उत्तराखंड में एक ऐप भी कर रहा है डॉक्टरों की सुरक्षा, दून में कई मामले सुलझे

देहरादून के अलावा इस डर्ट ऐप का इस्तेमाल इंदौर और भोपाल में भी डॉक्टर्स कर रहे हैं और मुश्किल की घड़ी में अपनों को अपने साथ खड़ा पा रहे हैं.

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: June 17, 2019, 5:57 PM IST
उत्तराखंड में एक ऐप भी कर रहा है डॉक्टरों की सुरक्षा, दून में कई मामले सुलझे
देहरादून में प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले एक डॉक्टर दंपत्ति के बेटे ने दो साल पहले डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए DERT App बनाया था.
Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: June 17, 2019, 5:57 PM IST
पश्चिम बंगाल में जूनियर डॉक्टरों के साथ मरीज़ के परिजनों के मारपीट करने को लेकर भले ही देश भर में डॉक्टर गुस्से में हों और हड़ताल कर रहे हों लेकिन ऐसे मामले नए नहीं हैं. इंडियन मेडिकल काउंसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार चार में से तीन डॉक्टरों को मरीज़ या उसके किसी परिजन की हिंसा का शिकार होना पडा है. दो साल पहले हिंसा के ऐसे ही मामलों को देखते हुए बीआईटी (बेंगलुरु इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी) के छात्र शरद अग्रवाल ने अपने दोस्त के साथ मिलकर एक ऐप डेवलप किया था जिससे संकट के समय डॉक्टर्स को मदद मिल सकती है. शरद ने यह ऐप इसलिए डेवलप किया था क्योंकि उन्हें देहरादून में प्रैक्टिस करने वाले अपने माता-पिता की चिंता रहती थी.

ऐसे काम करता है DERT App

शरद के पिता डॉक्टर पीके अग्रवाल अपनी पत्नी के साथ देहरादून के बल्लूपुर इलाक़े में एक हॉस्पिटल चलाते हैं. उन्हें किसी तरह की हिंसा का सामना न करना पड़े इसलिए उनके बेटे ने एक ऐप डेवलप किया था. यह ऐप है, DERT - Doctor's Emergency Rescue Task App. इस ऐप का मक़सद यह है कि यह अकेले फंस गए डॉक्टर को तुरंत अपने परिचितों को सहायता के लिए संदेश भेज सके ताकि मामले को बढ़ने से पहले ही रोका जा सके.

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इस ऐप में अपने ऐसे कॉन्टेक्ट्स को डाला जाता है जिन्हें मुश्किल स्थिति में आप मदद के लिए बुलाना चाहते हैं. संकट के समय इसका एक एमरजेंसी बटन दबाते ही कांटेक्ट लिस्ट में सेव्ड नंबरों के पास डॉक्टर का नाम, लोकेशन, हॉस्पिटल का नाम और फ़ोन नंबर पहुंच जाता है. पुश नोटिफ़िकेशन और एसएमएस के ज़रिए ये लोगों के पास पहुंच जाते हैं और वह जल्द से जल्द मदद करने के लिए पहुंच जाते हैं.

अकेले नहीं हैं डॉक्टर

डॉक्टर पीके अग्रवाल बताते हैं कि ख़ुशकिस्मती से सात-आठ महीने से तो ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है लेकिन उसके पहले डर्ट ऐप की मदद से कई डॉक्टर्स मुश्किलों में फंसने से बचे हैं. डॉक्टर अग्रवाल कहते हैं कि दरअसल कई बार मरीज़ ऐसी स्थिति में आते हैं कि उनके जीने-मरने के चांसिस 50-50 होते हैं. अगर डॉक्टर को कहीं देर हो गई या अटेंडेंट को समझने में चूक हो गई तो ख़तरा बढ़ जाता है. लेकिन डॉक्टर की स्थिति मरीज़ के परिजन समझते नहीं हैं.
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डर्ट ऐप की वजह से सेकेंड भर में डॉक्टर के जानने वाले लोगों को पता चल जाता है कि एमरजेंसी आ गई है. ऐसे में 100 में से 10 लोग भी चंद मिनटों में पहुंच जाते हैं तो स्थिति एकदम बदल जाती है. गुस्साई भीड़ के बीच अकेला खड़ा डॉक्टर असहाय महसूस कर रहा होता है, मदद आने पर उसे भी कुछ हिम्मत मिलती है और मरीज़ के परिजन भी यह देखते हैं कि वह अकेला नहीं है. ऐसे में डॉक्टर बात को ठीक से समझा पाने की स्थिति में आ पाता है. वह यह भी कहते हैं कि देहरादून जैसे छोटे से शहर में पांच-सात लोगों में से कोई न कोई किसी का परिचित निकल ही आता है और मामला सुलझ जाता है.

कई मामले सुलझे 

डॉक्टर अग्रवाल बताते हैं कि दो साल पहले सीनियर डॉक्टर डीएस नेगी के क्लिनिक में हंगामा होने की सूचना डर्ट से मिलने पर डॉक्टर तुरंत ही पहुंच गए थे और हंगामा कुछ देर में शांत हो गया था. इसी तरह छाछरा और डॉक्टर नवानी के यहां भी डर्ट से सूचना मिलने पर डॉक्टर और अन्य परिचित पहुंच गए थे, जिसकी वजह से मामला समय रहते सुलझा लिया गया.

डॉक्टर अग्रवाल बताते हैं कि देहरादून के अलावा इस डर्ट ऐप का इस्तेमाल इंदौर और भोपाल में भी डॉक्टर्स कर रहे हैं और मुश्किल की घड़ी में अपनों को अपने साथ खड़ा पा रहे हैं.

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First published: June 17, 2019, 5:55 PM IST
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