अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट में इस बार फिर टम्टा VS टम्टा

साल 2009 में अल्मोड़ा संसदीय सीट सुरक्षित घोषित हुई थी. तबसे इस सीट पर प्रदीप टम्टा और अजय टम्टा के बीच ही मुकाबला रहा है.

Kamlesh Bhatt | News18 Uttarakhand
Updated: May 15, 2019, 6:40 PM IST
अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट में इस बार फिर टम्टा VS टम्टा
अल्मोड़ा में बीजेपी-कांग्रेस में सीधा मुकाबला है
Kamlesh Bhatt | News18 Uttarakhand
Updated: May 15, 2019, 6:40 PM IST
बाल मिठाई और ऊंचे नीचे रास्तों वाली अल्मोड़ा सीट की लड़ाई भी सीधी और सपाट रही है. आजादी के बाद से ये सीट लगातार कांग्रेस के कब्जे में रही. जब इंदिरा गांधी के विरुद्ध पूरे देश में लहर चली तब जाकर 1977 में इस सीट से उस समय की जनता पार्टी उम्मीदवार डॉ. मुरली मनोहर जोशी जीत सके. फिर 1980 में हरीश रावत ने ये सीट जीत ली. उसके बाद से 1991 की राम लहर के बाद ही यहां फिर से बीजेपी आ सकी. बीजेपी के हाथ से ये सीट निकली 2009 में जब राज्य की पांचों सीटे कांग्रेस ने जीतीं और प्रदीप टम्टा सांसद बने.

मतदाताओं की स्थिति



ये लोकसभा सीट अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत और पिथौरागढ़ जिलों तक फैली है. पिछले लोकसभा लोकसभा चुनाव में इस सीट पर 12 54 328 मतदाता थे. इनमें से पुरुष 302965 थे, जबकि 343560 महिला मतदाता थीं. इस सीट के तहत विधान सभा की 14 सीटें आती हैं. इसमें अल्मोड़ा जिले की अल्मोडा, द्वाराहाट, जगेश्वर, रानीखेत, साल्ट, सोमेश्वर सीटें इस लोकसभा क्षेत्र के दायरे में आती हैं. बागेश्वर जिले की बागेश्वर और कापकोट सीट, चंपावत जिले की चंपावत, लोहाघाट, पिथौरागढ़ जिले की धारचूला और दीदीहाट, गंगोलीहाट, पिथौरागढ़ सीटें इस लोकसभा क्षेत्र में पड़ती हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में जगेश्वर, रानीखेत, धारचूला सीटों पर कांग्रेस का कब्जा रहा, बाकी 11 सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की.

अजय टम्टा


फिर वही दावेदार

इस सीट की एक खास बात ये भी है कि इस चुनाव में भी कांग्रेस और बीजेपी दोनों पार्टियों की ओर से वही उम्मीदवार हैं जो 2014 में थे. मोदी लहर के दौरान 2009 में हारने वाले अजय टम्टा 14 में 95690 वोटों से चुनाव जीत गए थे. अजय टम्टा को कुल 3 48186 वोट मिले, जबकि कांग्रेस कैंडिडेट प्रदीप टम्टा को 2 52 496 वोट मिले. अजय टम्टा को केंद्रीय मंत्रिमंडल में कपड़ा राज्य मंत्री के तौर पर शामिल किया गया.

कांग्रेस प्रत्याशी प्रदीप टम्टा ( बीच में )

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इस बार पहाड़ की दूसरी सीटों की ही तरह इस सीट पर भी चुनाव को बीजेपी ने मोदी को दुबारा पीएम बनाने की लड़ाई में तब्दील करने की कोशिश में दिखी. हालांकि जैसा होता है मंत्री रह चुके उम्मीदवार से मतदाताओं की उम्मीदें पूरी न होने की एक नाराजगी होती है. फिर भी अपने मिलनसार स्वाभाव से अजय टम्टा ने सभी को खुश करने की भरसक कोशिश की है. फिर भी प्रदीप टम्टा को किसी तरह से कम नहीं आंका जा सकता. वे भी पूरी ताकत से लड़ते दिखे हैं. दोनों एक ही समुदाय से हैं इस लिहाज से जातिगत आंकड़े भी किसी एक के पक्ष में जाते नहीं दिखते.

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