ज़िला विकास प्राधिकरण पर दिन भर हुआ सदन में बवाल... हंगामे से शुरु, वॉकआउट पर खत्म

सदन में ज़िला विकास प्राधिकरणों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष में जमकर बहस हुई.

कांग्रेस ने कहा कि प्राधिकरण के नियम पहाड़ के अनुकूल नहीं हैं. इसकी आड़ में लोगों का उत्पीड़न हो रहा है और प्राधिकरण लूट का अड्डा बन गए हैं.

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गैरसैंण. बजट सत्र के तीसरे दिन सदन के बाहर ढोल-दमाऊ के बीच अबीर गुलाल ने समां बांधा तो सदन के अंदर ज़िला विकास प्राधिकरणों का मामला छाया रहा. करीब डेढ़ घंटे तक सदन में जमकर हंगामा हुआ. विपक्ष चाहता था कि प्राधिकरणों के नियम शिथिल किए जाएं लेकिन इस पर बात नहीं बनी तो विपक्ष ने वॉकआउट कर दिया.

मंत्री का ऐतराज़ 

उत्तराखंड में ज़िला विकास प्राधिकरण का लंबे समय से विरोध चल रहा है. गुरुवार को सदन की कार्यवाही शुरु होते ही विधानसभा अध्यक्ष ने प्राधिकरणों की नियमावली की समीक्षा को बनाई गई विधानसभा की समिति की रिपोर्ट को सदन के पटल पर रखा. विपक्ष ने सदन की कार्यवाही को रोक इस पर चर्चा की मांग की और अध्यक्ष ने इसे नियम 58 में स्वीकार भी कर लिया.

लेकिन संसदीय कार्यमंत्री मदन कौशिक ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि रिपोर्ट पर चर्चा सदन की अवमानना होगी. विधानसभा अध्यक्ष सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे और सरकार इस पर निर्णय लेगी. उसके बाद गर दिक्कत होती है तो विपक्ष मामला उठा सकता है.

पहाड़ के अनुकूल नहीं 

इस पर नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश, उपनेता प्रतिपक्ष करन माहरा ने कहा कि प्राधिकरण के नियम पहाड़ के अनुकूल नहीं हैं. इसकी आड़ में लोगों का उत्पीड़न हो रहा है और प्राधिकरण लूट का अड्डा बन गए हैं. विपक्ष का कहना था कि जब तक सरकार नई नियमावली जारी करती है तब तक प्राधिकरणों से जनता को राहत दी जाए.

सरकार ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया. नतीजा यह रहा कि विपक्ष ने सदन से वॉकआउट कर दिया.

उत्तराखंड में हरिद्वार, देहरादून, नैनीताल, गंगोत्री समेत पांच विकास प्राधिकरण पहले से गठित थे लेकिन 2016 में कांग्रेस सरकार ने 22 और प्राधिकरण गठित कर दिए. भाजपा सत्ता में आई तो उसने सभी छोटे-बड़े 27 प्राधिकरणों को मर्ज कर हर ज़िले में एक प्राधिकरण बना दिया.

अपने अव्यवहारिक नियमों के चलते ये प्राधिकरण लोगों के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं.

 

 

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