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CM के माला पहनकर सदन आने पर बवाल... प्रीतम सिंह ने जताया ऐतराज़ तो कौशिक ने दी चुनौती

सदन में आने से पहले मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत विधानसभा भवन के बाहर जश्न में शरीक हुए थे.

सदन में आने से पहले मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत विधानसभा भवन के बाहर जश्न में शरीक हुए थे.

संसदीय कार्य मंत्री ने पूछा कि वेल में आना, अध्यक्ष की ओर आना, मेज थपथपाना कौन से नियम में आता है?

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गैरसैंण. गैरसैंण में विधानसभा के बाहर आज जश्न का सा माहौल रहा और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल समेत कई विधायक पारंपरिक वाद्यों पर नाचते नज़र आए थे.  इसी जश्न की खुमारी में नेता सदन, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और कुछ विधायक फूलमाला पहनकर सदन में आ गए. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और चकराता विधायक प्रीतम सिंह ने नेता सदन इस पर आपत्ति जताई और इसे सदन की गरिमा के ख़िलाफ़ बताया. इस पर पक्ष विपक्ष में ज़बरदस्त बहस हुई.

माला पर बवाल

सुबह सदन की शुरुआत हंगामे के साथ हुई थी और करीब पौने 12 बजे सदन को स्थगित कर दिया गया था. 12 बजे सदन फिर शुरु हुआ तो प्रीतम सिंह ने नेता सदन और कुछ विधायकों के माला पहनकर सदन में आने पर आपत्ति जता दी. प्रीतम सिंह ने इसे सदन की गरिमा के ख़िलाफ़ बताया.

संसदीय कार्य मंत्री मदन कौशिक ने इसका जवाब देते हुए कहा कार्य संचालन नियमावली का हवाला दिया. उन्होने पूछा कि वेल में आना, अध्यक्ष की ओर आना, मेज थपथपाना कौन से नियम में आता है?

कौशिक ने कहा कि गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा के बाद विपक्ष बौखला गया है. बाहर लोग फूल माला लेकर जश्न मना रहे हैं. अगर नेता सदन माला पहनाकर आ भी गए, तो कौन से नियम का उल्लंघन हुआ.

गलती मान लें

इसके बाद कांग्रेस विधायक क़ाज़ी निजामुददीन प्रीतम सिंह के बचाव में उतरे. उन्होंने कहा कि सदन में बैच पहनकर भी आना नियमावली का उल्लंघन है. माला पहनकर आने में हालांकि सज़ा का कोई प्रावधान नहीं है लेकिन गलती स्वीकार कर लीजिए भविष्य की पीढ़ियों के लिए नियम बने रहेंगे.

इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ने दखल दिया और सदस्यों को किया शांत किया. उन्होंने सदन की इन परंपराओं पर निर्णय सुरक्षित रख लिया.

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जमीन धंसने से मकानों में पड़ीं दरारें, कई परिवारों को मजबूरन छोड़ना पड़ा आशियाना

मकानों में इस तरह की दरारें पड़ी हैं.

स्थानीय लोगों की मानें तो ऑलवेदर रोड की कटिंग के चलते हुए भू-धंसाव से उनके घरों में दरारें पड़ गई हैं.

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भारी बारिश और भू-धंसाव की वजह से चमोली जिले के कर्णप्रयाग नगरपालिका के वार्ड नंबर 4, आईटीआई बहुगुणा नगर के कई परिवार डर के साये में जीने को मजबूर हैं. यहां लगातार हो रहे भू-धंसाव से मकानों में दरारें पड़ गई हैं और बारिश का पानी इन दरारों में जमा होने से आए दिन मकानों में टूट-फूट हो रही है.

अभी तक कई परिवार अपने मकानों को छोड़कर किराये के मकानों में शिफ्ट हो गए हैं, वहीं कुछ लोग जो आर्थिक तौर पर कमजोर हैं, वे जर्जर हुए मकानों में ही रह रहे हैं, जिससे उनके लिए खतरा बना हुआ है.

स्थानीय लोगों की मानें तो ऑलवेदर रोड की कटिंग के चलते हुए भू-धंसाव से उनके घरों में दरारें पड़ गई हैं. दरारों में पानी भरने से खतरा और ज्यादा बढ़ गया है. अब तक कई परिवार अपना घर छोड़कर या तो किराये के मकानों में शिफ्ट हो चुके हैं या अपने रिश्तेदारों के यहां रह रहे हैं.

लोगों ने जल्द से जल्द प्रशासन से पुनर्वास व मुआवजे की मांग की है. तहसीलदार सुरेंद्र सिंह देव ने इस मामले में कहा कि जिन लोगों के मकानों में ज्यादा नुकसान हुआ है, उनके रहने की व्यवस्था सामुदायिक भवन, आईटीआई भवन समेत अन्य जगहों पर की गई है. साथ ही प्रभावित इलाके का मुआयना कर जिला प्रशासन को सूचना भेजी गई है.

3 युगों तक यहीं रहे थे भगवान विष्णु, कलयुग शुरू होते ही चले गए थे बद्रीनाथ धाम

आदिबद्री में भगवान नारायण का मुख्य मंदिर.

वर्तमान में यहां भगवान विष्णु के मुख्य मंदिर के अलावा 13 और मंदिर हैं.

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उत्तराखंड के पंच बद्री धामों में से एक आदिबद्री मंदिर चमोली जिले में स्थित एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है. यह मंदिर रानीखेत मार्ग पर कर्णप्रयाग से करीब 17 किलोमीटर दूर है. माना जाता है कि बद्रीनाथ से पहले यहीं पर भगवान विष्णु की पूजा की जाती थी. भगवान विष्णु प्रथम तीन युगों सतयुग, द्वापर युग और त्रेतायुग तक आदिबद्री मंदिर में ही रहे और कलयुग में वह बद्रीनाथ मंदिर चले गए.

वर्तमान में यहां भगवान विष्णु के मुख्य मंदिर के अलावा 13 और मंदिर हैं. भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के अनुसार, यहां पहले कुल 16 मंदिर हुआ करते थे लेकिन दो मंदिर नष्ट हो गए. माना जाता है कि इन मंदिरों का निर्माण स्वर्ग जाते समय पांडवों ने किया था.

कुछ मान्यताओं के अनुसार, आदि गुरू शंकराचार्य ने इन मंदिरों का निर्माण 8वीं सदी में किया था, जबकि भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग का मानना है कि आदिबद्री मंदिर समूह का निर्माण 8वीं से 11वीं सदी के बीच कत्यूरी वंश के राजाओं ने करवाया था.

अगर मंदिर की वास्तुकला की बात करें तो यहां मंदिर पिरामिड शंकु आकार के हैं, जो काफी हद तक गढ़वाल के अन्य मंदिरों से संरचना में अलग दिखाई देते हैं. मुख्य मंदिर काफी बड़ा है, जहां भगवान विष्णु की प्रतिमा काली शिला पर है और वह दर्शन मुद्रा में खड़े हैं.

यहां भगवान विष्णु की 3 फीट ऊंची मूर्ति की पूजा की जाती है. वहीं मुख्य मंदिर के ठीक सामने श्रीहरि के वाहन गरुड़ का मंदिर है. इसके अलावा यहां भगवान सत्यनारायण, लक्ष्मी नारायण, भगवान राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, मां गौरी, मां काली, मां अन्नपूर्णा, चक्रभान, भगवान भोलेनाथ और कुबेर के मंदिर भी स्थित हैं. हालांकि कुबेर के मंदिर में उनकी प्रतिमा नहीं है.

उत्तराखंड में 4 कमरों का 'इंटर कॉलेज', मान्यता तो दी लेकिन भवन निर्माण कराना भूल गए हुक्मरान

इंटर कॉलेज के छात्र बरामदे में बैठकर पढ़ रहे हैं.

बारिश आ जाए तो कॉलेज के छात्र बरामदे में पढ़ाई से भी मोहताज हो जाते हैं.

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उत्तराखंड के चमोली में प्रशासन की लापरवाही का बड़ा उदाहरण देखने को मिला है. गैरसैंण ब्लॉक और तहसील आदि बद्री स्थित सिलपाटा गांव का इंटर कॉलेज चार कमरों में चल रहा है. इस स्कूल को साल 2006 में हाईस्कूल और फिर 2014 में 12वीं कक्षा तक के लिए मान्यता मिल गई थी, लेकिन अभी तक यहां 9वीं से 12वीं कक्षा के लिए कोई भवन निर्माण नहीं हुआ है.

वहीं जूनियर स्कूल का भवन बीते जून से भूस्खलन की वजह से क्षतिग्रस्त है. कक्षा 6 से 12वीं तक का संचालन रमसा के अंतर्गत बने चार कमरों से हो रहा है. कभी-कभी क्लास के बरामदे में भी बच्चों को पढ़ाया जाता है.

बारिश आ जाए तो बच्चे बरामदे से भी मोहताज हो जाते हैं. इसी वजह से कई बार छात्रों की छुट्टी भी करनी पड़ती है. 7 साल से ज्यादा का समय और दो बार उच्चीकृत होने के बावजूद सरकार और प्रशासन ने जीआईसी सिलपाटा की कोई सुध नहीं ली, जबकि इस स्कूल में सिलपाटा गांव समेत आसपास के गांव पज्याना, मल्ला, लंगटाई, छिमटा, स्वामीकील के 183 बच्चे पढ़ते हैं.

बड़ा सवाल यह भी है कि कैसे मानकों को पूरा किए बिना सिलपाटा के इस जूनियर स्कूल को जीआईसी का दर्जा मिल गया. इसके साथ ही जो नए कमरे रमसा के अंतर्गत बने हैं और जहां वर्तमान में कक्षाएं संचालित की जाती हैं, उसका भवन भी लैंडस्लाइड जोन में है, जिस वजह से यहां पढ़ने वाले स्टूडेंट्स के लिए खतरा भी बना हुआ है.

जब न्यूज 18 लोकल की टीम ने गैरसैंण के खंड शिक्षा अधिकारी एमएस बिष्ट से जीआईसी सिलपाटा के बारे में जानकारी ली तो उन्होंने फोन पर बताया कि यह स्कूल स्लाइडिंग जोन में है और इसकी रिपोर्ट शासन को आगे भेज दी है. इस स्कूल के भवन निर्माण के लिए सुरक्षित जगह को देखा जा रहा है. जल्द ही कक्षाओं के लिए भवन का निर्माण किया जाएगा.

चमोली में 'कुटकी' की खेती कर रहे किसान, नीदरलैंड-अमेरिका में भी इस औषधीय पौधे की मांग

घेस गांव में कुटकी की खेती करते हुए किसान.

चमोली जिले के घेस गांव में किसान औषधीय गुणों से युक्त कुटकी पौधे की खेती कर रहे हैं.

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चमोली जिले के देवाल ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले घेस गांव के किसान पिछले 20 वर्षों से औषधीय गुणों से युक्त पौधे कुटकी की खेती कर अच्छी-खासी आमदनी कर रहे हैं. कुटकी का पौधा बुखार, टॉयफॉयड, टीबी, बवासीर, बदन दर्द, डायबिटीज, सूखी खांसी, शरीर में जलन, पेट के कीड़े, मोटापा, जुकाम आदि रोगों के उपचार में फायदेमंद है.

दवाई बनाने में प्रयोग होने वाली कुटकी की डिमांड देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक से आ रही है. घेस गांव से कुटकी नीदरलैंड तक भेजी जा रही है और अब अमेरिका से भी इसकी मांग आने लगी है.

बता दें कि सेना से रिटायर होने के बाद कैप्टन केशर सिंह बिष्ट ने घेस गांव में कुटकी की खेती शुरू की थी. जिसके बाद 2001 से गांव के किसानों ने भी इसकी खेती करनी शुरू कर दी. वहीं किसान अब कुटकी के अलावा अतीश, जटामासी सहित कई प्रकार की जड़ी-बूटी की खेती भी कर रहे हैं.

करीब 700 नाली से ज्यादा जमीन में घेस और हिमनी गांव के किसान जड़ी-बूटी उगा रहे हैं. घेस के पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य कलम सिंह पटाकी ने बताया कि वैसे तो पिछले 20 साल से गांव में कुटकी की खेती की जा रही है, लेकिन कोरोना काल में लौटे प्रवासियों समेत सभी गांव के लोगों ने इसकी खेती करना शुरू कर दिया है, जिसका उनको काफी फायदा मिला है. वर्तमान में कुटकी लगभग 1500 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है.

इस मंदिर में आंख पर पट्टी बांधकर होते है भगवान के दर्शन

लाटू देवता का मंदिर वाण गांव में स्थित है.

लाटू देवता मंदिर के पुजारी को भी पूजा के विशेष नियमों को मानते हुए नाक, कान और आंखों पर पट्टी बांधकर अंदर जाना होता है.

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क्या आप जानते हैं, उत्तराखंड के चमोली जिले में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां श्रद्धालु आस्था के साथ जाते तो जरूर हैं लेकिन भगवान के दर्शन नहीं कर सकते. चमोली के देवाल ब्लॉक के वाण गांव में 8500 फीट की ऊंचाई पर लाटू देवता का मंदिर एक ऐसा रहस्यमयी मंदिर है, जहां न महिलाओं को और न ही पुरुषों को मंदिर के अंदर जाने की इजाजत है. यहां तक कि मंदिर के पुजारी भी भगवान के दर्शन नहीं कर सकते.

लाटू देवता मंदिर के पुजारी को भी पूजा के विशेष नियमों को मानते हुए नाक, कान और आंखों पर पट्टी बांधकर अंदर जाना होता है.

स्थानीय लोगों का मानना है कि इस मंदिर में नागराज अपनी मणि के साथ रहते हैं. मणि की तेज रोशनी से इंसान अंधा भी हो सकता है. यही नहीं, पुजारी के मुंह की गंध तक देवता तक नहीं पहुंचनी चाहिए और नागराज की विषैली गंध पुजारी की नाक तक पहुंचनी चाहिए. वहीं इस मंदिर में श्रद्धालु 75 फीट की दूरी से पूजा-अर्चना करते हैं.

पौराणिक कथाओं के अनुसार, लाटू देवता उत्तराखंड की आराध्या देवी मां नंद के धर्म भाई हैं. जब देवी पार्वती के साथ भगवान शिव का विवाह हुआ तो पार्वती जिन्हें नंदा देवी नाम से भी जाना जाता है, को विदा करने के लिए सभी भाई कैलाश की ओर चल पड़े. इसमें चचेरे भाई लाटू भी शामिल थे.

रास्ते में लाटू देवता को इतनी प्यास लगी कि वह पानी के लिए इधर-उधर भटकने लगे. उन्हें एक कुटिया दिखी तो वह वहां पानी पीने चले गए. कुटिया में एक साथ दो मटके रखे थे, एक में पानी था और दूसरे में मदिरा. लाटू देवता ने गलती से मदिरा पी ली और उत्पात मचाने लगे. इससे देवी पार्वती को गुस्सा आ गया और उन्होंने लाटू देवता को श्राप दे दिया. बता दें कि इस मंदिर के द्वार साल में एक बार वैशाख महीने की पूर्णिमा पर खुलते हैं.

चमोली : बादल फटने से घरों में घुसा मलबा, लोगों ने भागकर बचाई जान

स्थानीय लोग खुद मलबा निकालने के लिए जुटे.

भारी बारिश ने पहाड़ों पर आफत मचाई हुई है. जगह-जगह भूस्खलन की घटनाएं सामने आ रही हैं.

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भारी बारिश ने पहाड़ों पर आफत मचाई हुई है. जगह-जगह लोग भूस्खलन के चलते डर के साये में जीने को मजबूर हैं. चमोली जिले के नारायणबगड़ में बादल फटने से स्थानीय लोगों का जन-जीवन बुरी तरह प्रभावित हो गया. रिहायशी इलाकों में मलबा आ गया. लोगों ने भागकर अपनी जान बचाई.

बारिश की वजह से भूस्खलन के बाद मलबा बहता हुआ रिहायशी इलाके में आ गया. एक मकान और गौशाला मलबे की जद में आ गई. डौंडियाल परिवार और उनके किराएदारों का भी लाखों का सामान मलबे की चपेट में आ गया.

प्रशासन ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा तो लिया, लेकिन मलबे को हटाने का कोई इंतजाम नहीं किया. जिसके बाद स्थानीय लोग खुद मलबे को हटाने में जुट गए.

पीड़ित शिवानी ढौंडियाल ने प्रशासन से पुनर्वास और क्षतिग्रस्त मकान के मुआवजे की मांग की है. तहसीलदार थराली रवि साह ने इस बारे में कहा कि नियमों के तहत पीड़ित परिवार को पांच महीने तक 3800 रुपये का मुआवजा दिया जाएगा.

शिक्षक दिवस : जज्बे को सलाम! 20 साल की शिवानी ने बच्चों के लिए शुरू की 'मेरा घर, मेरी पाठशाला'

बच्चों को पढ़ाते हुए शिवानी बिष्ट.

गोपेश्वर के कटूड़ की रहने वालीं 20 वर्षीय शिवानी बिष्ट की पहल ने बच्चों की पढ़ाई में संजीवनी का काम किया.

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कोरोना काल में हर क्षेत्र को मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. वहीं शिक्षा के क्षेत्र पर कुछ ज्यादा ही असर पड़ा है. खासकर छोटे बच्चों की शिक्षा पर, जो ऑनलाइन माध्यम से भी ठीक तरह से पढ़ाई नहीं कर पाते, लेकिन शिक्षक दिवस के अवसर पर हम आपको गोपेश्वर के कटूड़ की एक ऐसी 20 वर्षीय लड़की से रूबरू करवाते हैं, जिसकी पहल ने बच्चों की पढ़ाई में संजीवनी का काम किया.

गोपेश्वर पीजी कॉलेज की एमएससी की छात्रा शिवानी बिष्ट ने जब स्कूल बंद होने के कारण अपने गांव के स्कूली बच्चों की पढ़ाई में कोरोना को बाधा बनते देखा, तो शिवानी ने खुद बीड़ा उठाते हुए बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और वह भी निशुल्क.

इस नेक काम में गांव के ही समाजसेवी सुनील नाथन बिष्ट ने उनका साथ दिया. दोनों ने मिलकर गांव में ही \’मेरा घर, मेरी पाठशाला\’ खोली और गांव सहित आसपास के बच्चों की शिक्षा में योगदान दिया.

हालांकि अब उत्तराखंड में स्कूल खुलने लगे हैं लेकिन फिर भी शिवानी बिष्ट बच्चों को गांव के पंचायती भवन में शाम को पढ़ा रही हैं और पहले जहां वह कोरोना में निशुल्क पढ़ा रही थीं, अब उन्हें ग्रामीण अपनी ओर से प्रोत्साहन राशि देकर भी सहयोग कर रहे हैं.

देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की मांग पर अड़े केदारनाथ के तीर्थ पुरोहित, अनशन जारी

केदारनाथ के तीर्थ पुरोहितों का अनशन जारी है.

तीर्थ पुरोहितों ने अनशन के दौरान जमकर नारेबाजी की. पुरोहितों ने कहा कि सरकार इतना लंबा समय गुजर जाने के बाद भी कोई पहल नहीं कर रही है.

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देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की मांग को लेकर तीर्थ पुरोहितों का आंदोलन चारों धामों सहित मुख्य मंदिरों में बढ़ता जा रहा है. पिछले दो महीने से केदारनाथ धाम में तीर्थ पुरोहित देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की मांग को लेकर परिजनों समेत आंदोलन में कूद गए हैं. वहीं गुरुवार को भी केदारनाथ धाम में देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की मांग को लेकर तीर्थ पुरोहितों का क्रमिक अनशन जारी रहा.

तीर्थ पुरोहितों ने अनशन के दौरान जमकर नारेबाजी की. पुरोहितों ने कहा कि सरकार इतना लंबा समय गुजर जाने के बाद भी कोई पहल नहीं कर रही है. तीर्थ पुरोहित लगातार अपना विरोध सरकार के सामने व्यक्त कर रहे हैं लेकिन उनकी मांग पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं हो सकी है.

उन्होंने कहा कि जब तक देवस्थानम बोर्ड भंग नहीं किया जाता आंदोलन चारों धामों में जारी रहेगा. बता दें कि दो साल पहले तत्कालीन सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व में देवस्थानम बोर्ड का गठन किया गया था. बोर्ड में उत्तराखंड के चार धाम बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री ओर यमुनोत्री सहित कुल 51 मंदिर शामिल किए गए थे. केदारनाथ में बोर्ड का गठन होने से पहले केदारनाथ मंदिर का संचालन बद्री केदार मंदिर समिति करती थी. केदारनाथ की सभी व्यवस्थाएं मंदिर समिति देखती थी लेकिन बोर्ड का गठन होने के बाद केदारनाथ धाम की सभी व्यवस्थाएं सरकार और प्रशासन के अधीन आ गई, जिससे तीर्थ पुरोहित और हक हकूकधारी नाराज हैं.

वहीं देवस्थानम बोर्ड को लेकर राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हाई पॉवर कमेटी के गठन की घोषणा कर चुके हैं. इस घोषणा को 15 दिन से अधिक का समय हो चुका है, बावजूद इसके अभी तक हाईपॉवर कमेटी गठन का विधिवत आदेश जारी नहीं हुआ है.

देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की जयंती यानी 20 अगस्त को \’सद्भावना दिवस\’ के रूप में मनाया जाता है. इसकी पूर्व बेला पर चमोली के जिलाधिकारी हिमांशु खुराना ने क्लेक्ट्रेट परिसर में अधिकारियों व कर्मचारियों को जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र, धर्म तथा भाषा का भेदभाव किए बिना सभी भारतवासियों की भावनात्मक एकता और सद्भावना को अक्षुण्ण रखने और हिंसा का सहारा लिए बिना सभी प्रकार के मतभेद बातचीत और संवैधानिक माध्यम से सुलझाने की शपथ दिलाई. जनपद के समस्त विभागों में भी अधिकारियों व कर्मचारियों ने \’सद्भावना दिवस\’ पर देश की एकता, अखंडता व आपसी सद्भावना को बरकार रखने की शपथ ली गई.

चमोली : हाट में मकानों को गिराने पहुंचा प्रशासन, ग्रामीणों ने की आत्मदाह की कोशिश

स्थानीय लोगों की पुलिस से झड़प भी हुई.

विष्णुगाड-पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना के पावर हाउस साइड पर परियोजना प्रभावित हाट गांव में आवासीय मकानों को ध्वस्त करने पहुंची.

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विष्णुगाड-पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना के पावर हाउस साइड पर परियोजना प्रभावित हाट गांव में आवासीय मकानों को ध्वस्त करने पहुंची प्रशासन की टीम को ग्रामीणों का आक्रोश झेलना पड़ा. अधिकारियों के सामने ही युवक मंगल दल के अध्यक्ष अमित गैरोला, ज्येष्ठ प्रमुख पंकज हटवाल, सागर, भावना देवी और प्रभा देवी ने अपने ऊपर डीजल छिड़ककर आग लगाने की कोशिश की. पुलिस की टीम और ग्रामीणों ने उनके हाथों से तेल छीन लिया और उन्हें मौके से हटा दिया गया, जिससे बड़ी दुर्घटना होने से बच गई. हाट गांव के ग्रामीणों ने विस्थापित क्षेत्र में सड़क और पानी की सुविधा देने, पैदल रास्ता निर्माण व अन्य मांगें उठाई हैं. ग्रामीणों के आक्रोश को देखते हुए राजस्व और पुलिस टीम मौके पर से बैरंग लौट गई.

बद्रीनाथ धाम की तीर्थयात्रा शुरू करने की मांग पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेन्द्र भंडारी के नेतृत्व में बद्रीनाथ धाम कूच करने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया, जिस वजह से काफी देर तक हंगामा हुआ. जानकारी के अनुसार, पूर्व मंत्री राजेन्द्र भंडारी का बद्रीनाथ में कार्यक्रम था लेकिन पुलिस ने कोविड नियमों का हवाला देते हुए बैरिकेडिंग लगाकर उन्हें पांडुकेश्वर में रोक दिया, जिसके बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच मामूली झड़प भी हुई. बता दें कि कोरोना संक्रमण को ध्यान में रखते हुए चारधाम यात्रा अभी शुरू नहीं की गई है. उत्तराखंड सरकार ने चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जिले के लोगों के लिए यात्रा शुरू करने की अनुमति दी थी लेकिन नैनीताल हाईकोर्ट ने चारधाम यात्रा पर रोक लगा दी और सुप्रीम कोर्ट का निर्देश आने तक के लिए इस रोक को बढ़ाया है. वहीं आज बद्रीनाथ धाम और  पांडुकेश्वर में कांग्रेस और स्थानीय लोगों ने बद्रीनाथ विधायक महेंद्र भट्ट का पुतला भी जलाया, जिस पर बद्रीनाथ विधायक ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की.

चमोली के सिमली गांव में पानी का संकट, बूंद-बूंद को तरसे ग्रामीण

गांव में कई दिनों से पानी नहीं आ रहा है.

चमोली जिले के सिमली गांव में एक माह से अधिक समय से पेयजल आपूर्ति बाधित है, जिसकी वजह से लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.

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चमोली जिले के सिमली गांव में एक माह से अधिक समय से पेयजल आपूर्ति बाधित है, जिसकी वजह से लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. लोगों का कहना है पेयजल लाइन काफी समय से क्षतिग्रस्त है लेकिन अब तक ठीक न होने के कारण लोगों को काफी दूर जाकर जलस्रोतों से पानी लाना पड़ रहा है. खासतौर पर बुजुर्ग कंधे पर पानी ढोकर लाने को मजबूर हैं. पानी की कमी के कारण गाय-भैंस पालने वाले ग्रामीणों को सुबह- शाम पानी की व्यवस्था करना मुश्किल हो जाता है. लोगों ने जल निगम से जलापूर्ति करने की मांग उठाई है. वहीं जल निगम के अवर अभियंता राजमोहन गुप्ता ने कहा कि बरसात के कारण लाइन क्षतिग्रस्त हो गई थी, जिसे जल्दी दुरुस्त कर पेयजल आपूर्ति सुचारू कर दी जाएगी.

वहीं श्री नंदा देवी लोकजात यात्रा 2021 के कार्यक्रम की घोषणा हो चुकी है. कार्यक्रम के अनुसार यात्रा 31 अगस्त से शुरू होगी, जबकि यात्रा का समापन 20 सितंबर को होगा. मंदिर समिति एवं आयोजन कमेटी कुरूड़, देवराड़ा के तय कार्यक्रम के अनुसार 31 अगस्त को देवी यात्रा कुरूड़ सिद्धपीठ से शुरू होगी और चरबंग, मथकोट, उस्तोली, थराली समेत प्रमुख पड़ावों के बाद यात्रा 20 सितंबर को यात्रा बैनोली से लोल्टी, तुंगेश्वर होते हुए सिद्धपीठ देवराड़ी पहुंचेगी, जहां पर पूरे विधि-विधान के साथ नंदादेवी के उत्सव डोली को मंदिर के गर्भगृह में विराजमान किया जाएगा और यही पर अगले 6 माह तक डोली की पूजा-अर्चना की जाएगी. बता दें, नंदा देवी लोकजात यात्रा हर साल निकाली जाती है, जबकि 12 साल में राजजात यात्रा होती है. यह यात्रा सबसे ऊंचे और निर्जन पड़ावों पर करीब 13000 फीट पर स्थित बेदनी बुग्याल भी पहुंचती है. इस यात्रा में करीब 240 किमी का सफर 20 दिनों में तय किया जाता है. इस यात्रा में 365 गांव जुड़े होते हैं और बीस दिन की यात्रा में बीस दिन का रात्रि विश्राम होता है. 20 दिवसीय 280 किमी की इस ऐतिहासिक यात्रा को गढ़वाल-कुमाऊं की सांस्कृतिक मिलन का प्रतीक भी माना जाता है.

चमोली की ट्राउट फिश की जबरदस्त डिमांड, जानिए क्यों खास है ये मछली?

कई बड़े शहरों में इस मछली को सप्लाई किया जा रहा है.

बैरांगना मत्स्य प्रजनन केंद्र में साल 1997 में ट्राउट मछली लाई गई थी.

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ट्राउट मछली जो कि औषधीय गुणों से भरपूर होती है और हृदयरोगियों के लिए फायदेमंद, आजकल चमोली के किसानों की आमदनी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. चमोली जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर स्थित बैरांगना मत्स्य प्रजनन केंद्र में कृत्रिम तरीके से ट्राउट मछ्ली का प्रजनन किया जा रहा है. यहां मछली का प्रजनन स्ट्रिपिंग पद्धति से किया जाता है, जिसमें मछली के पेट से अंडों को रिलीज किया जाता है और उसके बाद नर मछली के शुक्राणुओं को डालकर मत्स्य बीज तैयार किया जाता है.

वर्तमान समय में इस प्रजनन केंद्र से ही उत्तराखंड के अन्य पहाड़ी ठंडे इलाकों उत्तरकाशी, टिहरी, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर के किसानों को मछली के बच्चे दिए जा रहे हैं, ताकि इनका उत्पादन कर वह अपनी आर्थिकी सुधार सकें. ट्राउट मछली बाजार में 1000 रुपये से लेकर 1500 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है.

बाजार में इस मछली की काफी मांग है. बड़े-बड़े शहरों के फाइव स्टार होटलों में भी इसकी डिमांड बनी रहती है. चमोली से दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर तक ट्राउट मछलियों को किसानों से सीधे खरीदकर बड़ी-बड़ी फर्म द्वारा भेजा जा रहा है.

बैरांगना मत्स्य प्रजनन केंद्र में साल 1997 में ट्राउट मछली लाई गई थी. यह मछली तब से लेकर अब तक कई किसानों की जिंदगी संवार चुकी है और वर्तमान में इससे लगभग चमोली के 150 किसान जुड़े हुए हैं, जो इसके व्यापार से अच्छी कमाई कर रहे हैं.

ट्राउट मछली के औषधीय गुणों की बात की जाए तो यह हृदय रोगियों के लिए बेहद फायदेमंद होती है, क्योंकि इसमें ओमेगा-6 पाया जाता है जबकि अन्य मछलियों में ओमेगा-3 पाया जाता है.

गौरतलब है कि अंग्रेज ट्राउट मछली को फिशिंग के लिए भारत में लाए थे लेकिन बाद में इसके औषधीय गुणों का पता चलने के बाद लोगों ने इसे खाना शुरू किया. माना जाता है कि करीब 122 साल पहले नार्वे के नेल्सन ने इसके अंडे डोडीताल में डाले थे और वहीं से अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में इसको भेजा गया.

भगवान शिव ने कामदेव को मारने के लिए फेंका था त्रिशूल, इस मंदिर में आज भी मौजूद है अस्त्र

गोपीनाथ मंदिर का संबंध भगवान शिव से है.

उत्तराखंड के चमोली जिले के गोपेश्वर नगर में भगवान शिव का पौराणिक गोपीनाथ मंदिर स्थित है.

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उत्तराखंड के चमोली जिले के गोपेश्वर नगर में भगवान शिव का पौराणिक गोपीनाथ मंदिर स्थित है. गोपीनाथ मंदिर का संबंध भोलेनाथ से है. यह मंदिर केदारनाथ धाम के समकक्ष प्राचीन बताया जाता है. मंदिर के वास्तु कला की अगर बात करें तो इसके शीर्ष पर गुम्बद नुमा आकृति है. इस मंदिर का गर्भगृह 30 वर्ग फुट है, जिसमें 24 द्वारों से प्रवेश किया जाता है. पंचकेदारों में मौजूद चतुर्थ केदार रुद्रनाथ के कपाट बंद होने पर चतुर्थ केदार भगवान रुद्रनाथ की चल विग्रह डोली को गोपीनाथ मंदिर लाया जाता है.

इसी मंदिर में शीतकाल में भगवान गोपीनाथ के साथ बाबा रुद्रनाथ की भी पूजा अर्चना की जाती है. बताया जाता है कि जब भगवान शिव ने कामदेव को मारने के लिए अपना त्रिशूल फेंका तो वह यहां गढ़ गया था. त्रिशूल की धातु अभी भी सही स्थिति में है, जिस पर मौसम प्रभावहीन है और यह एक आश्वर्य है. यह माना जाता है कि शारीरिक बल से इस त्रिशूल को हिलाया भी नहीं जा सकता, जबकि यदि कोई सच्चा भक्त इसे छू भी ले तो इसमें कम्पन होने लगता है.

'फूलों की घाटी' में खिले हैं जहरीले फूल, छुआ तो जा सकती है जान

'फूलों की घाटी' चमोली में स्थित है.

वन विभाग ने घाटी में एकोनिटम बालफोरी और सेनेसियो ग्रैसिलिफ्लोरस नाम के फूल चिह्नित किए हैं, जो काफी जहरीले होते हैं.

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चमोली जिले में स्थित 87.5 वर्ग किलोमीटर में फैली विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है. यह वही घाटी है, जिसे आज से लगभग साढे़ तीन दशक पूर्व राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया था लेकिन अब यहां कई जहरीले फूल हैं, जो घाटी के लिए खतरनाक हैं और  पर्यटकों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकते हैं. वन विभाग ने घाटी में एकोनिटम बालफोरी और सेनेसियो ग्रैसिलिफ्लोरस नाम के फूल चिह्नित किए हैं, जो काफी जहरीले होते हैं.

नंदा देवी लोकजात यात्रा शुरू, 365 गांवों से गुजरेगी मां की डोली

लोकजात यात्रा अगले 20 दिनों तक चलेगी.

चमोली जिले के सिद्धपीठ कुरुड़ से मां नंदा देवी की लोकजात यात्रा शुरू हो चुकी है.

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चमोली जिले के सिद्धपीठ कुरुड़ से मां नंदा देवी की लोकजात यात्रा शुरू हो चुकी है. यात्रा की शुरुआत में मां नंदा की दोनों डोलियों को मंदिर से बाहर लाकर पूजा-अर्चना की गई. श्रद्धालुओं ने मां के जयकारे लगाए और डोलियों को मंदिर से रवाना करते वक्त मां को विदाई दी. कुरुड़ मंदिर से बधाण की मां नंदा डोली चरबंग व दशोली की मां नंदा डोली फरखेत गांव पहुंची. इस दौरान जगह-जगह गांवों में डोली की पूजा अर्चना व स्वागत किया गया.

सिद्धपीठ कुरुड़ में सुबह देवी की डोलियों की पूजा-अर्चना के बाद जब डोलियों को मंदिर के बाहर लाया गया तो देवी का भूम्याल समेत अन्य देवी देवताओं से मिलन हुआ. बता दें कि नंदा देवी लोकजात यात्रा अगले 20 दिनों तक जारी रहेगी और इसमें देवी मां की डोली 365 गांवों से गुजरेगी, जिसमें कि करीब 280 किलोमीटर की यात्रा तय की जाएगी.

यह यात्रा सबसे ऊंचे और निर्जन पड़ावों पर करीब 13,000 फीट पर स्थित बेदनी बुग्याल भी पहुंचेगी. वहीं इन 20 दिनों की यात्रा के दौरान श्रद्धालु अलग-अलग पड़ावों पर रात्रि विश्राम करेंगे.

गौरतलब है कि लोक इतिहास के अनुसार मां नंदा गढ़वाल के राजाओं के साथ-साथ कुमाऊं के कत्यूरी राजवंश की ईष्ट देवी भी हैं. ईष्ट देवी होने के कारण नंदा देवी को राजराजेश्वरी कहकर सम्बोधित किया जाता है. बताया जाता है कि लोकजात यात्रा में वेदनी पूजा-अर्चना के बाद देवी मां की डोली 6 मास देवराड़ा में ही विराजमान होती है.

मां नंदा देवी के बधाण आगमन पर श्रद्धालुओं द्वारा हर्षोउल्लास के साथ स्वागत किया जाता है. नए अनाज का देवी को भोग लगाया जाता है. सिद्धपीठ देवराड़ा में विराजमान होने के बाद अगले 6 माह तक ननिहाली भक्त मंदिर में मां नंदा की पूजा-अर्चना करते हैं और 6 माह बाद नंदा देवी की डोली को मायके यानी कुरुड़ के लिए रवाना किया जाता है.

चमोली : जानवरों में तेजी से फैल रहा खुरपका, अब तक कई पशुओं की मौत

खुरपका एक संक्रामक बीमारी है.

चमोली जिले के गौचर में खुरपका नामक संक्रामक बीमारी की वजह से पशुओं की मौत हो रही है. 

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चमोली जिले के गौचर में खुरपका नामक संक्रामक बीमारी की वजह से पशुओं की मौत हो रही है. गौचर के श्री कृष्णा गौ सदन की गायों में तो यह रोग बीते एक सफ्ताह से काफी तेजी से फैल रहा है. यहां लगभग 100 से अधिक जानवरों को रखा गया है, जिसमें से इस बीमारी के कारण हर रोज किसी न किसी पशु की मौत हो रही है. पशुओं के शवों को सदन में ही जेसीबी द्वारा गड्ढा खोदकर दफनाया जा रहा है.

चमोली में मिठाई की दुकान में लगी आग, एक के बाद एक फटे 9 सिलेंडर

आग ने कई और दुकानों को भी अपनी चपेट में ले लिया.

आग की चपेट में 11 अन्य दुकानें भी आ गईं. दुकानों में आग लगने से चमोली बाजार में अफरा-तफरी का माहौल बन गया.

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बद्रीनाथ हाइवे पर चमोली मुख्य बाजार में मिठाई की दुकान में अचानक आग लग गई. आग की चपेट में 11 अन्य दुकानें भी आ गईं. दुकानों में आग लगने से चमोली बाजार में अफरा-तफरी का माहौल बन गया. वहीं मिठाई की दुकान में रखे करीब 9 सिलेंडरों में एक के बाद एक विस्फोट होने से आग और विकराल हो गई, जिसके कारण दुकान में रखा लाखों का सामान जलकर खाक हो गया.

कोरोना महामारी की वजह से पिछले दो साल से चारधाम यात्रा बंद पड़ी हुई है, जिससे स्थानीय कारोबारियों और होटल व्यवसाय से जुड़े लोगों के सामने परिवार पालने की समस्या खड़ी हो चुकी है. यात्रा बंद होने से लोगों के सामने अब भुखमरी तक की नौबत आ गई है. ऐसे में केदारघाटी की जनता में सरकार के खिलाफ आक्रोश बना हुआ है.

चमोली : भूस्खलन से सड़क पर आया मलबा, मुश्किल में स्यूण गांव के लोग

सड़क पर मलबा आने से रास्ता बंद हो गया है.

चमोली जिले के दशोली विकासखंड के स्यूण गांव को जोड़ने वाला मोटर मार्ग 20 अगस्त की रात भारी बारिश से बाछूरी तोक में क्षतिग्रस्त हो गया.

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चमोली जिले के दशोली विकासखंड के स्यूण गांव को जोड़ने वाला मोटर मार्ग 20 अगस्त की रात भारी बारिश से बाछूरी तोक में क्षतिग्रस्त हो गया था. तब से अभी तक यह मार्ग सुचारू नहीं हो पाया है. ग्रामीणों का कहना है कि मोटर मार्ग बाछूरी तोक पर भारी भूस्खलन होने से पैदल आवाजाही करना भी मुश्किल हो गया है, जिससे ग्रामीणों को करीब दो किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय कर अपने गंतव्य को जाना पड़ रहा है. स्यूण गांव में 50 परिवार रहते हैं. वहीं गांव के स्कूली बच्चे भी पढ़ाई करने के लिए बैमरू स्थित स्कूल जाने लिए 3 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय कर रहे हैं.

उत्तराखंड के पर्यटन नक्शे पर 'खगोल गांव' के रूप में उभरेगा बेनीताल

बेनीताल को एस्ट्रो विलेज बनाया जाएगा.

पहाड़ों के प्रदेश में सुंदर और मनोरम प्राकृतिक दृश्यों के बीच बसे इस छोटे से कस्बे में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं. पर्यटन विभाग इस विश्वास के साथ एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट तैयार कर रहा है ताकि पर्यटकों को लुभाया जा सके.

  • News18Hindi
  • LAST UPDATED : September 01, 2021, 08:56 IST
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चमोली. उत्तराखंड को पर्यटन के नक्शे पर और विकसित किए जाने की लगातार कोशिशों के तहत ज़िले के बेनीताल के बारे में विचार किया जा रहा है. कर्णप्रयाग ब्लॉक में स्थित इस इलाके को ‘खगोल गांव’ के रूप में विकसित किए जाने के संबंध में योजना बन रही है. आधिकारिक जानकारी के हवाले से कहा जा रहा है कि ज़िला मजिस्ट्रेट हिमांशु खुराना की अगुवाई वाली एक टीम ने हाल में बेनीताल का दौरा किया और यह समझने में दिलचस्पी दिखाई कि पर्यटकों के ​बीच इस इलाके के लिए आकर्षण पैदा करने के लिए किस तरह के कदम उठाए जा सकते हैं.

समुद्र तल से 2600 मीटर की ऊंचाई पर​ स्थित बेनीताल को ‘खगोल गांव’ के तौर पर विकसित किए जाने के प्रोजेक्ट को लेकर खुराना के हवाले से बताया गया कि पर्यटन विभाग यहां पयर्टकों के लिए कॉटेज, रेस्तरां, टेंट प्लेटफॉर्म, पार्किंग लॉट जैसी कई व्यवस्थाएं कर रहा है ताकि यहां आने वाले लोगों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराई जा सकें और इस स्थान पर पर्यटन की संभावनाएं बढ़ सकें.

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क्या है ‘खगोल गांव’ प्रोजेक्ट?
बेनीताल के आसमान में ग्रहों, तारों और खगोलीय घटनाओं को आप देख सकें, इस लिहाज़ से यहां विशालकाय दूरबीनों के साथ ही नाइट विज़न डोम की व्यवस्था की जाएगी, जिसे पर्यटकों के आकर्षण के उपयुक्त बनाया जाएगा. यहां पर्यटक पहुंच सकें और बेनीताल को पर्यटन के नक्शे पर लाया जा सके, इसके लिए खुराना ने विभाग से कहा कि सिमली से बेनीताल तक की सड़क को तुरंत ठीक करवाया जाए. साथ ही, सड़कों पर ​दिशा और लोकेशन समझाने वाले साइन बोर्ड लगवाए जाने के निर्देश भी दिए.

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बेनीताल में विशालकाय दूरबीनें और नाइट विज़न डोम बनाया जाएगा.

कितना बड़ा है ये प्रोजेक्ट?
यह प्रोजेक्ट कितना महत्वाकांक्षी है, इस बात का अंदाज़ा इससे लगता है कि डीएम के मुताबिक विभाग इस पर कुल 5 करोड़ रुपये खर्च करने जा रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक गढ़वाल मंडल विकास निगम को बेनीताल के एस्ट्रो विलेज विकास की ज़िम्मेदारी दी गई है. डीएम ने यह भी कहा कि इस कदम से बेनीताल में स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार के अवसर पैदा होंगे.

सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद उत्तराखंड में 7 हाइडेल प्रोजेक्टों को सरकार की हरी झंडी!

चमोली की बाढ़ में तबाह हो गया था हाइडेल प्रोजेक्ट.

केंद्र सरकार के मंत्रालयों ने जिन 7 प्रोजेक्टों की पैरवी की है, उनमें एक वह भी है, जो छह महीने पहले चमोली ज़िले की बाढ़ में तबाह हो गया था. जानिए पर्यावरण बनाम निर्माण की बहस एक बार फिर कैसे चर्चा में है.

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नई दिल्ली. उत्तराखंड में हाइडेल प्रोजेक्ट का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है. 5000 से ज़्यादा लोगों की जान लेने वाली 2013 में की बाढ़ के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड में हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्टों की स्वीकृति पर निषेध लगा दिया था. अब इसके बावजूद केंद्र सरकार के पर्यावरण, विद्युत और जलशक्ति मंत्रालयों ने मिलकर एक सह​मति बना ली है और उत्तराखंड में 7 हाइडेल प्रोजेक्टों के निर्माण को हरी झंडी दे दी है, जो गंगा नदी या उसकी सहायक नदियों पर बनने प्रस्तावित हैं. इन प्रोजेक्टों में से एक वह भी है, जो इस साल फरवरी की बाढ़ के कारण काफी हद तक चौपट हो गया था.

पर्यावरण मंत्रालय ने बीते 17 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में एक संयुक्त हलफनामा पेश करते हुए कोर्ट को मंत्रालयों की आपसी सहमति के बारे में बताया. ये इसलिए बड़ी खबर है क्योंकि अगर सुप्रीम कोर्ट से इस कदम को मंज़ूरी मिल जाती है, तो उत्तराखंड में अन्य कई हाइडेल प्रोजेक्टों के लिए रास्ता खुल जाएगा. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार पर्यावरण मंत्रालय ने इस मामले में जो नई विशेषज्ञ कमेटी बनाई, उसके मुताबिक भी ये 7 प्रोजेक्ट उन 26 प्रोजेक्टों का हिस्सा हैं, जिन्हें कुछ सुधारों व सुझावों के साथ लागू करने की सिफारिशें की जा सकी हैं.

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किन प्रोजेक्टों को दी केंद्र ने मंज़ूरी
जिन 7 हाइडेल प्रोजेक्टों को लेकर केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया, उनमें तपोवन विष्णुगाद में धौली गंगा पर बना एनटीपीसी का वह प्रोजेक्ट शामिल है, जो चमोली ज़िले में फरवरी में आई बाढ़ में बहुत हद तक नष्ट हो गया था. अन्य प्रोजेक्टों में टिहरी स्टेज-II, विष्णुगाद पीपलकोट, सिंगोली भटवारी, फाटा बुयोंग, मडमहेश्वर और कालीगंगा-II के हाइडेल प्रोजेक्ट शामिल हैं.

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न्यूज़18 क्रिएटिव

आखिर क्या है ​यह विवाद?
अगस्त 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने तमाम प्रोजेक्टों पर रोक लगाई थी, तबसे ही पर्यावरण मंत्रालय इस मामले में कई तरह के एक्सपर्ट पैनल या समितियां बनवाता रहा है. कई पैनलों की ज़रूरत इसलिए पड़ती रही क्योंकि पहले विशेषज्ञ पैनल ने यह कहा था कि 2013 की भीषण प्राकृतिक आपदा के लिए इस तरह के डैम ज़िम्मेदार थे. बाद के पैनल इस दावे से अलग स्टैंड अलग अलग ढंग से लेते रहे. ताज़ा पैनल का निष्कर्ष यह रहा कि डिज़ाइन में कुछ सुधार करके 26 हाइडेल प्रोजेक्टों को आगे बढ़ाया जा सकता है.

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कैसे आया यह ताज़ा निष्कर्ष?
लंबे समय के विवाद के बाद जनवरी 2019 में जलशक्ति मंत्रालय ने उन 7 प्रोजेक्टों पर सहमति दी थी, जिन पर पहले ही काफी निवेश किया जा चुका था. फरवरी में प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठक के बाद उत्तराखंड के गंगा बेसिन में नए हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्टों पर पूरी तरह बैन की बात कही गई. फिर मार्च 2020 में दास कमेटी ने फाइनल रिपोर्ट दी और अगस्त में उत्तराखंड को ‘हाइड्रो पावर विकास का रास्ता खुलता’ दिखा. फरवरी 2021 में चमोली की बाढ़ में दो प्रोजेक्ट बुरी तरह प्रभावित हुए और अब अगस्त में, सरकार ने 7 प्रोजेक्टों की हिमायत की.

उत्तराखंड में भूस्खलन से हाल बेहाल, रैणी में आफत तो चीन बॉर्डर से जुड़ता मलारी हाईवे 10 दिनों से ठप

रैणी में फंसे लोगों की मदद करती एसडीआरएफ.

चंपावत-टनकपुर के रास्ते में एक पहाड़ के दरक जाने से नेशनल हाईवे बंद होने और लोगों के भागकर जान बचाने की नौबत आई, तो वहीं सेना के लिहाज़ से अहम एक और हाईवे ठप पड़ा है. जानिए क्या हैं हालात.

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देहरादून. मानसून के मौसम में उत्तराखंड के पहाड़ों के हालात मुश्किल और खतरनाक हो जाते हैं. राज्य के पहाड़ी इलाकों में लगातार भूस्खलन और मलबा जमा होने के चलते रास्तों के बंद होने की खबरों के बीच बड़ी खबर यह है कि चमोली ज़िले में चीन बॉर्डर के साथ जुड़ने वाला महत्वपूर्ण मार्ग पिछले 10 दिनों से बंद पड़ा है. तमकानाला और जुम्मा में लगातार हो रहे भूस्खलन के चलते जोशीमठ और मलारी के बीच हाईवे पर यातायात बाधित है. रणनीतिक महत्व के इस मार्ग के ठप होने के बाद से ही बॉर्डर रोड संगठन भारी मशीनों से रास्ता खोलने की कवायद कर रहा है लेकिन काफी मुश्किलें पेश आ रही हैं.

चट्टानों के लगातार दरकने और बारिश के हालात के चलते लगातार इस हाईवे पर मलबा और चट्टानों के टुकड़े गिर रहे हैं इसलिए बीआरओ को राहत कार्य के दौरान खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. ज़िला आपदा प्रबंधन ​अधिकारी नंदकिशोर जोशी के हवाले से एक रिपोर्ट में बताया गया कि नीति वैली के स्थानीय लोगों के आवागमन के लिए अस्थायी तौर पर एक सड़क बना दी गई है और एसडीआरएफ व एनडीआएफ के कर्मचारी यहां मदद के लिए मौजूद हैं.

एसडीआरएफ की एक टीम ने चमोली ज़िले के रैणी गांव के पास सैकड़ों लोगों के लिए बचाव और राहत कार्य को अंजाम दिया. समाचार एजेंसी एएनआई ने बताया कि भूस्खलन के चलते सोमवार को तमस इलाके में फंसे 200 से ज़्यादा लोगों को एसडीआरएफ के टीमों ने निकाला. इस अभियान की तस्वीरें भी जारी की गईं.

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भूस्खलन के बाद रैणी में फंसे लोगों को रेस्क्यू करती SDRF टीम. चित्र : ANI

सेना को कैसे हो पा रही है सप्लाई?
चूंकि यह रास्ता सेना के लिहाज़ से काफी अहम है और इसके ठप होने के कारण बॉर्डर पर तैनात सेना को ज़रूरी सप्लाई के लिए चिनूक हेली​कॉप्टरों की मदद ली जा रही है. एक अधिकारी के मुताबिक नजदीकी जोशीमठ बेस से इस ऑपरेशन को अंजाम दिया जा रहा है. वहीं, मौसम विभाग की मानें तो चमोली राज्य का वह ज़िला है, जहां पिथौरागढ़ के बाद सबसे ज़्यादा बारिश पिछले 24 घंटों में हुई है. यही नहीं, राज्य के सात पहाड़ी ज़िलों में 24 अगस्त को भारी बारिश का यलो अलर्ट भी जारी किया गया है.

गौरतलब है कि मलारी हाईवे के अवरुद्ध होने के कारण नीति वैली के कम से कम एक दर्जन गांव प्रभावित हो गए हैं यानी 350 से ज़्यादा की आबादी संपर्क से कट चुकी है. हालांकि जोशी के मुताबिक कहा गया है कि इन गांवों में सप्लाई की कोई कमी नहीं है. वहीं, यह भी खबर दी गई है कि अगले 24 घंटों में यह रास्ता खुलने की उम्मीद है क्योंकि अब मलबा और पत्थरों का गिरना बंद होता दिख रहा है.

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