कोरोना का डर या जिम्मेदारी से बचने का बहाना, डेढ़ महीने से आम जनता के लिए बंद है सचिवालय

बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता एवं सरकार में विधायक खजानदास भी ब्यूरोक्रेसी को दिए जा रहे इस स्पेशल ट्रीटमेंट को लेकर खासे नाराज हैं. (फाइल फोटो)
बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता एवं सरकार में विधायक खजानदास भी ब्यूरोक्रेसी को दिए जा रहे इस स्पेशल ट्रीटमेंट को लेकर खासे नाराज हैं. (फाइल फोटो)

सचिवालय के मुख्य स्वागत अधिकारी अरविंद कुमार चंदोला (Arvind Kumar Chandola) का कहना है कि सचिवालय प्रशासन के आदेश के बाद तीन सितंबर से पास बनाने की व्यवस्था भी सस्पेंड की गई है.

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देहरादून. कोरोना काल में उत्तराखंड में चारधाम यात्रा (Chardham Yatra) भी खुल गई. यहां तक की विधानसभा का सत्र भी संपन्न हुआ. आए दिन कैबिनेट मीटिंग (Cabinet Meeting) भी संचालित होती रहती है, लेकिन इसी कोरोना संक्रमण के बहाने पिछले डेढ़ महीने से बंद पड़ा राज्य का सचिवालय (Secretariat) आज तक आम जनता के लिए नहीं खोला गया. जनता अब सवाल उठा रही है कि आखिर ब्यूरोक्रेसी के लिए क्या कोई अलग प्रोटोकॉल है. इस सबने आम जनता की परेशानियां बढ़ा दी हैं.

राज्य सचिवालय प्रशासनिक व्यवस्था में एक कंट्रोल रूम का काम करता है. यहां अपनी शिकायतों, अपनी फाइलों के फॉलोअप को लेकर पब्लिक का आना-जाना भी लगा होता है. उत्तराखंड में बीस साल बाद भी इतनी स्मूथ व्यवस्था नहीं डेवलेप हो पाई कि कोई एक बार एप्लीकेशन दे दे तो उसकी फाइल खुद ब खुद विभिन्न टेबिलों से होते हुए उस तक निर्धारित समय में पहुंच जाए. खुद सीएम त्रिवेंद्र रावत इसके भुक्त भोगी हैं. जिस फाइल को सीएम ने ओके किया था, लोक निर्माण विभाग के सेक्शन में वो फाइल महीनों तक डंप पड़ रही. महीनों बाद जब सीएम ने फॉलोअप किया तो माजरा समझ में आया. नतीजा लोनिवि के संबंधित सेक्शन के पूरे स्टॉफ को ही बदल दिया गया. ऐसे हालातों में पिछले तीन सितंबर से सचिवालय में कोरोना पर नियंत्रण का बहाना बनाकर राज्य सचिवालय के गेट आम जनता के लिए बंद कर दिए गए हैं.

सुरक्षाकर्मियों से झगड़ने के बाद निराश होकर वापस लौट रहे हैं
पास लेकर अंदर जाने की व्यवस्था भी सस्पेंड की गई है. नतीजा जरूरतमंद मारे-मारे फिर रहे हैं. दूर-दराज से यहां आने वाले लोग कुछ देर तक सचिवालय गेट पर सुरक्षाकर्मियों से झगड़ने के बाद निराश हो वापस लौट रहे हैं. नैनबाग से आए राज्य आंदोलनकारी सोहन लाल सचिवालय में अपने काम के सिलसिले में आए थे, लेकिन उनको गेट पर रोक दिया गया. सोहनलाल अपना राज्य आंदोलनकारी का कार्ड भी घर भूल आए. लेकिन, उनके पास आधार कार्ड था. सोहनलाल ने पास बनाना चाहा तो पता लगा, पास बनाने की प्रक्रिया भी बंद कर दी गई है. नतीजा घंटों सचिवालय गेट पर बैठे रहने के बावजूद यह बुर्जुग राज्य आंदोलनकारी निराश हो वापस लौट गया.
सचिवालय के मुख्य स्वागत अधिकारी अरविंद कुमार चंदोला का कहना है कि सचिवालय प्रशासन के आदेश के बाद तीन सितंबर से पास बनाने की व्यवस्था भी सस्पेंड की गई है. केवल सचिवालय स्टॉफ के अलावा मीटिंगों में भाग लेने वाले अफसरों को ही सचिवालय में एंट्री दी जा रही है. सवाल उठता है कि क्या ब्यूरोक्रेसी के लिए इस राज्य में अलग नियम हैं. अगर बाजार से लेकर सभी ऑफिस , मॉल, काम्पलेक्स, मल्टीप्लेक्स, पार्क , परिवहन सबकुछ खोल दिया गया है, तो फिर आम जनता के लिए सचिवालय ही बंद क्यों ? सचिवालय के इस स्पेशल प्रोटोकॉल को लेकर अब सरकार के मंत्री और विधायक भी सवाल उठाने लगे हैं.



ब्यूरोक्रेसी को दिए जा रहे इस स्पेशल ट्रीटमेंट को लेकर खासे नाराज हैं
बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता एवं सरकार में विधायक खजानदास भी ब्यूरोक्रेसी को दिए जा रहे इस स्पेशल ट्रीटमेंट को लेकर खासे नाराज हैं. उत्तराखंड में व्यूरोक्रेसी के हावी होने की चर्चाएं पहले ही आम है. खजानदास का कहना है कि इससे आम जनता में मैसेज भी गलत जा रहा है और लोगों को परेशानी भी हो रही है. उनका कहना है कि वे सीएम से इस संबंध में बात करेंगे. बहरहाल, उत्तराखंड सचिवालय में फिल्हाल एक तरफा संवाद है. ब्यूरोक्रेसी के जो मन में आए वो जनता को बता दिया जाता है. और मूड नहीं है तो जनहित के आदेश भी फाइलों में दबा दिए जाते हैं. और इसका सबसे बड़ा प्रभाव सरकार की छवि पर पड़ रहा है, क्योंकि, जब दूरदराज क्षेत्रों से आए लोग, नाउम्मीद के साथ वापस लौटते हैं तो वे सिर्फ अपने नेताओं को कोसते हैं.
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