देहरादून DM के जनता दरबार की शर्तों से परेशान रहे फ़रियादी, ज़्यादातर लौटे निराश... यह है वजह
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देहरादून DM के जनता दरबार की शर्तों से परेशान रहे फ़रियादी, ज़्यादातर लौटे निराश... यह है वजह
पहले से फ़ोन पर अपॉइंटमेंट न लेकर आने वाले फरियादियों को बैरंग लौटना पड़ा.

बड़ी संख्या में लोगों के बैरंग वापस लौटने और शिकायत करने का पता चलने पर अधिकारियों को होश आया और शिकायत पेटी रखवाई गई.

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देहरादून. लॉकडाउन खुलने के बाद सरकारी दफ़्तरों के दरवाज़े भी लोगों के लिए खुलने लगे हैं. देहरादून के ज़िलाधिकारी आशीष श्रीवास्तव ने बुधवार से जनता दरबार लगाना शुरु किया लेकिन शर्तों के साथ. देहरादून ज़िलाधिकारी ने साफ़ कर दिया है कि एक दिन में सिर्फ़ 25 लोगों की ही समस्याएं सुनी जाएंगी और वह भी उनकी जो पहले से अपॉंटमेंट लेकर आएंगे. जनता दरबार लगने की खबर सुनकर कई लोग अपनी समस्या लेकर कलेक्टर ऑफिस पहुंच गए मगर पहले से फ़ोन पर अपॉइंटमेंट न लेकर आने वाले फरियादियों को बैरंग लौटना पड़ा. लोगों ने कहा कि अगर डीएम खुद ज्यादा लोगों की समस्या नही सुन सकते तो एडीएम, एसडीएम को ही समस्या सुनने को लिए बैठा दिया जाए.

सोशल डिस्टेंसिंग है वजह 

कोरोना के चलते लोगों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है और अपनी शिकायत लेकर वह कहीं जा भी नहीं सकते. ऐसे में ज़िलाधिकारी के जनता दरबार की ख़बर जैसे ही लोगों को पता चली समस्या दूर होने की आशा में कलेक्ट्रेट ऑफ़िस पहुंच गए. लोगों को उम्मीद थी कि उनके काम होंगे लेकिन कलेक्ट्रेट पहुंचते ही यह उम्मीद टूट गई जब पता चला हफ़्ते में 3 दिन ही डीएम साहब लोगों की समस्या सुनेंगे और एक दिन में 25 लोगों की ही फ़रियाद सुनी जाएगी.



दूसरी ओर ज़िलाधिकारी आशीष श्रीवास्तव का कहना है कि सोशल डिस्टेंसिंग को ध्यान में रखते हुए एक दिन में 25 लोगों की समस्या सुनना तय किया गया है. कोरोना से बचना प्राथमिकता है और इसके लिए सभी एहतियात बरतनी ज़रूरी हैं.
कहने भर का जनता दरबार ठीक नहीं 

लेकिन प्रेमनगर से जल संस्थान की शिकायत लेकर पहुंचे नासिर अली को यह इंतज़ाम समझ नहीं आया. वह कहते हैं कि उनके इलाके में 10 साल से पानी की समस्या है. हर बार नया ज़िलाधिकारी आकर आश्वासन देता है कि काम होगा लेकिन नहीं हो पाता. आज फिर गुहार लगाने के डीएम के दरबार में पहुंचे लेकिन यहां तो घुसने ही नहीं दिया जा रहा.

बड़ी संख्या में लोगों के बैरंग वापस लौटने और शिकायत करने का पता चलने पर अधिकारियों को होश आया और शिकायत पेटी रखवाई गई. शिकायत पेटी में शिकायत डालकर लौट रहे लोग संशय में दिखे कि पता नहीं कब नंबर आएगा. कोरोना काल में परेशान होकर सरकारी ऑफ़िसों के धक्के खा रहे लोगों का कहना था कि अगर ऑफिस खुले हैं तो समस्या का समाधान भी निकलना चाहिए, सिर्फ कहने भर का जनता दरबार ठीक नहीं.

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