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जापानी तकनीक 'मियावाकी' बचाएगी उत्तराखंड के जंगल, 10 गुना तेजी से बढ़ते हैं पौधे

टंगसा

टंगसा नर्सरी में मियावाकी पद्धति से पौधे लगाए जा रहे हैं.

मियावाकी तकनीक को जापान के मशहूर बॉटनिस्ट डॉक्टर अकीरा मियावाकी ने विकसित किया था.

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    चमोली जिले के गोपेश्वर में स्थित टंगसा नर्सरी में जापानी मियावाकी तकनीक से पौधों को रोपित किया जा रहा है. यह नर्सरी स्थानीय मूल प्रजातियों के संरक्षण और जंगलों के जल्द विकास के लिए वर्ष 1979 में स्थापित की गई थी. पिछले साल जुलाई में मियावाकी पद्धति से टंगसा के जैव विविधता उद्यान में 44 वृक्ष और झाड़ी प्रजातियों को लगाया गया था.

    एक साल में ही नर्सरी में स्थित मियावाकी तकनीक से लगाए पौधों में काफी अच्छी वृद्धि देखने को मिली है. टंगसा में 0.25 हेक्टेयर में रीठा, तिमला, हिसोल, बांज, रिंगाल, भमौर, बुरांश, तिमूर समेत 44 प्रजातियों को रोपित किया गया है.

    उत्तराखंड वन अनुसंधान के मुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी की पहल और प्रयास से यहां मियावाकी तकनीक को अपनाया गया है और अभी फिलहाल ट्रायल के तौर पर इसका इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि आने वाले समय में उत्तराखंड के जंगलों में इसको इस्तेमाल में लाया जा सके.

    बताते चलें कि मियावाकी तकनीक को जापान के मशहूर बॉटनिस्ट डॉक्टर अकीरा मियावाकी ने विकसित किया था. इसमें स्थानीय प्रजातियों के पौधों को रोपा जाता है, जो वहां की जंगल की मिट्टी व वातावरण के अनुकूल हों.

    वन अनुसंधान के मुताबिक, इसमें ज्यादातर चने की दाल, गोबर, गुड़ व बेसन से तैयार जैविक खाद में पौधों को भिगोकर रोपा जाता है. आपस में जड़ों के चिपकने पर पोषक तत्व तेजी से मिलते हैं. सघन जंगल होने की वजह से खरपतरवार भी नहीं पनपती.

    माना जाता है कि जंगलों को पारंपरिक विधि से उगने में लगभग 200 से 300 वर्षों का समय लगता है, जबकि मियावाकी पद्धति से उन्हें केवल 20 से 30 वर्षों में ही उगाया जा सकता है. रिसर्च रेंज गोपेश्वर के रेंजर हरीश नेगी ने बताया कि मौजूदा समय में टंगसा नर्सरी में तीन भागों में मियावाकी तकनीक का उपयोग किया जा रहा है.

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