दिल्ली के लोगों के लिए लाइट हाउस है उत्तराखंड में 45 साल पहले हुआ चिपको आंदोलन

चमोली के रैणी गांव में 1973 में तमाम सरकारी दबाव के आगे ये ग्रामीण नहीं झुके थे और तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार को अपना फ़ैसला वापस लेना पड़ा था.

News18 Uttarakhand
Updated: June 25, 2018, 5:16 PM IST
दिल्ली के लोगों के लिए लाइट हाउस है उत्तराखंड में 45 साल पहले हुआ चिपको आंदोलन
चमोली के रैणी गांव में पेड़ों को कटने से बचाने के लिए महिलाएं पेड़ों से चिपक गई थीं. (फ़ाइल फ़ोटोः Firstpost)
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Updated: June 25, 2018, 5:16 PM IST
दक्षिण दिल्ली में 7 कॉलोनियों के पुनर्विकास के लिए 14,000 पेड़ काटने के फ़ैसले के विरोध के लोगों के तरीके ने चिपको आंदोलन की याद दिला दी है. 45 साल पहले चमोली में पेड़ काटने के सरकारी फ़रमान के ख़िलाफ़ लोग पेड़ों से चिपक गए थे. चमोली की अनपढ़ ग्रामीण गौरा देवी के नेतृत्व में तब सबसे पहले महिलाएं पेड़ों से चिपक गई थीं और पेड़ काटने आए ठेकेदार को चुनौती दी थी कि पेड़ काटने से पहले उन्हें काटने होगा. तमाम सरकारी दबाव के आगे ये ग्रामीण नहीं झुके थे और तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार को अपना फ़ैसला वापस लेना पड़ा था. करीब आधी शताब्दी बाद दिल्ली के लोगों ने भी वही इच्छाशक्ति दिखाई है.

ख़ास बात यह है कि 26 मार्च, 1973 को विकास के नाम पर ही चमोली में करीब ढाई हज़ार पेड़ काटने का ठेका दे दिया गया था. तब गौरा देवी नाम की एक साधारण सी महिला के नेतृत्व में महिलाओं ने इसका पुरज़ोर विरोध किया था. उनका कहना था कि जंगल नहीं रहेंगे तो वह कैसे ज़िंदा रह पाएंगे. अपने पर्यावरण से उनका यह संबंध इतना गहरा था कि जब ठेका लेने वाले पेड़ काटने आए तो महिलाएं पेड़ों से लिपट कर खड़ी हो गईं और उन्होंने चुनौती दी कि पेड़ काटने से पहले उन पर आरी चलानी होगी.

कई दिन के विरोध के बाद आखिरकार इंदिरा गांधी सरकार को झुकना पड़ा था और पेड़ों के काटने के फ़ैसले को वापस ले लिया गया था. जानकार तो यह भी कहते हैं कि 1980 का वन संरक्षण अधिनियम और केंद्र सरकार में पर्यावरण मंत्रालय का गठन भी चिपको आंदोलन की वजह से ही संभव हो पाया था.

इस आंदोलन ने गौरा देवी, चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा का नाम दुनिया भर में मशहूर कर दिया था. अपने तरह के पहले और अनूठे इस आंदोलन का अध्ययन दुनिया भर में किया गया और इसने पर्यावरण सरंक्षण के लिए की जा रही कोशिशों के लिए दुनिया भर में एक मशाल का काम किया है.

दिल्ली में हो रहा आंदोलन भी इसी से प्रेरित है और इसने एक बार फिर इंसान और प्रकृति के बीच परस्पर संबंध के महत्व को रेखांकित किया है. अच्छी बात यह है कि दिल्ली के लोगों को लाइटहाउस की तरह राह दिखा रहा है चमोली में हुआ चिपको आंदोलन, जिसने यह बात पहली बार दुनिया के सामने स्थापित की थी जंगल के लिए इंसान जान भी देने को तैयार हो सकता है.
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