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डीजी पुलिस से कह लो चाहे... चौकी में नहीं दर्ज होगी तहरीर तक
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Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: January 7, 2020, 7:28 PM IST
डीजी पुलिस से कह लो चाहे... चौकी में नहीं दर्ज होगी तहरीर तक
उत्तराखंड पुलिस की वेबसाइट में कहा गया है कि किसी भी थाने-चौकी में शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है और पुलिसकर्मी इससे इनकार नहीं कर सकते.

थाने-चौकी में बैठकर शिकायतकर्ताओं को भगाने वाले पुलिसकर्मी क्या ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि अधिकारियों को की जाने वाली‘शिकायत-विकायत से कुछ नहीं होना’?

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देहरादून. जिस देश या राज्य में कानून का राज़ होता है वहां किसी नागरिक के लिए इंसाफ़ लेने की प्रक्रिया कहां से शुरु होती है... शिकायत दर्ज करवाने से. लेकिन देवभूमि उत्तराखंड में पुलिस व्यवस्था शायद भगवान भरोसे ही है क्योंकि यहां पुलिस एफ़आईआर दर्ज करना तो दूर तहरीर यानी लिखित शिकायत तक नहीं लेती. यह थोड़ा अजीब लग सकता है कि उत्तराखंड पुलिस में डीजी (कानून व्यवस्था) तक की बात थाना-चौकी स्तर पर नहीं सुनी जा रही है, लेकिन मित्र पुलिस का सच यही है.

कहां दर्ज करवा सकते हैं शिकायत

उत्तराखंड पुलिस की वेबसाइट के शिकायत दर्ज करवाने वाले पेज पर साफ़ शब्दों में लिखा हुआ है कि किसी वारदात या घटना की शिकायत कहीं भी दर्ज करवाई जा सकती है. ‘आपको अपनी शिकायत कहां दर्ज करवानी चाहिए’ हेड में कहा गया है, “अगर पुलिस स्टेशन की सीमा के बाहर भी कोई अपराध घटित होता है तो भी शिकायतकर्ता को संबंधित पुलिस स्टेशन में जाने को बाध्य नहीं किया जा सकता. आप अपनी शिकायत कहीं भी दर्ज करवा सकते हैं.”

इसी में आगे है, “यह पुलिस स्टेशन का कर्तव्य है कि वह आपकी शिकायत को संबंधित पुलिस स्टेशन में भेजे.”



इसी में आगे यह भी कहा गया है कि अपनी शिकायत की कॉपी ज़रूर लें और किसी भी स्थिति में पुलिस को शिकायत लेकर उसकी कॉपी देनी ही होगी.

घटना

लेकिन पुलिस के दावों और ज़मीनी हक़ीक़त में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है. हुआ यूं कि रविवार को देहरादून के दो पत्रकार रायपुर आर्मी कैंप में अपने किसी परिचित से मिलने गए. उन्होंने कैंप से कुछ दूर सड़क किनारे गाड़ी खड़ी की और जब वह एक-डेढ़ घंटे बाद लौटे तो देखा कि गाड़ी की पिछले दरवाज़ों में से एक का शीशा टूटा हुआ था. देखने पर पता चला कि गाड़ी में पड़े कुछ कपड़े ले जा चुके थे.

गाड़ी की सफ़ाई करने के बाद पीड़ितों ने 112 नंबर (पुलिस कंट्रोल रूम) पर फ़ोन किया और घटना की जानकारी दी. चूंकि मौके पर तत्काल मदद की आवश्कयता महसूस नहीं हो रही थी इसलिए कंट्रोल रूम की सलाह पर अगले दिन एफ़आईआर करवाने का फ़ैसला किया और चले गए.

नहीं करते दर्ज, किसी से भी कह दो

अगले दिन एक पत्रकार लिखित शिकायत करने बालावाला पुलिस चौकी पहुंचे तो वहां मौजूद एसआई बीएस बिष्ट ने यह कहकर तहरीर लेने से इनकार कर दिया कि यह रायपुर थाने में ही देनी होगी. शिकायतकर्ता ने उन्हें बताया कि उत्तराखंड पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट में कहा गया है कि कहीं भी शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है लेकिन उन्होंने इससे साफ़ इनकार कर दिया.

शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि अगर चौकी में तहरीर नहीं ली जाती है तो वह उच्चाधिकारियों से शिकायत करेंगे. इस पर सब इंस्पेक्टर बीएस बिष्ट ने कहा, ‘चाहे डीजीपी से कर लो शिकायत, जो नहीं हो सकता, वह नहीं हो सकता’.

शिकायत और आश्वासन

शिकायतकर्ता पत्रकार ने एसआई के बर्ताव के बारे में डीजी (कानून-व्यवस्था) अशोक कुमार को बताया. उन्होंने शिकायतकर्ता से तहरीर की प्रति मांगी और यह भी आश्वासन दिया कि इस मामले में जांच के आदेश दे दिए जाएंगे.

लेकिन इस आश्वासन के 24 घंटे बीतने के बाद भी तहरीर तक दर्ज नहीं हो पाई, जांच के आदेश तो फिर खुली आंखों के सपने जैसी है.

सवाल

इस घटनाक्रम से कुछ सवाल तो खड़े होते ही हैं. पहला यह कि थाने में बैठकर शिकायतकर्ताओं को भगाने वाले पुलिसकर्मियों को यह विश्वास क्या इसलिए नहीं आता कि उन्हें पता है कि ‘शिकायत-विकायत से कुछ नहीं होना’?

जब पत्रकारों की तहरीर तक देहरादून पुलिस नहीं लेती है (जो कम से कम वरिष्ठ अधिकारियों तक अपनी बात तो पहुंचा सकते हैं) तो आम आदमी क्या उम्मीद कर सकता है?

क्या पुलिसकर्मी ऐसा अज्ञानता की वजह से करते हैं. यानी कि वह जानते ही नहीं कि शिकायत दर्ज करना बाध्यकारी है?

या फिर शिकायतकर्ता को गलत बात कहकर लौटाना उनकी आदत में शामिल है?

किसी भी सूरत में मित्र पुलिस का दावा करने वाली पुलिस के लिए यह अच्छी बात तो नहीं है.

व्यस्तता या...

यह कहा जा सकता है कि देश में जारी प्रदर्शनों, बवाल के माहौल के बीच पुलिस के शीर्ष अधिकारी व्यस्त हो सकते हैं लेकिन यह सवाल तो उनसे भी बनता ही है कि क्या तहरीर तक न लेने की ज़िम्मेदारी मित्र पुलिस में किसी की नहीं है?

अपना रिकॉर्ड साफ़ रखने के लिए अपराध या घटना को दर्ज ही न करना पुराना पुलिसिया तरीका माना जाता है और नए समय में वही पुलिस अच्छी मानी जाती जो शिकायतकर्ता को भगाए न, उसकी बात सुने.

पुलिसकर्मियों का मनोबल बनाए रखना अधिकारियों के लिए ज़रूरी है लेकिन आखिर किस कीमत पर?

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First published: January 7, 2020, 7:26 PM IST
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