Chamoli news

चमोली

अपना जिला चुनें

उत्तराखंड आपदा : चमोली में रेस्क्यू के लिए दो दिन राहत, फिर बारिश और बर्फबारी का अलर्ट

उत्तराखंड जल त्रासदी के बाद लखीमपुर खीरी के 15 मजदूर भी लापता

उत्तराखंड जल त्रासदी के बाद लखीमपुर खीरी के 15 मजदूर भी लापता

मौसम विभाग ने भी सीडब्ल्यूसी को अगले दो दिनों तक बारिश नहीं होने की जानकारी दी है. बारिश नहीं होने से वहां चलाए जा रहे रेस्क्यू ऑपरेशन में परेशानी नहीं आएगी. जबकि 10 फरवरी से हल्की बारिश होने की भी बात कही गई है.

SHARE THIS:

चमोली. उत्तराखंड (uttrakhand) के चमोली (Chamoli) जिले में ग्लेशियर फटने (Glacier Burst) की घटना के बाद राज्य और केन्द्र सरकार प्राकृतिक आपदा के प्रभाव से निपटने में पूरी तरह से जुट गई हैं. नेशनल क्राइसिस मैनेजमेंट कमेटी (National Crisis Management Committee) ने आपदा पर एक बैठक की है. इसमें सेंट्रल वॉटर कमीशन ने नदी के जलस्तर घटने की जानकारी दी है. कुछ गांव में बाढ़ के खतरे की बात भी कही है. वहीं, मौसम विभाग ने भी सीडब्ल्यूसी को अगले दो दिनों तक बारिश नहीं होने की जानकारी दी है. बारिश नहीं होने से वहां चलाए जा रहे रेस्क्यू ऑपरेशन में परेशानी नहीं आएगी. जबकि 10 फरवरी से हल्की बारिश होने की भी बात कही गई है.

9-10 फरवरी को चमोली के कुछ हिस्सों में बारिश होगी

बताया गया है कि ग्लेशियर टूटने से मची तबाही के बाद चल रहे राहत और बचाव कार्य के लिए अगले दो दिन प्रभावित इलाकों में बारिश को लेकर कोई अड़चन नहीं होगी. मौसम विभाग के अनुसार यहां मौसम शुष्क रहेगा, जबकि चमोली जिले के उत्तरी हिस्से में 9 और 10 फरवरी को हल्की बारिश या बर्फबारी हो सकती है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की ओर से बताया गया है कि उत्तराखंड के चमोली, तपोवन और जोशीमठ में 7-8 फरवरी को प्रतिकूल मौसम की कोई आशंका नहीं है. ऐसे में ग्लेशियर टूटने से प्रभावित हुए क्षेत्रों में चल रहे बचाव कार्य के लिए यह काफी राहत की बात है.

खाली कराए गए तटवर्ती इलाके

ग्लेशियर फटने की आपदा के बाद उत्तराखंड सरकार ने अलर्ट घोषित किया है. नदियों के उफान को देखते हुए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ट्वीट कर कहा ‘यह घटना जोशीमठ से 26 किमी दूर रेनी गांव के पास हुई. धौलीगंगा नदी में बाढ़ आ गई और नदी किनारे के कई घर बह गए’. उन्होंने कहा ‘ऋषि गंगा और अलकनंदा पर बढ़ते जल के सुगम मार्ग की सुविधा के लिए टिहरी बांध से प्रवाह रोका गया. आपदा के कारण उच्चतर जल प्रवाह को प्रबंधित करने के लिए श्रीनगर बांध से सभी गांवों और तटवर्ती इलाकों को खाली करा दिया गया और श्रीनगर बांध से पानी का प्रवाह बढ़ा दिया गया है.’

पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

गंगोत्री धाम जा रही कार खाई में गिरने से एक की मौत, उधर बद्रीनाथ नेशनल हाईवे ठप, जानिए डिटेल्स

चमोली में भूस्खलन से बंद हुआ हाईवे. (Image:ANI)

चार धाम यात्रा (Char Dham Yatra 2021) के लिहाज़ से दो अहम खबरें आई हैं. एक तो चमोली ज़िले में भूस्खलन के चलते हाईवे बंद हो गया है. वहीं, उत्तरकाशी में एक सड़क रात के अंधेरे में तब हुआ जब यूपी के यात्री गंगोत्री की तरफ जा रहे थे.

  • News18Hindi
  • LAST UPDATED : September 24, 2021, 10:28 IST
SHARE THIS:

देहरादून. उत्तराखंड में चार धाम यात्रा जारी है, लेकिन इसी बीच मौसम के चलते एक प्राकृतिक व्यवधान पैदा होने की खबर आई है. चमोली में बद्रीनाथ जाने वाला नेशनल हाईवे भूस्खलन के चलते एक बड़े जोड़ के बीच ठप हो गया है. दूसरी ओर उत्तरकाशी से एक सड़क हादसे की खबर है, जिसमें एक कार के करीब 100 मीटर गहरी खाई में गिर जाने से एक की मौत हो गई जबकि तीन अन्य घायल बताए जा रहे हैं. ये दोनों ही ज़िले चार धाम यात्रा के लिहाज़ से बद्रीनाथ और गंगोत्री धाम यात्रा के लिए अहम हैं.

गंगोत्री धाम जा रहे थे यूपी के श्रद्धालु
उत्तरकाशी में हुए सड़क हादसे के बारे में एक खबर में बताया गया कि दुर्घटना दरबानी क्षेत्र के पास हुई. उत्तर प्रदेश के औरैया ज़िले के पर्यटक उस कार में सवार थे, जो खाई में जा गिरी. सूत्रों के हवाले से दी गई इस खबर में कहा गया है कि रात 9:30 बजे गंगोत्री धाम की तरफ जा रहे इन श्रद्धालुओं की कार के दुर्घटनाग्रस्त होने की सूचना पर पुलिस, एसडीआरएफ और स्वास्थ्य विभाग की टीमें पहुंचीं. राहत कार्य को रात में ही अंजाम दिया गया.

ये भी पढ़ें : Char Dham Yatra: यात्रियों की सीमित संख्या से विपक्ष व पुरोहित नाराज, इधर भीड़ के चलते ई-पास की समयसीमा तय

uttarakhand news, char dham yatra update, badrinath highway, char dham accident, char dham route, उत्तराखंड न्यूज़, चार धाम यात्रा, चार धाम यात्रा हादसा, बद्रीनाथ हाईवे

बद्रीनाथ हाईवे ठप होने के बारे में एएनआई ने ​ट्वीट किया.

हाईवे ठप होने से होगी मुश्किल
ज़िला आपदा प्रबंधन ​अधिकारी देवेंद्र पटवाल के हवाले से बताया गया कि हादसे में मारे गए व्यक्ति की शिनाख्त 32 वर्षीय हर्ष मिश्रा के रूप में हुई. वहीं, 29, 28 और 34 वर्षीय अंशुल, रमेश सिंह और विशाल कुशवाहा हादसे में घायल हुए. दूसरी तरफ, चमोली ज़िले में भूस्खलन का हादसा हुआ. समाचार एजेंसी एएनआई ने ट्वीट में बताया कि ज़िले के जोशीमठ और सैलंग के बीच बद्रीनाथ नेशनल हाईवे शुक्रवार सुबह ब्लॉक हो गया.

ये भी पढ़ें : Uttarakhand Politics : अब AAP निकालेगी ‘रोजगार गांरटी यात्रा’, ये है 25 से शुरू हो रही मुहिम का रोडमैप

गौरतलब है कि चार धाम यात्रा के लिए सबसे ज़्यादा भीड़ बद्रीनाथ धाम के लिए ही उमड़ रही है. न्यूज़18 आपको यह खबर भी दे चुका है कि देवस्थानम बोर्ड के द्वारा जो रजिस्ट्रेशन किए जा रहे हैं, तय संख्या के हिसाब से बद्रीनाथ के लिए 15 अक्टूबर तक के लिए श्रद्धालुओं की बुकिंग पूरी हो चुकी है. ऐसे में, इस हाईवे के ठप होने से श्रद्धालुओं को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. वहीं, प्रशासन यात्रियों से सतर्क रहते हुए यात्रा करने की हिदायतें भी जारी कर रहा है.

Char Dham Yatra : हाईकोर्ट ने चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी प्रशासन से कहा, हर हफ्ते दें रिपोर्ट

उत्तराखंड में चार धाम यात्रा जारी है.

Uttarakhand Pilgrimage : उत्तराखंड में बहुप्रतीक्षित चार धाम यात्रा शुरू हो गई लेकिन उच्च न्यायालय से इसे सशर्त मंज़ूरी मिली थी. जानिए कि कोर्ट के आदेश पर ज़िलों को किस तरह रिपोर्ट पेश करनी होगी और क्यों.

  • News18Hindi
  • LAST UPDATED : September 23, 2021, 20:41 IST
SHARE THIS:

चमोली/नैनीताल. उत्तराखंड में चार धाम यात्रा बीते शनिवार से तब शुरू हो सकी, जब उससे पहले हाई कोर्ट ने प्रतिबंध हटाते हुए हरी झंडी दी. केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम की यात्रा तीन ज़िलों चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी में जारी है, लेकिन इन तीनों ही ज़िलों के प्रशासनिक अफसरों को कोर्ट ने आदेश दिया है कि यात्रा के बारे में लगातार निगरानी की जाए. निगरानी किस तरह की जा रही है और क्या स्थितियां पेश आ रही हैं, इस बारे में हर सप्ताह रिपोर्ट पेश करने के आदेश ​भी दिए गए हैं. चमोली स्थित वैधानिक सेवाओं के प्राधिकरण के अधिकारियों ने बुधवार को यह जानकारी दी.

चमोली स्थित इस प्राधिकरण के सचिव सुधीर कुमार सिंह ने बताया कि चार धाम यात्रा पर पूरी तरह निगरानी रखने के बारे में हाई कोर्ट ने तीनों ज़िलों के अधिकारियों को आदेश दिया है. समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट की मानें तो सिंह ने यह भी पुष्टि की कि तीनों ही ज़िलों को हाई कोर्ट में वीकली रिपोर्ट देनी होगी. वास्तव में ये आदेश कोविड 19 की आशंकित तीसरी लहर के मद्देनज़र दिए गए हैं.

ये भी पढ़ें : इंसानियत की मिसाल बनीं सुषमा और सुल्ताना… एक-दूसरे के पति के लिए दान की किडनी

रिपोर्ट में क्या बताना होगा?
सिंह के मुताबिक, ‘चार धाम यात्रा के दौरान अधिकारियों को निर्देश हैं कि वो कोविड संबंधी गाइडलाइन्स का पालन प्रशासनिक स्तर के साथ ही, श्रद्धालुओं से भी करवाएं. साथ ही, श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए प्रशासन और उत्तराखंड सरकार द्वारा किए जाने वाले इंतज़ामों, फैसलों आदि के संबंध में भी इन्हें निगरानी रखनी है और इसकी पूरी रिपोर्ट पेश करनी है.’

ये भी पढ़ें : फूलन देवी की बहन ने शेर सिंह राणा की पार्टी जॉइन की, वजह नहीं बताई

गौरतलब है कि पिछले हफ्ते हाई कोर्ट ने चार धाम यात्रा को सशर्त मंज़ूरी देते हुए कुछ नियम व शर्तें तय कर दी थीं. यात्रा में बेतहाशा भीड़ न जुटे इसके लिए एक दिन में एक धाम पर अधिकतम श्रद्धालुओं की संख्या तय की गई थी. सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क के नियमों का पालन करवाए जाने के निर्देश दिए गए थे. साथ ही, उन्हीं श्रद्धालुओं को अनुमति देने के निर्देश जारी किए गए थे, जिनके पास कंपलीट वैक्सीनेशन का सर्टिफिकेट हो या फिर निगेटिव रिपोर्ट.

Watch Video : भालू को पकड़ने गई टीम को पड़े जान के लाले, खूंखार जानवर से बचने को मारी गोली

उत्तराखंड के चमोली में दहशत फैलाने वाले भालू को गोली मारी गई. (File Photo)

Uttarakhand Wildlife : जाल फेंककर भालू को काबू करने के लिए पहुंची फॉरेस्ट टीम पर ही भालू ने हमला बोल दिया. वन विभाग का दावा है कि जान बचाने के लिए टीम ने गोली मारी. जानिए कैसे महीने भर से जोशीमठ में भालू की दहशत रही.

  • News18Hindi
  • LAST UPDATED : September 23, 2021, 07:45 IST
SHARE THIS:

चमोली. जोशीमठ क्षेत्र में सिंहद्वार के पास एक भालू ने आतंक मचा रखा था. भालू ने हमले में कुछ लोगों और वनकर्मियों को घायल कर दिया था. देर रात लोगों की शिकायत के बाद वन विभाग की टीम भालू को पकड़ने के लिए जोशीमठ नगर क्षेत्र में गश्त के लिए निकली थी. इस दौरान टीम को सिंहद्वार क्षेत्र में भालू की मौजूदगी की सूचना मिली. इसके बाद भालू को पकड़ने की कोशिश की गई, तब भी भालू ने वन विभाग की टीम पर हमला बोला, जिसमें पांच लोग घायल हो गए. आखिरकार इस भालू का आतंक भालू के साथ ही खत्म हुआ.

जानकारी के मुताबिक घटना देर रात 12:30 बजे की है. वन विभाग का 15 सदस्यीय दल भालुओं के आतंक के चलते रात में गश्त पर था. इस दौरान टीम को लोगों से सूचना मिली थी कि सिंहद्वार मोहल्ले के पास एक भालू चहलकदमी कर रहा था. तब टीम ने मौके पर पहुंचकर भालू को बेहोश करने की कोशिश करते हुए जाल फेंककर उसे काबू में लेने की कोशिश की, लेकिन भालू ने टीम पर हमला कर दिया. तब भालू पर फायरिंग की गई और भालू वहीं ढेर हो गया.

ये भी पढ़ें : Uttarakhand Election 2022 का मैदान: PM मोदी, अमित शाह व राजनाथ सिंह संभालेंगे मोर्चा, जानिए पूरा शेड्यूल

एक महीने से था भालू का आतंक
बाद में वन विभाग ने एक बयान जारी करते हुए बताया कि वनकर्मियों ने अपनी जान की सुरक्षा के कारण भालू पर गोली चलाई, जिसमें उसकी मौत हो गई. गौरतलब है कि जोशीमठ में भालू के आतंक की खबरें करीब एक महीने से बनी हुई थीं. एक हफ्ता भी नहीं हुआ, जब गांधीनगर वार्ड की ज्योति देवी भालू के हमले में घायल हुई थी. बीते एक महीने में भालू के हमले से पांच लोगों के घायल होने की खबरें आईं.

चमोली : पर्यावरण के रखवाले और अनाथ मासूमों के मसीहा हैं 'पेड़ वाले गुरुजी'

धन सिंह घरिया को 'पेड़ वाले गुरुजी' कहा जाता है.

चमोली के धन सिंह घरिया यानी पेड़ वाले गुरुजी गौरा देवी और चंडी प्रसाद भट्ट को आदर्श मानते हैं.

SHARE THIS:

आज के समय में डॉक्टर, टीचर हों या अन्य सरकारी कर्मचारी, पहाड़ में नौकरी नहीं करना चाहते और शहरी इलाकों में ट्रांसफर की मांग करते हैं. इस दौर में चमोली में एक ऐसे शिक्षक भी हैं, जो काफी लंबे अरसे से जिले के दुर्गम इलाके गोदली में न सिर्फ बच्चों को पढ़ा रहे हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिए भी काम कर रहे हैं. हम बात कर रहे हैं पेड़ वाले गुरुजी के नाम से मशहूर धन सिंह घरिया की.

पॉलिटिकल साइंस के टीचर और मूलतः माणा बद्रीनाथ के रहने वाले धन सिंह घरिया साल 2006 से चमोली गढ़वाल के सीमांत हापला घाटी के जीआईसी गोदली में पढ़ा रहे हैं. पढ़ाने के साथ ही उन्होंने जीआईसी गोदली के प्रांगण के अलावा आसपास के गांवों में चारा पत्ती, इमारती, फलदार, औषधि, छायादार पेड़ लगाए हैं, जिसमें प्रमुख संतरा, अखरोट, बुरांश, रिंगाल, नींबू, किरमोड, भीमल, बांज, सुरई के पेड़ हैं. घरिया पिछले 15 वर्षों में एक लाख से ज्यादा पेड़ लगा चुके हैं.

गौरा देवी और चंडी प्रसाद भट्ट को अपना आदर्श मानने वाले धन सिंह घरिया न केवल वृक्षारोपण कर रहे हैं बल्कि गोदली क्षेत्र में जल संरक्षण और वनाग्नि को रोकने का भी काम कर रहे हैं. साथ ही उनकी योजना भविष्य में सिंगल यूज प्लास्टिक, खराब पेन व अन्य चीजों का इस्तेमाल कर पॉलीब्रिक्स बनाने की भी है.

धन सिंह घरिया साल 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद से हर वर्ष 6 से 8 आर्थिक तौर पर कमजोर और अनाथ बच्चों का खर्च भी वहन करते हैं. अब तक धन सिंह घरिया 50 से अधिक बच्चों को गोद ले चुके हैं.

कोरोना काल में छोड़ी नौकरी, घर लौटे और लकड़ियों के हैंडीक्राफ्ट ने बदल दी किस्मत

लड़कियों के हैंडीक्राफ्ट लोगों को काफी पसंद आ रहे हैं.

अनिल कुमार भारती ने बांस और रिंगाल की लकड़ियों के स्थानीय उत्पाद बनाकर स्वरोजगार की शानदार मिसाल पेश की है.

SHARE THIS:

चमोली जिले के नारायणबगड़ स्थित धाराबरम गांव के रहने वाले अनिल कुमार भारती ने बांस और रिंगाल की लकड़ियों के स्थानीय उत्पाद बनाकर स्वरोजगार की शानदार मिसाल पेश की है. अनिल इससे पहले दिल्ली में प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. कोरोना काल की शुरुआत में वह गांव लौटे और उन्होंने घर में ही स्वरोजगार शुरू कर दिया.

अनिल बांस और रिंगाल का उपयोग कर डस्टबिन, पेन स्टैंड, गुलदस्ते, शॉपिंग बास्केट, कंडी, हल, जुआ समेत लकड़ियों की विभिन्न कलाकृतियों के हैंडीक्राफ्ट बनाकर स्वरोजगार को बढ़ावा दे रहे हैं.

अनिल ने आसपास के युवाओं को भी रोजगार दिया है और इस समय वह क्षेत्र के युवाओं को लकड़ियों के हैंडीक्राफ्ट बनाने की ट्रेनिंग भी दे रहे हैं. अनिल ने बताया कि आने वाले समय में उनकी शोरूम खोलने की योजना है.

लकड़ियों से बने हैंडीक्राफ्ट दिल्ली, हरिद्वार, हल्द्वानी, लखनऊ और देहरादून तक भेजे जा रहे हैं. वहां यह देसी उत्पाद लोगों को काफी पसंद आ रहे हैं.

जापानी तकनीक 'मियावाकी' बचाएगी उत्तराखंड के जंगल, 10 गुना तेजी से बढ़ते हैं पौधे

टंगसा नर्सरी में मियावाकी पद्धति से पौधे लगाए जा रहे हैं.

मियावाकी तकनीक को जापान के मशहूर बॉटनिस्ट डॉक्टर अकीरा मियावाकी ने विकसित किया था.

SHARE THIS:

चमोली जिले के गोपेश्वर में स्थित टंगसा नर्सरी में जापानी मियावाकी तकनीक से पौधों को रोपित किया जा रहा है. यह नर्सरी स्थानीय मूल प्रजातियों के संरक्षण और जंगलों के जल्द विकास के लिए वर्ष 1979 में स्थापित की गई थी. पिछले साल जुलाई में मियावाकी पद्धति से टंगसा के जैव विविधता उद्यान में 44 वृक्ष और झाड़ी प्रजातियों को लगाया गया था.

एक साल में ही नर्सरी में स्थित मियावाकी तकनीक से लगाए पौधों में काफी अच्छी वृद्धि देखने को मिली है. टंगसा में 0.25 हेक्टेयर में रीठा, तिमला, हिसोल, बांज, रिंगाल, भमौर, बुरांश, तिमूर समेत 44 प्रजातियों को रोपित किया गया है.

उत्तराखंड वन अनुसंधान के मुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी की पहल और प्रयास से यहां मियावाकी तकनीक को अपनाया गया है और अभी फिलहाल ट्रायल के तौर पर इसका इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि आने वाले समय में उत्तराखंड के जंगलों में इसको इस्तेमाल में लाया जा सके.

बताते चलें कि मियावाकी तकनीक को जापान के मशहूर बॉटनिस्ट डॉक्टर अकीरा मियावाकी ने विकसित किया था. इसमें स्थानीय प्रजातियों के पौधों को रोपा जाता है, जो वहां की जंगल की मिट्टी व वातावरण के अनुकूल हों.

वन अनुसंधान के मुताबिक, इसमें ज्यादातर चने की दाल, गोबर, गुड़ व बेसन से तैयार जैविक खाद में पौधों को भिगोकर रोपा जाता है. आपस में जड़ों के चिपकने पर पोषक तत्व तेजी से मिलते हैं. सघन जंगल होने की वजह से खरपतरवार भी नहीं पनपती.

माना जाता है कि जंगलों को पारंपरिक विधि से उगने में लगभग 200 से 300 वर्षों का समय लगता है, जबकि मियावाकी पद्धति से उन्हें केवल 20 से 30 वर्षों में ही उगाया जा सकता है. रिसर्च रेंज गोपेश्वर के रेंजर हरीश नेगी ने बताया कि मौजूदा समय में टंगसा नर्सरी में तीन भागों में मियावाकी तकनीक का उपयोग किया जा रहा है.

जमीन धंसने से मकानों में पड़ीं दरारें, कई परिवारों को मजबूरन छोड़ना पड़ा आशियाना

मकानों में इस तरह की दरारें पड़ी हैं.

स्थानीय लोगों की मानें तो ऑलवेदर रोड की कटिंग के चलते हुए भू-धंसाव से उनके घरों में दरारें पड़ गई हैं.

SHARE THIS:

भारी बारिश और भू-धंसाव की वजह से चमोली जिले के कर्णप्रयाग नगरपालिका के वार्ड नंबर 4, आईटीआई बहुगुणा नगर के कई परिवार डर के साये में जीने को मजबूर हैं. यहां लगातार हो रहे भू-धंसाव से मकानों में दरारें पड़ गई हैं और बारिश का पानी इन दरारों में जमा होने से आए दिन मकानों में टूट-फूट हो रही है.

अभी तक कई परिवार अपने मकानों को छोड़कर किराये के मकानों में शिफ्ट हो गए हैं, वहीं कुछ लोग जो आर्थिक तौर पर कमजोर हैं, वे जर्जर हुए मकानों में ही रह रहे हैं, जिससे उनके लिए खतरा बना हुआ है.

स्थानीय लोगों की मानें तो ऑलवेदर रोड की कटिंग के चलते हुए भू-धंसाव से उनके घरों में दरारें पड़ गई हैं. दरारों में पानी भरने से खतरा और ज्यादा बढ़ गया है. अब तक कई परिवार अपना घर छोड़कर या तो किराये के मकानों में शिफ्ट हो चुके हैं या अपने रिश्तेदारों के यहां रह रहे हैं.

लोगों ने जल्द से जल्द प्रशासन से पुनर्वास व मुआवजे की मांग की है. तहसीलदार सुरेंद्र सिंह देव ने इस मामले में कहा कि जिन लोगों के मकानों में ज्यादा नुकसान हुआ है, उनके रहने की व्यवस्था सामुदायिक भवन, आईटीआई भवन समेत अन्य जगहों पर की गई है. साथ ही प्रभावित इलाके का मुआयना कर जिला प्रशासन को सूचना भेजी गई है.

3 युगों तक यहीं रहे थे भगवान विष्णु, कलयुग शुरू होते ही चले गए थे बद्रीनाथ धाम

आदिबद्री में भगवान नारायण का मुख्य मंदिर.

वर्तमान में यहां भगवान विष्णु के मुख्य मंदिर के अलावा 13 और मंदिर हैं.

SHARE THIS:

उत्तराखंड के पंच बद्री धामों में से एक आदिबद्री मंदिर चमोली जिले में स्थित एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है. यह मंदिर रानीखेत मार्ग पर कर्णप्रयाग से करीब 17 किलोमीटर दूर है. माना जाता है कि बद्रीनाथ से पहले यहीं पर भगवान विष्णु की पूजा की जाती थी. भगवान विष्णु प्रथम तीन युगों सतयुग, द्वापर युग और त्रेतायुग तक आदिबद्री मंदिर में ही रहे और कलयुग में वह बद्रीनाथ मंदिर चले गए.

वर्तमान में यहां भगवान विष्णु के मुख्य मंदिर के अलावा 13 और मंदिर हैं. भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के अनुसार, यहां पहले कुल 16 मंदिर हुआ करते थे लेकिन दो मंदिर नष्ट हो गए. माना जाता है कि इन मंदिरों का निर्माण स्वर्ग जाते समय पांडवों ने किया था.

कुछ मान्यताओं के अनुसार, आदि गुरू शंकराचार्य ने इन मंदिरों का निर्माण 8वीं सदी में किया था, जबकि भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग का मानना है कि आदिबद्री मंदिर समूह का निर्माण 8वीं से 11वीं सदी के बीच कत्यूरी वंश के राजाओं ने करवाया था.

अगर मंदिर की वास्तुकला की बात करें तो यहां मंदिर पिरामिड शंकु आकार के हैं, जो काफी हद तक गढ़वाल के अन्य मंदिरों से संरचना में अलग दिखाई देते हैं. मुख्य मंदिर काफी बड़ा है, जहां भगवान विष्णु की प्रतिमा काली शिला पर है और वह दर्शन मुद्रा में खड़े हैं.

यहां भगवान विष्णु की 3 फीट ऊंची मूर्ति की पूजा की जाती है. वहीं मुख्य मंदिर के ठीक सामने श्रीहरि के वाहन गरुड़ का मंदिर है. इसके अलावा यहां भगवान सत्यनारायण, लक्ष्मी नारायण, भगवान राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, मां गौरी, मां काली, मां अन्नपूर्णा, चक्रभान, भगवान भोलेनाथ और कुबेर के मंदिर भी स्थित हैं. हालांकि कुबेर के मंदिर में उनकी प्रतिमा नहीं है.

उत्तराखंड में 4 कमरों का 'इंटर कॉलेज', मान्यता तो दी लेकिन भवन निर्माण कराना भूल गए हुक्मरान

इंटर कॉलेज के छात्र बरामदे में बैठकर पढ़ रहे हैं.

बारिश आ जाए तो कॉलेज के छात्र बरामदे में पढ़ाई से भी मोहताज हो जाते हैं.

SHARE THIS:

उत्तराखंड के चमोली में प्रशासन की लापरवाही का बड़ा उदाहरण देखने को मिला है. गैरसैंण ब्लॉक और तहसील आदि बद्री स्थित सिलपाटा गांव का इंटर कॉलेज चार कमरों में चल रहा है. इस स्कूल को साल 2006 में हाईस्कूल और फिर 2014 में 12वीं कक्षा तक के लिए मान्यता मिल गई थी, लेकिन अभी तक यहां 9वीं से 12वीं कक्षा के लिए कोई भवन निर्माण नहीं हुआ है.

वहीं जूनियर स्कूल का भवन बीते जून से भूस्खलन की वजह से क्षतिग्रस्त है. कक्षा 6 से 12वीं तक का संचालन रमसा के अंतर्गत बने चार कमरों से हो रहा है. कभी-कभी क्लास के बरामदे में भी बच्चों को पढ़ाया जाता है.

बारिश आ जाए तो बच्चे बरामदे से भी मोहताज हो जाते हैं. इसी वजह से कई बार छात्रों की छुट्टी भी करनी पड़ती है. 7 साल से ज्यादा का समय और दो बार उच्चीकृत होने के बावजूद सरकार और प्रशासन ने जीआईसी सिलपाटा की कोई सुध नहीं ली, जबकि इस स्कूल में सिलपाटा गांव समेत आसपास के गांव पज्याना, मल्ला, लंगटाई, छिमटा, स्वामीकील के 183 बच्चे पढ़ते हैं.

बड़ा सवाल यह भी है कि कैसे मानकों को पूरा किए बिना सिलपाटा के इस जूनियर स्कूल को जीआईसी का दर्जा मिल गया. इसके साथ ही जो नए कमरे रमसा के अंतर्गत बने हैं और जहां वर्तमान में कक्षाएं संचालित की जाती हैं, उसका भवन भी लैंडस्लाइड जोन में है, जिस वजह से यहां पढ़ने वाले स्टूडेंट्स के लिए खतरा भी बना हुआ है.

जब न्यूज 18 लोकल की टीम ने गैरसैंण के खंड शिक्षा अधिकारी एमएस बिष्ट से जीआईसी सिलपाटा के बारे में जानकारी ली तो उन्होंने फोन पर बताया कि यह स्कूल स्लाइडिंग जोन में है और इसकी रिपोर्ट शासन को आगे भेज दी है. इस स्कूल के भवन निर्माण के लिए सुरक्षित जगह को देखा जा रहा है. जल्द ही कक्षाओं के लिए भवन का निर्माण किया जाएगा.

चमोली में 'कुटकी' की खेती कर रहे किसान, नीदरलैंड-अमेरिका में भी इस औषधीय पौधे की मांग

घेस गांव में कुटकी की खेती करते हुए किसान.

चमोली जिले के घेस गांव में किसान औषधीय गुणों से युक्त कुटकी पौधे की खेती कर रहे हैं.

SHARE THIS:

चमोली जिले के देवाल ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले घेस गांव के किसान पिछले 20 वर्षों से औषधीय गुणों से युक्त पौधे कुटकी की खेती कर अच्छी-खासी आमदनी कर रहे हैं. कुटकी का पौधा बुखार, टॉयफॉयड, टीबी, बवासीर, बदन दर्द, डायबिटीज, सूखी खांसी, शरीर में जलन, पेट के कीड़े, मोटापा, जुकाम आदि रोगों के उपचार में फायदेमंद है.

दवाई बनाने में प्रयोग होने वाली कुटकी की डिमांड देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक से आ रही है. घेस गांव से कुटकी नीदरलैंड तक भेजी जा रही है और अब अमेरिका से भी इसकी मांग आने लगी है.

बता दें कि सेना से रिटायर होने के बाद कैप्टन केशर सिंह बिष्ट ने घेस गांव में कुटकी की खेती शुरू की थी. जिसके बाद 2001 से गांव के किसानों ने भी इसकी खेती करनी शुरू कर दी. वहीं किसान अब कुटकी के अलावा अतीश, जटामासी सहित कई प्रकार की जड़ी-बूटी की खेती भी कर रहे हैं.

करीब 700 नाली से ज्यादा जमीन में घेस और हिमनी गांव के किसान जड़ी-बूटी उगा रहे हैं. घेस के पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य कलम सिंह पटाकी ने बताया कि वैसे तो पिछले 20 साल से गांव में कुटकी की खेती की जा रही है, लेकिन कोरोना काल में लौटे प्रवासियों समेत सभी गांव के लोगों ने इसकी खेती करना शुरू कर दिया है, जिसका उनको काफी फायदा मिला है. वर्तमान में कुटकी लगभग 1500 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है.

इस मंदिर में आंख पर पट्टी बांधकर होते है भगवान के दर्शन

लाटू देवता का मंदिर वाण गांव में स्थित है.

लाटू देवता मंदिर के पुजारी को भी पूजा के विशेष नियमों को मानते हुए नाक, कान और आंखों पर पट्टी बांधकर अंदर जाना होता है.

SHARE THIS:

क्या आप जानते हैं, उत्तराखंड के चमोली जिले में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां श्रद्धालु आस्था के साथ जाते तो जरूर हैं लेकिन भगवान के दर्शन नहीं कर सकते. चमोली के देवाल ब्लॉक के वाण गांव में 8500 फीट की ऊंचाई पर लाटू देवता का मंदिर एक ऐसा रहस्यमयी मंदिर है, जहां न महिलाओं को और न ही पुरुषों को मंदिर के अंदर जाने की इजाजत है. यहां तक कि मंदिर के पुजारी भी भगवान के दर्शन नहीं कर सकते.

लाटू देवता मंदिर के पुजारी को भी पूजा के विशेष नियमों को मानते हुए नाक, कान और आंखों पर पट्टी बांधकर अंदर जाना होता है.

स्थानीय लोगों का मानना है कि इस मंदिर में नागराज अपनी मणि के साथ रहते हैं. मणि की तेज रोशनी से इंसान अंधा भी हो सकता है. यही नहीं, पुजारी के मुंह की गंध तक देवता तक नहीं पहुंचनी चाहिए और नागराज की विषैली गंध पुजारी की नाक तक पहुंचनी चाहिए. वहीं इस मंदिर में श्रद्धालु 75 फीट की दूरी से पूजा-अर्चना करते हैं.

पौराणिक कथाओं के अनुसार, लाटू देवता उत्तराखंड की आराध्या देवी मां नंद के धर्म भाई हैं. जब देवी पार्वती के साथ भगवान शिव का विवाह हुआ तो पार्वती जिन्हें नंदा देवी नाम से भी जाना जाता है, को विदा करने के लिए सभी भाई कैलाश की ओर चल पड़े. इसमें चचेरे भाई लाटू भी शामिल थे.

रास्ते में लाटू देवता को इतनी प्यास लगी कि वह पानी के लिए इधर-उधर भटकने लगे. उन्हें एक कुटिया दिखी तो वह वहां पानी पीने चले गए. कुटिया में एक साथ दो मटके रखे थे, एक में पानी था और दूसरे में मदिरा. लाटू देवता ने गलती से मदिरा पी ली और उत्पात मचाने लगे. इससे देवी पार्वती को गुस्सा आ गया और उन्होंने लाटू देवता को श्राप दे दिया. बता दें कि इस मंदिर के द्वार साल में एक बार वैशाख महीने की पूर्णिमा पर खुलते हैं.

चमोली : बादल फटने से घरों में घुसा मलबा, लोगों ने भागकर बचाई जान

स्थानीय लोग खुद मलबा निकालने के लिए जुटे.

भारी बारिश ने पहाड़ों पर आफत मचाई हुई है. जगह-जगह भूस्खलन की घटनाएं सामने आ रही हैं.

SHARE THIS:

भारी बारिश ने पहाड़ों पर आफत मचाई हुई है. जगह-जगह लोग भूस्खलन के चलते डर के साये में जीने को मजबूर हैं. चमोली जिले के नारायणबगड़ में बादल फटने से स्थानीय लोगों का जन-जीवन बुरी तरह प्रभावित हो गया. रिहायशी इलाकों में मलबा आ गया. लोगों ने भागकर अपनी जान बचाई.

बारिश की वजह से भूस्खलन के बाद मलबा बहता हुआ रिहायशी इलाके में आ गया. एक मकान और गौशाला मलबे की जद में आ गई. डौंडियाल परिवार और उनके किराएदारों का भी लाखों का सामान मलबे की चपेट में आ गया.

प्रशासन ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा तो लिया, लेकिन मलबे को हटाने का कोई इंतजाम नहीं किया. जिसके बाद स्थानीय लोग खुद मलबे को हटाने में जुट गए.

पीड़ित शिवानी ढौंडियाल ने प्रशासन से पुनर्वास और क्षतिग्रस्त मकान के मुआवजे की मांग की है. तहसीलदार थराली रवि साह ने इस बारे में कहा कि नियमों के तहत पीड़ित परिवार को पांच महीने तक 3800 रुपये का मुआवजा दिया जाएगा.

शिक्षक दिवस : जज्बे को सलाम! 20 साल की शिवानी ने बच्चों के लिए शुरू की 'मेरा घर, मेरी पाठशाला'

बच्चों को पढ़ाते हुए शिवानी बिष्ट.

गोपेश्वर के कटूड़ की रहने वालीं 20 वर्षीय शिवानी बिष्ट की पहल ने बच्चों की पढ़ाई में संजीवनी का काम किया.

SHARE THIS:

कोरोना काल में हर क्षेत्र को मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. वहीं शिक्षा के क्षेत्र पर कुछ ज्यादा ही असर पड़ा है. खासकर छोटे बच्चों की शिक्षा पर, जो ऑनलाइन माध्यम से भी ठीक तरह से पढ़ाई नहीं कर पाते, लेकिन शिक्षक दिवस के अवसर पर हम आपको गोपेश्वर के कटूड़ की एक ऐसी 20 वर्षीय लड़की से रूबरू करवाते हैं, जिसकी पहल ने बच्चों की पढ़ाई में संजीवनी का काम किया.

गोपेश्वर पीजी कॉलेज की एमएससी की छात्रा शिवानी बिष्ट ने जब स्कूल बंद होने के कारण अपने गांव के स्कूली बच्चों की पढ़ाई में कोरोना को बाधा बनते देखा, तो शिवानी ने खुद बीड़ा उठाते हुए बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और वह भी निशुल्क.

इस नेक काम में गांव के ही समाजसेवी सुनील नाथन बिष्ट ने उनका साथ दिया. दोनों ने मिलकर गांव में ही \’मेरा घर, मेरी पाठशाला\’ खोली और गांव सहित आसपास के बच्चों की शिक्षा में योगदान दिया.

हालांकि अब उत्तराखंड में स्कूल खुलने लगे हैं लेकिन फिर भी शिवानी बिष्ट बच्चों को गांव के पंचायती भवन में शाम को पढ़ा रही हैं और पहले जहां वह कोरोना में निशुल्क पढ़ा रही थीं, अब उन्हें ग्रामीण अपनी ओर से प्रोत्साहन राशि देकर भी सहयोग कर रहे हैं.

देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की मांग पर अड़े केदारनाथ के तीर्थ पुरोहित, अनशन जारी

केदारनाथ के तीर्थ पुरोहितों का अनशन जारी है.

तीर्थ पुरोहितों ने अनशन के दौरान जमकर नारेबाजी की. पुरोहितों ने कहा कि सरकार इतना लंबा समय गुजर जाने के बाद भी कोई पहल नहीं कर रही है.

SHARE THIS:

देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की मांग को लेकर तीर्थ पुरोहितों का आंदोलन चारों धामों सहित मुख्य मंदिरों में बढ़ता जा रहा है. पिछले दो महीने से केदारनाथ धाम में तीर्थ पुरोहित देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की मांग को लेकर परिजनों समेत आंदोलन में कूद गए हैं. वहीं गुरुवार को भी केदारनाथ धाम में देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की मांग को लेकर तीर्थ पुरोहितों का क्रमिक अनशन जारी रहा.

तीर्थ पुरोहितों ने अनशन के दौरान जमकर नारेबाजी की. पुरोहितों ने कहा कि सरकार इतना लंबा समय गुजर जाने के बाद भी कोई पहल नहीं कर रही है. तीर्थ पुरोहित लगातार अपना विरोध सरकार के सामने व्यक्त कर रहे हैं लेकिन उनकी मांग पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं हो सकी है.

उन्होंने कहा कि जब तक देवस्थानम बोर्ड भंग नहीं किया जाता आंदोलन चारों धामों में जारी रहेगा. बता दें कि दो साल पहले तत्कालीन सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व में देवस्थानम बोर्ड का गठन किया गया था. बोर्ड में उत्तराखंड के चार धाम बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री ओर यमुनोत्री सहित कुल 51 मंदिर शामिल किए गए थे. केदारनाथ में बोर्ड का गठन होने से पहले केदारनाथ मंदिर का संचालन बद्री केदार मंदिर समिति करती थी. केदारनाथ की सभी व्यवस्थाएं मंदिर समिति देखती थी लेकिन बोर्ड का गठन होने के बाद केदारनाथ धाम की सभी व्यवस्थाएं सरकार और प्रशासन के अधीन आ गई, जिससे तीर्थ पुरोहित और हक हकूकधारी नाराज हैं.

वहीं देवस्थानम बोर्ड को लेकर राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हाई पॉवर कमेटी के गठन की घोषणा कर चुके हैं. इस घोषणा को 15 दिन से अधिक का समय हो चुका है, बावजूद इसके अभी तक हाईपॉवर कमेटी गठन का विधिवत आदेश जारी नहीं हुआ है.

देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की जयंती यानी 20 अगस्त को \’सद्भावना दिवस\’ के रूप में मनाया जाता है. इसकी पूर्व बेला पर चमोली के जिलाधिकारी हिमांशु खुराना ने क्लेक्ट्रेट परिसर में अधिकारियों व कर्मचारियों को जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र, धर्म तथा भाषा का भेदभाव किए बिना सभी भारतवासियों की भावनात्मक एकता और सद्भावना को अक्षुण्ण रखने और हिंसा का सहारा लिए बिना सभी प्रकार के मतभेद बातचीत और संवैधानिक माध्यम से सुलझाने की शपथ दिलाई. जनपद के समस्त विभागों में भी अधिकारियों व कर्मचारियों ने \’सद्भावना दिवस\’ पर देश की एकता, अखंडता व आपसी सद्भावना को बरकार रखने की शपथ ली गई.

चमोली : हाट में मकानों को गिराने पहुंचा प्रशासन, ग्रामीणों ने की आत्मदाह की कोशिश

स्थानीय लोगों की पुलिस से झड़प भी हुई.

विष्णुगाड-पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना के पावर हाउस साइड पर परियोजना प्रभावित हाट गांव में आवासीय मकानों को ध्वस्त करने पहुंची.

SHARE THIS:

विष्णुगाड-पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना के पावर हाउस साइड पर परियोजना प्रभावित हाट गांव में आवासीय मकानों को ध्वस्त करने पहुंची प्रशासन की टीम को ग्रामीणों का आक्रोश झेलना पड़ा. अधिकारियों के सामने ही युवक मंगल दल के अध्यक्ष अमित गैरोला, ज्येष्ठ प्रमुख पंकज हटवाल, सागर, भावना देवी और प्रभा देवी ने अपने ऊपर डीजल छिड़ककर आग लगाने की कोशिश की. पुलिस की टीम और ग्रामीणों ने उनके हाथों से तेल छीन लिया और उन्हें मौके से हटा दिया गया, जिससे बड़ी दुर्घटना होने से बच गई. हाट गांव के ग्रामीणों ने विस्थापित क्षेत्र में सड़क और पानी की सुविधा देने, पैदल रास्ता निर्माण व अन्य मांगें उठाई हैं. ग्रामीणों के आक्रोश को देखते हुए राजस्व और पुलिस टीम मौके पर से बैरंग लौट गई.

बद्रीनाथ धाम की तीर्थयात्रा शुरू करने की मांग पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेन्द्र भंडारी के नेतृत्व में बद्रीनाथ धाम कूच करने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया, जिस वजह से काफी देर तक हंगामा हुआ. जानकारी के अनुसार, पूर्व मंत्री राजेन्द्र भंडारी का बद्रीनाथ में कार्यक्रम था लेकिन पुलिस ने कोविड नियमों का हवाला देते हुए बैरिकेडिंग लगाकर उन्हें पांडुकेश्वर में रोक दिया, जिसके बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच मामूली झड़प भी हुई. बता दें कि कोरोना संक्रमण को ध्यान में रखते हुए चारधाम यात्रा अभी शुरू नहीं की गई है. उत्तराखंड सरकार ने चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जिले के लोगों के लिए यात्रा शुरू करने की अनुमति दी थी लेकिन नैनीताल हाईकोर्ट ने चारधाम यात्रा पर रोक लगा दी और सुप्रीम कोर्ट का निर्देश आने तक के लिए इस रोक को बढ़ाया है. वहीं आज बद्रीनाथ धाम और  पांडुकेश्वर में कांग्रेस और स्थानीय लोगों ने बद्रीनाथ विधायक महेंद्र भट्ट का पुतला भी जलाया, जिस पर बद्रीनाथ विधायक ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की.

चमोली के सिमली गांव में पानी का संकट, बूंद-बूंद को तरसे ग्रामीण

गांव में कई दिनों से पानी नहीं आ रहा है.

चमोली जिले के सिमली गांव में एक माह से अधिक समय से पेयजल आपूर्ति बाधित है, जिसकी वजह से लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.

SHARE THIS:

चमोली जिले के सिमली गांव में एक माह से अधिक समय से पेयजल आपूर्ति बाधित है, जिसकी वजह से लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. लोगों का कहना है पेयजल लाइन काफी समय से क्षतिग्रस्त है लेकिन अब तक ठीक न होने के कारण लोगों को काफी दूर जाकर जलस्रोतों से पानी लाना पड़ रहा है. खासतौर पर बुजुर्ग कंधे पर पानी ढोकर लाने को मजबूर हैं. पानी की कमी के कारण गाय-भैंस पालने वाले ग्रामीणों को सुबह- शाम पानी की व्यवस्था करना मुश्किल हो जाता है. लोगों ने जल निगम से जलापूर्ति करने की मांग उठाई है. वहीं जल निगम के अवर अभियंता राजमोहन गुप्ता ने कहा कि बरसात के कारण लाइन क्षतिग्रस्त हो गई थी, जिसे जल्दी दुरुस्त कर पेयजल आपूर्ति सुचारू कर दी जाएगी.

वहीं श्री नंदा देवी लोकजात यात्रा 2021 के कार्यक्रम की घोषणा हो चुकी है. कार्यक्रम के अनुसार यात्रा 31 अगस्त से शुरू होगी, जबकि यात्रा का समापन 20 सितंबर को होगा. मंदिर समिति एवं आयोजन कमेटी कुरूड़, देवराड़ा के तय कार्यक्रम के अनुसार 31 अगस्त को देवी यात्रा कुरूड़ सिद्धपीठ से शुरू होगी और चरबंग, मथकोट, उस्तोली, थराली समेत प्रमुख पड़ावों के बाद यात्रा 20 सितंबर को यात्रा बैनोली से लोल्टी, तुंगेश्वर होते हुए सिद्धपीठ देवराड़ी पहुंचेगी, जहां पर पूरे विधि-विधान के साथ नंदादेवी के उत्सव डोली को मंदिर के गर्भगृह में विराजमान किया जाएगा और यही पर अगले 6 माह तक डोली की पूजा-अर्चना की जाएगी. बता दें, नंदा देवी लोकजात यात्रा हर साल निकाली जाती है, जबकि 12 साल में राजजात यात्रा होती है. यह यात्रा सबसे ऊंचे और निर्जन पड़ावों पर करीब 13000 फीट पर स्थित बेदनी बुग्याल भी पहुंचती है. इस यात्रा में करीब 240 किमी का सफर 20 दिनों में तय किया जाता है. इस यात्रा में 365 गांव जुड़े होते हैं और बीस दिन की यात्रा में बीस दिन का रात्रि विश्राम होता है. 20 दिवसीय 280 किमी की इस ऐतिहासिक यात्रा को गढ़वाल-कुमाऊं की सांस्कृतिक मिलन का प्रतीक भी माना जाता है.

चमोली की ट्राउट फिश की जबरदस्त डिमांड, जानिए क्यों खास है ये मछली?

कई बड़े शहरों में इस मछली को सप्लाई किया जा रहा है.

बैरांगना मत्स्य प्रजनन केंद्र में साल 1997 में ट्राउट मछली लाई गई थी.

SHARE THIS:

ट्राउट मछली जो कि औषधीय गुणों से भरपूर होती है और हृदयरोगियों के लिए फायदेमंद, आजकल चमोली के किसानों की आमदनी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. चमोली जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर स्थित बैरांगना मत्स्य प्रजनन केंद्र में कृत्रिम तरीके से ट्राउट मछ्ली का प्रजनन किया जा रहा है. यहां मछली का प्रजनन स्ट्रिपिंग पद्धति से किया जाता है, जिसमें मछली के पेट से अंडों को रिलीज किया जाता है और उसके बाद नर मछली के शुक्राणुओं को डालकर मत्स्य बीज तैयार किया जाता है.

वर्तमान समय में इस प्रजनन केंद्र से ही उत्तराखंड के अन्य पहाड़ी ठंडे इलाकों उत्तरकाशी, टिहरी, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर के किसानों को मछली के बच्चे दिए जा रहे हैं, ताकि इनका उत्पादन कर वह अपनी आर्थिकी सुधार सकें. ट्राउट मछली बाजार में 1000 रुपये से लेकर 1500 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है.

बाजार में इस मछली की काफी मांग है. बड़े-बड़े शहरों के फाइव स्टार होटलों में भी इसकी डिमांड बनी रहती है. चमोली से दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर तक ट्राउट मछलियों को किसानों से सीधे खरीदकर बड़ी-बड़ी फर्म द्वारा भेजा जा रहा है.

बैरांगना मत्स्य प्रजनन केंद्र में साल 1997 में ट्राउट मछली लाई गई थी. यह मछली तब से लेकर अब तक कई किसानों की जिंदगी संवार चुकी है और वर्तमान में इससे लगभग चमोली के 150 किसान जुड़े हुए हैं, जो इसके व्यापार से अच्छी कमाई कर रहे हैं.

ट्राउट मछली के औषधीय गुणों की बात की जाए तो यह हृदय रोगियों के लिए बेहद फायदेमंद होती है, क्योंकि इसमें ओमेगा-6 पाया जाता है जबकि अन्य मछलियों में ओमेगा-3 पाया जाता है.

गौरतलब है कि अंग्रेज ट्राउट मछली को फिशिंग के लिए भारत में लाए थे लेकिन बाद में इसके औषधीय गुणों का पता चलने के बाद लोगों ने इसे खाना शुरू किया. माना जाता है कि करीब 122 साल पहले नार्वे के नेल्सन ने इसके अंडे डोडीताल में डाले थे और वहीं से अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में इसको भेजा गया.

भगवान शिव ने कामदेव को मारने के लिए फेंका था त्रिशूल, इस मंदिर में आज भी मौजूद है अस्त्र

गोपीनाथ मंदिर का संबंध भगवान शिव से है.

उत्तराखंड के चमोली जिले के गोपेश्वर नगर में भगवान शिव का पौराणिक गोपीनाथ मंदिर स्थित है.

SHARE THIS:

उत्तराखंड के चमोली जिले के गोपेश्वर नगर में भगवान शिव का पौराणिक गोपीनाथ मंदिर स्थित है. गोपीनाथ मंदिर का संबंध भोलेनाथ से है. यह मंदिर केदारनाथ धाम के समकक्ष प्राचीन बताया जाता है. मंदिर के वास्तु कला की अगर बात करें तो इसके शीर्ष पर गुम्बद नुमा आकृति है. इस मंदिर का गर्भगृह 30 वर्ग फुट है, जिसमें 24 द्वारों से प्रवेश किया जाता है. पंचकेदारों में मौजूद चतुर्थ केदार रुद्रनाथ के कपाट बंद होने पर चतुर्थ केदार भगवान रुद्रनाथ की चल विग्रह डोली को गोपीनाथ मंदिर लाया जाता है.

इसी मंदिर में शीतकाल में भगवान गोपीनाथ के साथ बाबा रुद्रनाथ की भी पूजा अर्चना की जाती है. बताया जाता है कि जब भगवान शिव ने कामदेव को मारने के लिए अपना त्रिशूल फेंका तो वह यहां गढ़ गया था. त्रिशूल की धातु अभी भी सही स्थिति में है, जिस पर मौसम प्रभावहीन है और यह एक आश्वर्य है. यह माना जाता है कि शारीरिक बल से इस त्रिशूल को हिलाया भी नहीं जा सकता, जबकि यदि कोई सच्चा भक्त इसे छू भी ले तो इसमें कम्पन होने लगता है.

'फूलों की घाटी' में खिले हैं जहरीले फूल, छुआ तो जा सकती है जान

'फूलों की घाटी' चमोली में स्थित है.

वन विभाग ने घाटी में एकोनिटम बालफोरी और सेनेसियो ग्रैसिलिफ्लोरस नाम के फूल चिह्नित किए हैं, जो काफी जहरीले होते हैं.

SHARE THIS:

चमोली जिले में स्थित 87.5 वर्ग किलोमीटर में फैली विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है. यह वही घाटी है, जिसे आज से लगभग साढे़ तीन दशक पूर्व राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया था लेकिन अब यहां कई जहरीले फूल हैं, जो घाटी के लिए खतरनाक हैं और  पर्यटकों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकते हैं. वन विभाग ने घाटी में एकोनिटम बालफोरी और सेनेसियो ग्रैसिलिफ्लोरस नाम के फूल चिह्नित किए हैं, जो काफी जहरीले होते हैं.

नंदा देवी लोकजात यात्रा शुरू, 365 गांवों से गुजरेगी मां की डोली

लोकजात यात्रा अगले 20 दिनों तक चलेगी.

चमोली जिले के सिद्धपीठ कुरुड़ से मां नंदा देवी की लोकजात यात्रा शुरू हो चुकी है.

SHARE THIS:

चमोली जिले के सिद्धपीठ कुरुड़ से मां नंदा देवी की लोकजात यात्रा शुरू हो चुकी है. यात्रा की शुरुआत में मां नंदा की दोनों डोलियों को मंदिर से बाहर लाकर पूजा-अर्चना की गई. श्रद्धालुओं ने मां के जयकारे लगाए और डोलियों को मंदिर से रवाना करते वक्त मां को विदाई दी. कुरुड़ मंदिर से बधाण की मां नंदा डोली चरबंग व दशोली की मां नंदा डोली फरखेत गांव पहुंची. इस दौरान जगह-जगह गांवों में डोली की पूजा अर्चना व स्वागत किया गया.

सिद्धपीठ कुरुड़ में सुबह देवी की डोलियों की पूजा-अर्चना के बाद जब डोलियों को मंदिर के बाहर लाया गया तो देवी का भूम्याल समेत अन्य देवी देवताओं से मिलन हुआ. बता दें कि नंदा देवी लोकजात यात्रा अगले 20 दिनों तक जारी रहेगी और इसमें देवी मां की डोली 365 गांवों से गुजरेगी, जिसमें कि करीब 280 किलोमीटर की यात्रा तय की जाएगी.

यह यात्रा सबसे ऊंचे और निर्जन पड़ावों पर करीब 13,000 फीट पर स्थित बेदनी बुग्याल भी पहुंचेगी. वहीं इन 20 दिनों की यात्रा के दौरान श्रद्धालु अलग-अलग पड़ावों पर रात्रि विश्राम करेंगे.

गौरतलब है कि लोक इतिहास के अनुसार मां नंदा गढ़वाल के राजाओं के साथ-साथ कुमाऊं के कत्यूरी राजवंश की ईष्ट देवी भी हैं. ईष्ट देवी होने के कारण नंदा देवी को राजराजेश्वरी कहकर सम्बोधित किया जाता है. बताया जाता है कि लोकजात यात्रा में वेदनी पूजा-अर्चना के बाद देवी मां की डोली 6 मास देवराड़ा में ही विराजमान होती है.

मां नंदा देवी के बधाण आगमन पर श्रद्धालुओं द्वारा हर्षोउल्लास के साथ स्वागत किया जाता है. नए अनाज का देवी को भोग लगाया जाता है. सिद्धपीठ देवराड़ा में विराजमान होने के बाद अगले 6 माह तक ननिहाली भक्त मंदिर में मां नंदा की पूजा-अर्चना करते हैं और 6 माह बाद नंदा देवी की डोली को मायके यानी कुरुड़ के लिए रवाना किया जाता है.

Load More News

More from Other District

विज्ञापन

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज