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स्‍मृति शेष: सुंदरलाल बहुगुणा ने पत्नी के कहने पर छोड़ दी थी कांग्रेस, रम गए थे समाज सेवा में

कश्मीर और कोहिमा की यात्रा के बाद वे टिहरी बांध के विरोध में कूद गए.

प्रकृति के आगोश में समा गया प्रकृति का रक्षक: 14 साल की उम्र में सुदंरलाल बहुगुणा (Sundar Lal Bahuguna) टिहरी रियासत के खिलाफ प्रजा मंडल के आंदोलन में कूद गए थे.

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देहरादून. विश्व प्रसिद्ध पर्यावरणविद और चिपको आंदोलन के प्रमुख नेता सुदंरलाल बहुगुणा (Sundar Lal Bahuguna) का 94 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है. जन्म टिहरी के डोबरा के मरोड़ा गांव (Marora village) में 9 जनवरी 1927 को हुआ था. पिता का नाम अम्बादत्त बहुगुणा और माता का नाम पूर्णा देवी था. बचपन से ही महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानने वाले सुंदरलाल बहुगुणा ने गांधी के आदर्शों पर चलने को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया. पर्यावरण के प्रति उनका प्रेम और लोगों को उनका हक दिलाने के लिए उन्होंने उपवास को अपना हथियार बनाया. शुरुआती दौर में उन्होंने छूआछूत और दलितों के मंदिर में प्रवेश को लेकर आंदोलन के साथ ही पहला उपवास किया था.

14 साल की उम्र में सुदंरलाल बहुगुणा टिहरी रियासत के खिलाफ प्रजामंडल के आंदोलन में कूद गए. गांधी और श्रीदेव सुमन को अपना गुरु मानने वाले बहुगुणा आजादी के लिए नरेद्रनगर जेल में भी रहे. 24 साल की उम्र में बहुगुणा ने कांग्रेस की सदस्यता भी ली, लेकिन उसके बाद उनके जीवन में एक बड़ा बदलाव आया. शादी के समय उनकी पत्नी बिमला बहुगुणा ने एक शर्त रखी. पत्नी ने कहा कि अगर वह राजनीति में रहेंगे तो वह उनसे शादी नहीं करेंगी. इसके बाद बहुगुणा ने राजनीति छोड़ दी. इसके बाद उन्होंने दलीय राजनीति भी छोड़ दी और समाज सेवा में रम गए. उन्‍होंने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में छूआछूत विरोधी, दलितों के मंदिर प्रवेश, ग्राम स्वराज, स्वरोजगार, नशा विरोधी और जंगलों को बचाने के लिए आंदोलन किए.

चिपको आंदोलन को नई दिशा
इसके बाद वनों को लेकर चल रहे आंदोलन में बहुगुणा ने भागीदारी दी और चिपको आंदोलन के दौरान उत्तरकाशी और टिहरी के बडियारगढ़ में दो उपवास किए. करीब एक दशक तक बहुगुणा चिपको आंदोलन में सक्रिय रहे. इसी दौरान पूरे हिमालय को जानने के लिए बहुगुणा ने पैदल नापा और कश्मीर से कोहिमा तक की पैदल यात्रा की. उसके परिवर्तन और व्यवस्था को चिपको आंदोलन को नई दिशा दी.

टिहरी बांध का भी किया था विरोध
कश्मीर और कोहिमा की यात्रा के बाद वे टिहरी बांध विरोध में कूद गए और अपनी हिमालय यात्रा के एक्सपीरियेंस को लोगों से साझा किया. इसके बाद उन्हें पर्यावरणविद कहा जाने लगा. सुंदरलाल बहुगुणा ने लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने के लिए कई किताबेंभी लिखीं. साल 1992-93 में हिमालय बचाओं आंदोलन को बहुगुणा ने पुर्नगठित किया और नई दिशा दी. टिहरी बांध विरोधी में भी बहुगुणा ने चार बाड़े उपवास किए.
Published by:Bankatesh Kumar
First published: