दवा ही नहीं दारू भी है ज़रूरी... आवश्यक सेवाओं की दुकानों के साथ दून में खुली रही शराब की दुकानें
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दवा ही नहीं दारू भी है ज़रूरी... आवश्यक सेवाओं की दुकानों के साथ दून में खुली रही शराब की दुकानें
सवाल तो बनता ही है कि क्या देहरादून में शराब आवश्यक वस्तु की श्रेणी में आती हैं?

आबकारी विभाग के अधिकारी इस सवाल का सीधा जवाब देने से बचते हैं लेकिन यह ज़रूर कहते हैं कि उन पर राजस्व का दबाव है.

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देहरादून. लॉकडाउन-5 यानी अनलॉक-1 सोमवार से लागू होना है और उत्तराखंड में इसकी गाइडलाइन्स जारी नहीं हुई हैं. अब तक के निर्देशों के अनुसार देहरादून में रविवार को आवश्यक सेवाओं के अलावा बाकी सभी दुकानें बंद रहनी हैं. इन आवश्यक सेवाओं में सब्ज़ी, दूध, दवा की दुकानें तो हैं आश्चर्यजनक रूप से शराब की दुकानें भी खुली हुई हैं. ऐसे में यह सवाल तो बनता ही है कि क्या हरादून में शराब आवश्यक वस्तु की श्रेणी में आती है? यदि नहीं तो इन्हें किस आधार पर खुलने की अनुमति दी गई है?

अर्थव्यवस्था की दवा

बोलचाल की भाषा में दवा के साथ दारू का इस्तेमाल अब भी किया जाता है... दवा-दारू की या नहीं. लॉकडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था की कमर टूटने से पहले से ही उत्तराखंड में दारू राज्य सरकारों के हिसाब से अर्थव्यवस्था के लिए दवा का काम करती रही है.



जिस प्रदेश में शराब के ख़िलाफ़ लंबे आंदोलन चले हों, जिसके वर्तमान मुख्यमंत्री ने सरकार की कमान संभालते ही ऐलान किया हो कि अगले पांच साल में कदम दर कदम शराबबंदी की ओर बढ़ेंगे. वहां शराब का विरोध करने पर महिलाओं को जेलों में बंद किया गया. जब सब कुछ बंद है तब भी शराब की दुकानें खुली हुई हैं.



शराब लॉबी का दबाव 

दरअसल लॉकडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था की हालत ख़राब है और शराब से राजस्व ही एक ऐसा ज़रिया है जिससे आय सुनिश्चित की जा सकती है. इसीलिए उत्तराखंड सरकार प्रत्यक्ष रूप से शराब लॉबी के दबाव में भी नज़र आती है. पहली बार शराब कारोबारियों ने अपनी मांगें मनवाने के लिए हड़ताल की और सरकार ने उनकी मांगों पर विचार का आश्वासन दिया.

शायद शराब कारोबारियों के दबाव का ही परिणाम है कि शराब को दूध, सब्ज़ी, दवा जितना ज़रूरी मान लिया गया है और रविवार को शराब की दुकानें खोलने की अनुमति दे दी गई है.

राजस्व का दबाव 

आबकारी विभाग के अधिकारी इस सवाल का सीधा जवाब देने से बचते हैं लेकिन यह ज़रूर कहते हैं कि उन पर राजस्व का दबाव है. चूंकि शराब के राजस्व का हिसाब रोज़ देना पड़ रहा है इसलिए एक दिन भी दुकानें बंद करने का जोखिम नहीं उठाया जा सकता.

हमने देहरादून के ज़िलाधिकारी आशीष श्रीवास्तव से भी इस संबंध में बात करनी चाही लेकिन नहीं हो सकी. ख़बर लिखे जाने से पहले बात करने की कोशिश पर उनका फ़ोन व्यस्त मिला. हमने उन्हें मैसेज भी किया लेकिन न तो कॉल बैक आया न ही मैसेज का जवाब.

ज़िला प्रशासन की ओर से जब भी जवाब मिलेगा हम ख़बर में शामिल करेंगे.

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