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अंग्रेज रहते तो मसूरी तक चल जाती ट्रेन

अंग्रेज रहते तो मसूरी तक चल जाती ट्रेन

आजादी के छै दशख से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी देहरादून से ट्रेन एक इंच भी आगे नहीं बढ पाई है.

आजादी के छै दशख से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी देहरादून से ट्रेन एक इंच भी आगे नहीं बढ पाई है.

आजादी के छै दशख से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी देहरादून से ट्रेन एक इंच भी आगे नहीं बढ पाई है.

आजादी के छै दशख से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी देहरादून से ट्रेन एक इंच भी आगे नहीं बढ पाई है. अंग्रेज जहां तक रेलवे ट्रैक का निर्माण छोड़ गये थे आज भी ट्रेन वहीं रुकी हुई हैं.

देहारदून रेलवे स्टेशन आज भी अंतिम रेलवे स्टेशन बनकर रहा गया है. ट्रेन पहाड़ में पहुंचाने के लिये कैसे अंग्रेज हम से 100 साल पहले भी बेहतर थे कैसे पहाड़ पर सुरंग बनाकर ट्रेन पहुंचाई जा रही थी.

देहरादून रेलवे स्टेशन का निर्माण अंग्रेजों ने 1894 में शुरु किया था और साल 1899 में बनकर तैयार हो चुका था. 1899 के बाद अंग्रेज अफसर दिल्ली से सीधे देहरादून आने जाने लगे थे.

अंग्रेजों ने व्यापार और हुकुमत दोनों के लिये देहरादून रेलवे स्टेशन का भरपूर उपयोग किया. देहरादून रेलवे स्टेशन के निर्माण के बाद अब अंग्रेज अफसरों के लिये मसूरी और गढ़वाल रियासतों में जाना आसान हो गया था. लेकिन अपनी सोच और तकनीक के लिये विख्यात अंग्रेज अभी कहां रुकने वाले थे. अब अंग्रेज अफसर ट्रेन मंसूरी ले जाने के लिये योजना बनाने लगे थे.

अंग्रेज राजपुर रोड के किनारे से मंसूरी ट्रेन ले जाने के लिये खाका तैयार करने लगे थे. अंग्रेजों की तकनीक इतनी बेहतर थी कि उन्होंने राजपुर रोड से करीब 3 किमी. उंचाई पर एक सुरंग बनाई जहां से ट्रेन का ट्रेक मसूरी ले जाने की तैयारी की जा रही थी. अंग्रेजों के हौसले बुलंद थे. वे अगले दो साल के भीतर मसूरी तक ट्रेन ले जाने का सपना देख रहे थे.

अंगेर्जों ने आज से करीब 100 साल से भी ज्यादा समय पहले बना डाली थी. क्योंकि सपना मसूरी ट्रेन ले जाने का बुना जा रहा था. लेकिन एक हादसे ने उनके काम की रफ्तार को रोक दिया.

वरिष्ठ पत्रकार अविकल थपलियाल बताते हैं कि सुरंग निर्माण के दौरान मिट्टी ढह जाने से कई मजदूरों की जान चली गई थी जिस कारण ट्रैक निर्माण का कार्य रुक गया. मामला कोलकाता हाईकोर्ट में भी चला. लेकिन मामला सुलझने तक अंग्रेज भारत छोड़ चुके थे और हमारे नेता उस हद तक जाकर सपना नहीं देख सकते थे.

साल 1947 में देश आजाद हुआ और देश में रेलवे ट्रैक बढ़ाने के लिये विकास कार्य शुरु हुए लेकिन देहरादून का रेलवे स्टेशन वहीं थम चुका था जहां अंग्रेज उसे छोड़ गये थे.

अंग्रेजों की ओर से मसूरी ट्रैक का पूरा सर्वे भी किया गया था. पूरा खाका तैयार हो गया था. लेकिन फिर भी हमारे नेता देहरादून से बाहर ट्रेन निकालने में नाकाम रहे. पहाड़ तो दूर प्रदेश के मैदानी क्षेत्र विकानगर को भी ट्रेन ट्रैक नहीं बन पाये.

अंग्रेजों ने जो सपना 100 साल पहले देखा था. उसे आज भी पूरा करने की क्षमता हमारे नेताओं में शायद नहीं है. 100 साल पहले भी अंग्रेजों की तकनाक हमसे बेहतर थी. ऋषिकेश-कर्णप्रयाग और टनकपुर-बागेश्वर रेल मार्ग आज भी निर्माण की पहली सीढ़ी भी पार नहीं कर पाये हैं. लेकिन अंगेर्जों की बनाई सुरंग आज भी उनकी तकनीक और विजन को साफ बयां करती है.

Tags: Dehradun news, Uttarakhand news, देहरादून

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