, कहां रहती है चाबी

Robin Singh Chauhan | News18India
Updated: November 15, 2017, 7:56 PM IST
जानिए सैकड़ों साल से बदरीनाथ में कौन बनाता है भोग, कहां रहती है चाबी
file photo Badrinath temple
Robin Singh Chauhan | News18India
Updated: November 15, 2017, 7:56 PM IST
बदरी नाथ जिसे मोक्ष धाम भी कहा जाता है, की अपनी परंपराएं है. यहां भगवान की मूर्ति को छूने और पूजा करने का अधिकार सिर्फ रावल का है जो कि दक्षिण भारत का ब्राह्मण होता है. इसके अलावा मंदिर कपाट बंद करते समय किसका ताला लगेगा. किसके पास इसकी चाबी होगी, जैसी सारी बातें सैकड़ों सालों पहले आदि शंकराचार्य तय कर चुके है.

माना जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने आठवीं सदी में नारदकुंड से निकालकर तप्तकुंड के पास गरुड़ गुफा में बदरीनाथ को मूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया था. बदरीनाथ की प्राण प्रतिष्ठा के बाद किया उसके बाद मंदिर के व्यवस्था ठीक तरह से चलती रहे इसके लिए उन्होंने आस पास रह रहे लोगों को कुछ अधिकार दिए. ये लोग बदरी नाथ के हक हकूक धारी कहलाए जाते हैं.

धाम की स्थापना से लेकर अब तक धाम की परंपराओं की तरह उनके आस-पास के गांव वालों को मिले अधिकार भी वैसे ही बरकरार हैं. मंदिर के अदंर गर्भ गृह से लेकर प्रसाद वितरण, भोग तैयार करने की ज़िम्मेदारियां शंकराचार्य बांटकर गए. भले ही मंदिर के रावल दक्षिण के ब्राह्मण होते हैं लेकिन तालमेल के लिए कुछ विशेष गांवों को खास जिम्मेदारियां दी गई हैं.

बद्रीनाथ के हक हकूकधारियों में सबसे पहले नाम आता है डिम्मर गांव के डिमरी ब्राह्मणों का. इनके पास कई अहम जिम्मेदारियां होती है.

इनमें सबसे महत्तवपूर्ण होती है भगवान का भोग तैयार करना. भगवान का प्रसाद यही लोग बना सकते हैं.

बदरी नाथ के मुख्य पुजारी जिन्हें रावल कहा जाता है, उनके अलावा कोई भी भगवान को छू नहीं सकता. लेकिन भागवान का प्रसाद डिमरी ब्राह्मण तैयार करते हैं और रोज़ इसका भोग लगाया जाता है. इसी को बाद में प्रसाद के रूप में भक्त ग्रहण करते हैं.

इसके अलावा डिमरी ब्राह्मण लक्ष्मि मंदिर, गरुड़ मंदिर, धर्म शिला के पुजारी भी होते हैं. साथ ही वह भगवान का चरणामृत भी यही लोग तैयार करते हैं.

इसके अलवा बामणी गांव और पांडुकेशवर के मेहता तोक, भण्डारी तोक और कमदी तोक के मेहता भण्डारी और कमदी लोगों के पास धाम में आरती को तैयार करना, उसको घुमाने का काम यही लोग करते हैं.

मंदिर के अंदर की सफाई व्यवस्था की जिम्मेदारी भी इन्हीं लोगों की होती है. भगवान का भोग तैयार करने के लिए समाग्री की व्यवस्था भी. इसके अलावा भण्डारण की व्यवस्था करना, उसे भोग मंडी तक पहुंचाने का काम भी यही लोग करते हैं.

इन तीनों समुदायों के लोगों की अपनी-अपनी पंचायत होती है और एक-एक कर इन जिम्मेदारियों की बारी उनको मिलती है. इनकी पंचायत नाम मंदिर समीति को देते है और उनको जिम्मेदारियां नामित कर दी जाती हैं. बामणी गांव के धीरज मेहता बताते हैं कि परिवार के सबसे बड़े मेहता होते हैं, फिर भण्डारी और फिर कमदी. जिम्मेदारी बड़े से छोटे भाई को मिलती है और यह क्रम लगातार कई सालों से यूं ही चल रहा है.

सबसे बडी जिम्मेदारी मेहता समुदाय की ये होती है कि उनका ताला कपाट बंद होने पर धाम के दरवाजे पर लगता है. उसकी एक चाबी उनके पास रहती है और एक मंदिर समिति के पास. कपाट में यह लोग ही ताला लगाने के लिए अधिकृत हैं. कपाट खोलने और बंद करने का काम यही लोग सदियों से करते आए हैं. हालांकि अब एक ताला मंदिर समीति का भी लगता है.

इनके अलावा जोशीमठ के रैंकवाल समुदाय के लोग घी और तेल की व्यवस्था मंदिर के लिए करते हैं.

प्रभुदास जिनकी जिमेमदारी भगवान को उठाने और सोने के वक्त ढोल बजाने की है. उनका परिवार यह काम सैंकड़ों सालों से कर रहा है. वह बताते हैं कि उनके पिता ने ये काम किया और आगे उनका लड़का इस परंपरा को आगे बढ़ाएगा. वह कहते हैं कि भगवान के वस्त्र सिलने की, भगवान के झण्डे बनाने की जिम्मेदारी उनकी ही है.

बदरीनाथ धाम से महज़ दो किलोमीटर दूर देश का आखरी गांव माणा की कुंवारी लड़कियों के पास भी एक अहम जिम्मेदारी है. जिस दिन कपाट बंद होते है उस दिन इस गांव की कुंवारी लड़कियां स्थानीय ऊन से एक शॉल बनाती हैं जिसे स्थानीय भाषा में बीना कम्बल कहते हैं. इस बीना कम्बल को भगवान को घृत लेपन करने के बाद धारण करवाया जाता है. और अगले 6 महीने तक इसी कंम्बल को भगवान ओढ़ते हैं.

धाम के धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल बताते हैं कि भले ही मंदिर समिति के पास व्यवस्थाओं का चार्ज हो लेकिन आज भी उन्हीं नियमों का पालन किया जाता है जो शंकराचार्य द्वारा स्थापित किए गए हैं.

 
First published: November 15, 2017
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