कैसा महिला दिवस.... यहां तो पानी, चारे में ही जा रही है महिलाओं की ज़िंदगी

राज्य बनने के 17 साल बीतने के बावजूद आज भी महिलाओं को पानी, जानवरों के लिए चारे, जलावन की लकड़ी के लिए दौड़ना पड़ता है.

ETV UP/Uttarakhand
Updated: March 8, 2018, 6:09 PM IST
कैसा महिला दिवस.... यहां तो पानी, चारे में ही जा रही है महिलाओं की ज़िंदगी
राज्य बनने के 17 साल बीतने के बावजूद आज भी महिलाओं को पानी, जानवरों के लिए चारे, जलावन की लकड़ी के लिए दौड़ना पड़ता है.
ETV UP/Uttarakhand
Updated: March 8, 2018, 6:09 PM IST
दुनिया भर में आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा है लेकिन उत्तराखण्ड के अधिकांश इलाकों में शायद ही इसका कोई असर नज़र आ रहा हो. दरअसल यहां महिलाओं को आज भी दैनिक जीवन जीने के लिए जान जोखिम में डालनी पड़ती है.

राज्य बने भले ही 17 साल हो गए हैं मगर पहाड़ में आज भी महिलाओं के सामने पहाड़ जैसी चुनौतियां हैं. घूमने के लिए पहाड़ों में जाने वालों को पहाड़ जितने सुंदर लगते हैं, यहां रहने वालों को वह उतने ही दुरूह. रोज़गार की कमी की वजह से उत्तराखंड में पलायन आज भी जारी है और पहाड़ों में रहने वाली महिलाओं की चुनौतियां भी कम नहीं हुई हैं.

Uttrakhand women chamoli 2

राज्य बनने के 17 साल बीतने के बावजूद आज भी महिलाओं को पानी, जानवरों के लिए चारे, जलावन की लकड़ी के लिए दौड़ना पड़ता है. महिला सशक्तिकरण के दावों की हकीकत और काग़ज़ों पर दौड़ती सरकारी योजनाओं की ज़मीनी हकीकत यह महिलाएं बयान करती हैं.

जानवरों के चारे के लिए कई-कई घंटे इन महिलाओं को जंगल-जंगल भटकना पड़ता है और कभी पेड़ों पर चढ़कर तो, कभी खाई में झूलते हुए अपने जानवरों के लिए चारे का इंतज़ाम करना पड़ता है. और इसके बाद देर होने पर सवाल भी पूछे जाते हैं कि देर हुई तो क्यों हुई?

Uttrakhand women chamoli 3

महिला सशक्तीकरण को लेकर भले ही राजनितिक दल सरकार बनने पर बिभिन्न योजना चलाने की बात करते है मगर सरकार बनते ही ये वायदे महज यादें बनकर रह जाते हैं और कोई योजना शुरू कर भी दी गई तो वह महज क़ाग़ज़ों तक ही सीमित रह जाती है.
उत्तराखंड बने 17 साल हो गए हैं और इन 17 सालों में क्या भाजपा क्या कांग्रेस दोनों ही राजनितिक दलों ने बारी-बारी से सत्ता का खूब सुख भोगा. यूकेडी ने भी दूध में मलाई निकलने का काम किया मगर पहाड़ी राज्य की रीढ़ कही जाने वाली महिलाओं की आज तक किसी ने सुध नहीं ली. इसके चलते आज भी पहाड़ की महिलाओं को पहाड़ सी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
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