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यहां कोई ऐसा क्षेत्र नहीं जहां महिलाएं अपना परचम न लहरा रही हों....

Kamlesh Bhatt | ETV UP/Uttarakhand
Updated: March 8, 2018, 4:25 PM IST
यहां कोई ऐसा क्षेत्र नहीं जहां महिलाएं अपना परचम न लहरा रही हों....
सीमांत ज़िले चंपावत में महिलाएं हर मोर्चे पर सक्रिय हैं.

चंपावत में कई मोर्चों पर अग्रणी भूमिका निबाह रही महिलाओं से बात की न्यूज़ 18 ने

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उत्तराखंड को इसकी मातृ शक्ति के लिए भी जाना जाता है. यहां के समाज में महिलाओं की भागीदारी पारंपरिक रूप से रही है और अब ये आधी आबादी परिवार के साथ ही प्रशासनिक ज़िम्मेदारियां भी  बखूबी निभा रही हैं. चंपावत में कई मोर्चों पर अग्रणी भूमिका निबाह रही महिलाओं से बात की न्यूज़ 18 ने.

महिला दिवस पर चम्पावत सदर की एसडीएम सीमा विश्वकर्मा कहती हैं कि विश्व में महिलाओं ने अपनी पहचान अलग बनाई है. जहां तक भारत की बात है सात दशक में महिलाओं के प्रति लोगों का नजरिया बदला है हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपने को साबित किया है.

लोहाघाट थाने की पहली महिला एसएचओ रहीं और अब जिला महिला प्रकोष्ठ देख रही मीनाक्षी नौटियाल क्षेत्र में लेडी सिंघम के नाम से जानी जाती हैं. वह कहती हैं कि चाहे पुलिस हो या अन्य कोई फ़ोर्स देश और राज्य की सुरक्षा में अपने पुरुष साथियों के साथ उतनी ही मुस्तैदी से खड़ी हैं.

निर्भया प्रकोष्ठ काउंसलर मीनू पंत कहती हैं आज के दौर में भी घरेलू हिंसा के बहुत से मामले सामने आ रहे हैं, यह दुखद है. अच्छा लगता है महिलाएं अब अपने साथ हो रही हिंसा के खिलाफ आवाज  उठा रही हैं.

वाल्मीकि समाज के बच्चों को स्कूल में पढ़ने के लिए प्रेरित करने के साथ ही भ्रूण हत्या रोकने के लिए लोगों को जागरूक कर रही तीलू रौतेली सम्मान प्राप्त रीता गहतोड़ी कहती हैं समाज में रूढ़िवादी परम्पराएं खत्म होनी चाहिएं.

भाजपा महिला जिला अध्यक्ष  मणिप्रभा तिवारी कहती हैं कि मैदान की अपेक्षा पहाड़ की महिलाओं को अपने अधिकार और कानून के प्रति और अधिक जागरूक होने की ज़रूरत है.

भजनपुर बनबसा से जिला पंचायत सदस्य ऊषा गुरंग कहती हैं....  कोमल है, कमजोर है नहीं तू, शक्ति का नाम है नारी, जग को जीवन देने वाली मौत भी तुझसे हारी.
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अपने पति अजय पुनेठा के साथ कपड़ों के व्यवसाय से जुड़ी पूर्व लोहाघाट नगर पंचायत सभासद मीनू पुनेठा कहती हैं ज़मीन से लेकर अंतरिक्ष तक महिलाओं ने अपनी ताकत दुनिया को दिखाई है.

इधर चम्पावत में मैदानी क्षेत्रों की तरह पहाड़ की लड़कियां भी अपने भविष्य को लेकर स्वरोजगार अपना कर महिला शक्तिकरण की पहचान बन रही हैं. रेनू कुमारी और आशा आर्य अपना बुटीक चलाती हैं. दोनों के ऊपर से बहुत पहले पिता का साया उठ गया था. पिता के निधन के बाद दोनों के ऊपर मां के साथ ही भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी भी कम उम्र में ही आ गई थी.

दोनों सहेलियों ने खुद का बुटीक खोला और इससे होने वाली आमदनी से यह न सिर्फ़ अपनी मां का ख्याल रखती हैं बल्कि अपने भाई-बहनों को भी पढ़ा रही हैं.

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First published: March 8, 2018, 4:25 PM IST
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