उत्तराखंड में भीम आर्मी की दस्तक, रेप पीड़िता के परिजनों से चंद्रशेखर ने की मुलाकात

सामाजिक कार्यकर्ता दीपा कौशलम कहती हैं कि भीम आर्मी चाहती क्या है, ज़मीन पर कितना काम करेगी? जब तक लोगों को यह समझ नहीं आएगा तो वह उससे जुड़ेंगे कैसे.

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: June 4, 2019, 9:36 PM IST
उत्तराखंड में भीम आर्मी की दस्तक, रेप पीड़िता के परिजनों से चंद्रशेखर ने की मुलाकात
भीम आर्मी अध्यक्ष चंद्रशेखर रावण टिहरी की रेप पीड़िता के परिजनों से मिलने उनके गांव पहुंचे.
Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: June 4, 2019, 9:36 PM IST
टिहरी के जौनपुर में 9 साल की दलित बच्ची से बलात्कार के मामले में भीम आर्मी भी सक्रिय हो गई है. राज्य में पहली बार भीम आर्मी ने दस्तक दी है. भीम आर्मी के अध्यक्ष चंद्रशेखर मंगलवार को कई कार्यकर्ताओं के साथ पीड़ित बच्ची के परिजनों से मिले और फिर पीड़िता के गांव भी गए. उन्होंने दुष्कर्म पीड़िता के परिजनों से मुलाकात की और कहा कि दलितों के साथ अत्याचार हो रहा है. पुलिस ईमानदारी से काम नहीं कर रही है. चंद्रशेखर रावण ने कहा कि दलितों के साथ हो रहे अन्याय को बर्दाश्त नहीं करेंगे.

लेकिन भीम आर्मी या चंद्रशेखर रावण के आने से उत्तराखंड के आइडेंटिटि क्राइसिस से जूझ रहे दलितों की मानसिकता, स्थिति में क्या कोई परिवर्तन आ सकता है? उत्तराखंड की राजनीति और समाज पर नज़र रखने वाले लोगों की राय इस पर अलग-अलग है.

सोचा समझा कदम 

वरिष्ठ पत्रकार दिनेश जुयाल कहते हैं कि उत्तराखंड में आना चंद्रशेखर रावण का एक बहुत सोचा-समझा और समझदारी भरा कदम है. वह जानते हैं कि मायावती की राजनीति अब बहुत देर तक नहीं चलने वाली और बीएसपी में कोई सेकेंड लाइन है नहीं. राज्य के मैदानी इलाक़ों हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर में बीएसपी का प्रभाव है और चंद्रशेखर अपनी आक्रामक राजनीति से वहां जगह बना सकते हैं.

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सामाजिक संस्था धाद के संस्थापक और अध्यक्ष लोकेश नवानी को लगता है कि भीम आर्मी या चंद्रशेखर रावण यहां उतनी पैठ या प्रभाव नहीं बना पाएंगे जितना यूपी में या किसी और राज्य में. उन्हें लगता है कि इसकी वजह यहां की सामाजिक सरंचना में हैं. उत्तराखंड में सामाचिक न्याय की ताकतें कमज़ोर हैं और यहां का दलित वर्ग गरीब, असंगठित है.

दलित अस्मिता जागृत नहीं 
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नवानी कहते हैं कि उत्तराखंड के दलित समाज की दलित अस्मिता जागृत नहीं है. यहां जो भी संपन्न या सक्षम होता है वह गांव छोड़ देता है. वह शहर में रहने लगता है और ठाकुर, ब्राह्मण के जातिसूचक उपनामों का इस्तेमाल कर देता है. इस तरह वह अपने समाज से संबंध तोड़ लेता है क्योंकि उच्च वर्ग में शामिल होने की उसकी आकांक्षा रहती है.

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हालांकि वह कहते हैं कि जौनपुर की बच्ची को इंसाफ़ मिलना चाहिए और अगर भीम आर्मी के आने से ही ऐसा होता है तो यह बहुत अच्छा है.

ज़मीन पर काम करना होगा 

सामाजिक कार्यकर्ता दीपा कौशलम कहती हैं कि भीम आर्मी पहाड़ में कितनी सफल हो पाएगी यह कहना थोड़ी जल्दबाज़ी होगी. क्योंकि अभी तक भीम आर्मी के उद्देश्य ही साफ़ नहीं हैं. वह क्या चाहते हैं, ज़मीन पर कितना काम करेंगे जब तक लोगों को यह समझ नहीं आएगा तो वह उससे जुड़ेंगे कैसे.

दीपा कहती हैं कि अगर भीम आर्मी को पहाड़ के दलितों की आवाज़ बनना है तो उसे उनके बीच रहना होगा, उनके साथ मिलकर काम करना होगा.

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First published: June 4, 2019, 7:04 PM IST
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