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'गैरसैंण के जज्बात' से कर्णप्रयाग जीतने की कोशिश में भाजपा

'गैरसैंण के जज्बात' से कर्णप्रयाग जीतने की कोशिश में भाजपा

गैरसैंण बजट सत्र 2018.

गैरसैंण बजट सत्र 2018.

कर्णप्रयाग विधानसभा सीट पर चुनाव से पहले भाजपा ने गैरसैंण को स्थाई राजधानी का मुद्दा एक बार फिर गरमा दिया है. भाजपा अध्यक्ष ने कहा है कि सरकार बनते ही गैरसैंण को राजधानी घोषित कर दिया जाएगा. इसके पहले मौजूदा कांग्रेस सरकार ने वहां ट्रांजिट एसेंबली बनाने का ऐतिहासिक निर्णय तो ले लिया, लेकिन राजधानी बनाने पर कदम पीछे खींच लिए.

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    कर्णप्रयाग विधानसभा सीट पर चुनाव से पहले भाजपा ने गैरसैंण को स्थाई राजधानी का मुद्दा एक बार फिर गरमा दिया है. भाजपा अध्यक्ष ने कहा है कि सरकार बनते ही गैरसैंण को राजधानी घोषित कर दिया जाएगा.

    इसके पहले मौजूदा कांग्रेस सरकार ने वहां ट्रांजिट एसेंबली बनाने का ऐतिहासिक निर्णय तो ले लिया, लेकिन राजधानी बनाने पर कदम पीछे खींच लिए. चूंकि गैरसैंण कर्णप्रयाग विधानसभा क्षेत्र में आता है तो सवाल उठना लाजमी है कि कहीं ये चुनावीं जंग जीतने का नुस्खा तो नहीं है.

    कहने की जरूरत नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस स्थायी राजधानी का मुद्दा सुलझाने की बजाय उसे लटकाने के रास्ते पर चली हैं, लेकिन अब अचानक बीजेपी अध्यक्ष अजय भट्ट ने तीर छोड़ दिया है कि भाजपा की सरकार बनते ही गैरसैंण को राजधानी घोषित कर देंगे. खास बात यह है कि 9 मार्च को कर्णप्रयाग में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है और गैरसैंण इसी सीट के अंदर आता है. इसलिए बीजेपी अध्यक्ष की मंशा पर सवाल उठने लाजमी हैं.

    वैसे राज्य गठन के वक्त पहले नित्यानंद स्वामी और भगत सिंह कोश्यारी के नेतृत्व में बीजेपी की अंतरिम सरकार बनी थी. जिसने स्थायी राजधानी का निर्णय लेने की बजाय उसके निर्धारण के लिए दीक्षित आयोग गठित कर दिया. उसके बाद नारायण दत्त तिवारी सरकार ने भी आयोग के कार्यकाल को बढाना बेहतर समझा.

    फिर भुवन चंद्र खंडूरी के कार्यकाल में आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी. जिसे खंडूरी सरकार ने विधानसभा में पेश कर दिया, लेकिन आगे निर्णय लेने की हिम्मत नहीं जुटाई. मौजूदा विधानसभा के लिए जारी विजन डाक्यूमेंट में स्थायी राजधानी को लेकर स्पष्ट राय नहीं है. फिर बीजेपी अध्यक्ष के सरकार बनते ही गैरसैंण को राजधानी घोषित करने का मतलब क्या है.

    बीजेपी प्रवक्ता सुरेश जोशी का कहना है कि प्रदेश अध्यक्ष ने सोच समझकर बयान दिया है. उत्तराखंड में बीजेपी सरकार बनने पर केंद्र की सहायता से राजधानी का मुद्दा हल हो जाएगा.

    खैर, भारतीय जनता पार्टी से इतर बात करते हैं कांग्रेस के स्टैंड की. जिसकी पहली निर्वाचित सरकार के मुखिया एनडी तिवारी ने पांच साल का कार्यकाल तो पूरा किया, लेकिन स्थायी राजधानी का हल ढूंढने में दिलचस्पी नहीं दिखाई. मौजूदा विधानसभा के कार्यकाल में पहले विजय बहुगुणा और फिर हरीश रावत मुख्यमंत्री बने.

    बहुगुणा कैबिनेट ने गैरसैंण में अस्थायी विधानभवन बनाने का ऐतिहासिक निर्णय तो लिया, लेकिन उसके स्टेटस पर कोई फैसला नहीं लिया. लेकिन हरीश रावत ने बागडोर संभालते ही गैरसैंण को लेकर एक नई इबारत लिख दी. रावत सरकार ने गैरसैंण में टैंट तंबुओं में विधानसभा सत्र चलाकर पहाड़ी जनमानस में नई उम्मीदें तो पैदा कर दी. उसके स्टेटस को लेकर बहुगुणा की तर्ज पर सस्पेंस बरकरार रखा.

    अलबत्ता सीएम ने गैरसैंण पर इतना जरूर कहा कि ना खाता और ना बही जो हरीश रावत कहें वहीं सही. कांग्रेस प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी गैरसैंण के स्टेटस या स्थायी राजधानी पर बोलने से बच रहे हैं, लेकिन बीजेपी अध्यक्ष के हालिया बयान को कर्णप्रयाग चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं.

    दरअसल 70 सदस्यीय विधानसभा की 11 सीटें मैदानी जिले, हरिद्वार और 9 सीटें उधमसिंहनगर में आती हैं. इसके अलावा नैनीताल और देहरादून जिले में आधा दर्जन से ज्यादा मैदानी सीटें हैं. यही वो वजह है कि कांग्रेस बीजेपी पहाड बनाम मैदान के गुणा भाग में निर्णय लेने से बचती रही हैं. चूंकि फिलहाल गैरसैंण के गर्भगृह यानि कर्णप्रयाग की एकमात्र सीट पर वोटिंग होनी है. इसलिए राजधानी बनाने के बयान से उसे कोई नुकसान नहीं है.

    Tags: Uttarakhand news

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