जलवायु परिवर्तन का हिमालय पर सीधा असर, स्नो लैपर्ड के क्षेत्र में पहुंचा लैपर्ड

वैज्ञानिकों का कहना है कि अब भी स्थिति में सुधार के लिए ठोस प्रयास नहीं किए गए तो इंसान को एक बड़ी त्रासदी के लिए तैयार रहना होगा.

News18 Uttarakhand
Updated: September 11, 2018, 8:20 PM IST
जलवायु परिवर्तन का हिमालय पर सीधा असर, स्नो लैपर्ड के क्षेत्र में पहुंचा लैपर्ड
ग्लोबल वार्मिंग के चलते ट्री लाइन धीरे-धीरे ऊपर खिसक रही है और जानवरों के रहने के स्थान भी.
News18 Uttarakhand
Updated: September 11, 2018, 8:20 PM IST
जलवायु परिवर्तन का सबसे ज़्यादा और सीधा प्रभाव हिमालय पर पड़ रहा है. ग्लोबल वार्मिंग के चलते ट्री लाइन धीरे-धीरे ऊपर खिसक रही है और जानवरों के रहने के स्थान भी. भारतीय वन्य जीव संस्थान के वैज्ञानिकों को वन्य जंतुओं के आवास स्थल में बदलाव आने के रिकॉर्ड मिले हैं. अपेक्षाकृत गर्म इलाकों में रहने वाले गुलदार और टाइगर ट्री लाइन से भी ऊपर के क्षेत्रों में देखे गए हैं. हिमालयी जीवों के बर्ताव में आ रहे इस बदलाव ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है.

हिमालय की संवदेनशीलता को देखते हुए भारतीय वन्य जीव संस्थान ने 75 से अधिक वैज्ञानिकों और शोध छात्रों की टीम को जम्मू कश्मीर से लेकर नार्थ ईस्ट तक हिमालय में शोध कार्यों के लिए तैनात किया है. उत्तराखंड में गंगोत्री हिमालय में 22 रिसर्चर पिछले तीन साल से विभिन्न विषयों पर शोध कर रहे हैं. यहां लगाए गए कैमरा ट्रेपों में गुलदार को काफी ऊंचाई पर ट्री लाइन के ऊपर तक देखा गया है.

ऐसा ही टाइगर के साथ भी हो रहा है. WII के वैज्ञानिकों ने बर्फीले क्षेत्रों खतलिंग और अस्कोट तक में टाइगर की मौजूदगी रिकार्ड की है. इसके अलावा गंगोत्री हिमालय में बंदर भी दस्तक दे रहा है. बंदर घास के मैदानों, जंगलों और पहाड़ी इलाकों में ढाई हज़ार मीटर की ऊंचाई तक ही पाया जाता है. लेकिन, गंगोत्री हिमालय में कोल्ड डैज़र्ट कही जाने वाली नेलॉग घाटी और बारोंमास बर्फ से ढके रहने वाले साढ़े चार हज़ार मीटर ऊंचाई स्थित केदारताल में बंदर को देखा गया है.

वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन के साथ ही हिमालय के बढ़ते तापमान और उससे प्रभावित होते पारस्थतिकीय तंत्र से जोड़कर देख रहे हैं. इसके बावजूद इसके हिमालय में शोध के इस पूरे अभियान का नेतृत्व कर रहे संस्थान के निदेशक डॉक्टर वाईबी माथुर और के सत्य कुमार कहते हैं कि अभी किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी. लेकिन जो  प्रारंभिक संकेत हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं.

बहरहाल, वैज्ञानिक शोधों में पहले भी यह बात सामने आ चुकी है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की रफ़्तार भी अपेक्षाकृत तेज़ हो गई है. अब हिमालय में रहने वाले जीव जंतुओं के आवास, व्यवहार में आ रहा परिवर्तन एक गंभीर संकेत की ओर इशारा कर रहा है. यदि अब भी स्थिति में सुधार के लिए ठोस प्रयास नहीं किए गए तो इंसान को एक बड़ी त्रासदी के लिए तैयार रहना होगा.

पिघल रहे है ग्लेशियर, जल्द खत्म हो जाएगा हिमालय!

क्यों भारत में बदल रहा है मानसून?
पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर