खाने-पीने का संकट हो गया था 60-90 साल के बुजुर्गों के सामने... पुलिस ने लिया वृद्धाश्रम को गोद
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खाने-पीने का संकट हो गया था 60-90 साल के बुजुर्गों के सामने... पुलिस ने लिया वृद्धाश्रम को गोद
साईं वृद्धाश्रम को प्रेमनगर पुलिस के गोद लेने के बाद बुजुर्गों की जांच करते स्वास्थ्यकर्मी.

सिनर्जी अस्पताल के चिकित्सक डॉक्टर कमलकांत गर्ग और डॉक्टर जितेंद्र वर्मा ने बुजुर्गों के स्वास्थ्य परीक्षण की जिम्मेदारी ले ली है.

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देहरादून. कोरोना वायरस, कोविड-19, के ख़िलाफ़ जंग में पुलिस के कई प्रकार के मानवीय चेहरे देखने को मिले हैं. लेकिन दून पुलिस द्वारा किया गया एक कार्य खूब सुर्खियां बटोर रहा है. पुलिस ने लॉकडाउन के दौरान एक ओल्डेज होम को गोद लिया है जो बन्द होने के कगार पर था. पुलिसकर्मियों ने लॉकउन के बाद भी इस ओल्डेज होम को चलाने की बात कही है. इससे यहां रहने वाले बुजुर्गों को काफ़ी राहत मिली है.

बंदी का ख़तरा 

साईं वृद्धाश्रम की शुरुआत प्रेमनगर में साल 1984 में ग्राम महिला कल्याण संस्थान के नाम से की गई थी. 2004 तक तो उक्त संस्थान को सरकार से आर्थिक सहायता मिली लेकिन इसके बाद यह बंद हो गई और इस वृद्धाश्रम पर बंदी का ख़तरा मंडराने लगा. ऐसे में आगे आईं प्रेमलता रावत ने जिन्होंने अपने खर्चे पर इस वृद्धाश्रम को चलाया. लेकिन लॉकडाउन से कुछ दिन पहले ही उनकी मृत्यु होने से आश्रम के साथ यहां रह रहे बुजुर्ग भी बेसहारा हो गए.



लॉकडाउन के दौरान इन लोगों के पास रहने के लिए आश्रम तो था लेकिन खाने-पीने के लिए कोई भी व्यव्स्था न थी. लॉकडाउन में ज़रूरतमंदों को मदद कर रही देहरादून पुलिस को इस आश्रम में रह रहे 7 बुजुर्गों के बारे में पता चला. एसओ प्रेमनगर धर्मेंद्र रौतेला अपनी टीम के साथ इस वृद्धाश्रम पहुंचे. फिर उन्होंने इस आश्रम को गोद लेने का फ़ैसला किया. अब इस आश्रम की पूरी जिम्मेदारी प्रेमनगर थाना उठाएगा.



इलाज को सामने आए डॉक्टर

साईं वृद्धाश्रम में आज भी 60 से 90 साल तक के 7 बुजुर्ग रहते हैं. प्रेमलता रावत के गुज़र जाने के बाद इन्हें हर प्रकार की दिक़्क़तें होने लगी थीं. पुलिस के गोद लेने के बाद वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्गों की सहायता के लिए धीरे-धीरे लोग आगे आने लगे हैं. पुलिस ने जहां आश्रम में रह रहे बुजुर्गों के खाने-सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उठाई है तो सिनर्जी अस्पताल के चिकित्सक डॉक्टर कमलकांत गर्ग और डॉक्टर जितेंद्र वर्मा ने उन्हें दवाएं और आजीवन उनके स्वास्थ्य परीक्षण की जिम्मेदारी ले ली है.

आपदा के दौरान उत्तराखंड पुलिस का मानवीय चेहरा दमकता हुआ सामने आया है. देहरादून पुलिस का यह कार्य बताता है कि उत्तराखंड पुलिस को मित्र पुलिस क्यों कहा जाता है.

 
First published: May 6, 2020, 11:18 AM IST
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