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शराब सस्ती करने को लेकर जारी हुआ गैरसैंण से पहला शासनादेश... आंदोलनकारियों ने बताया दुखद
Dehradun News in Hindi

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: March 6, 2020, 5:17 PM IST
शराब सस्ती करने को लेकर जारी हुआ गैरसैंण से पहला शासनादेश... आंदोलनकारियों ने बताया दुखद
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत जब गैरसैंण में ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने के जश्न में शामिल हो रहे थे तब राज्य सरकार के अधिकारी गैरसैंण से पहला जीओ शराब सस्ती करने का जारी करने की तैयारी कर रहे थे.

उत्तराखंड आंदोलन में अपने राज्य को लेकर दो चीज़ें साफ़ थीं. पहली कि पहाड़ी राज्य की राजधानी पहाड़ यानी गैरसैंण में हो और नशा नहीं, रोज़गार चाहिए.

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बुधवार यानी 4 मार्च, 2020 की शाम मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी का ऐलान करने के बाद जो उत्साह का माहौल गैरसैंण में बना था वह गुरुवार को भी पूरे शबाब पर रहा. यहां तक कि कई विधायकों के साथ मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष तक लोक वाद्यों की थाप पर थिरकते नज़र आए थे. राजधानी बनाए जाने के ऐलान के बाद गुरुवार शाम 5 मार्च को गैरसैंण से पहला शासनादेश जारी भी हो गया लेकिन इसे लेकर विभिन्न वर्गों में इसे प्रतिक्रियाएं अच्छी नहीं आईं. क्योंकि यह शासनादेश शराब को सस्ती किए जाने को लेकर था.

शर्मसार करने वाला फ़ैसला

कांग्रेस प्रवक्ता गरिमा दसौनी ने इस शासनादेश पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी भी राजधानी के घोषित होने के बाद उस विधानसभा में या उस सत्र में लिया गया पहला फैसला इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है. ऐसे में त्रिवेंद्र रावत जी द्वारा शराब के पक्ष में लिया गया फैसला समस्त उत्तराखंड और उत्तराखंड वासियों के लिए शर्मसार करने जैसा है.



मुख्यमंत्री ने जनभावनाओं और राज्य आंदोलनकारियों की भावनाओं का हवाला देते हुए राजधानी की घोषणा की लेकिन उन्हें शायद यह पता ही नहीं कि शराब के विरोध में कितनी बड़ी संख्या में मातृशक्ति सड़कों पर आंदोलनरत रही. गैरसैंण से पहला फ़ैसला शराब सस्ती करने के पक्ष में फैसला सरकार की मंशा को ही नहीं उसके शराब प्रेम को भी दर्शाता है. यानी, हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और.



ज़मीन बेचो, शराब बेचो

वरिष्ठ पत्रकार दिनेश जुयाल कहते हैं कि उत्तराखंड आंदोलन में अपने राज्य को लेकर दो चीज़ें मुखर और साफ़ थीं. पहली कि पहाडी राज्य की राजधानी पहाड़ यानी गैरसैंण में हो और नशा नहीं, रोज़गार चाहिए. 80 और 90 के दौर में उत्तराखंड में नशा नहीं रोज़गार दो आंदोलन भी चला था. लेकिन मौजूदा सरकार को इसकी परवाह नहीं.

जुयाल कहते हैं कि त्रिवेंद्र सरकार दो ही काम कर रही है, ज़मीन बेचो और शराब बेचो. सरकार का सारा ज़ोर ज़मीन बेचने पर है. राज्य में ज़मीन बेचन पर लगी सारी पाबंदियां हटाती जा रही है, गैरसैंण तक में अब ज़मीन बेचने की छूट है. इसके अलावा सभी ज़िलों में सरकारी जमीन का चिन्हीकरण कर रहे हैं उन्हें बेचेंगे या लीज़ पर दे देंगे.

दूसरा काम यह सरकार कर रही है कि जो यहां बचे हैं, उन्हें नशे में डुबो दो. युवाओं को नशा नहीं, रोज़गार चाहिए लेकिन रोज़गार के नाम पर भी शराब की फ़ैक्ट्री ही खोलना सूझ रहा है राय के कर्णधारों को.

इस राज्य की ज़मीन बेशकीमती है. लोग देश-विदेश से यहां घूमने ही नहीं इसे पूजने भी आते हैं. आप आज तक धार्मिक पर्यटन को लाइन पर नहीं ला पाए. नए टूरिस्ट डेस्टिनेशन तो छोड़िए, पुरानों को ही आप ठीक से मेनटेन नहीं कर पा रहे हैं.

देवभूमि है यह... युवाओं के लिए, महिलाओं के लिए, किसानों के लिए आपके कैबिनेट के फ़ैसले हैं, उन्हें लेकर शासनादेश जारी करते. आप आप शराब लेकर आ गए. दरअसल सरकार के पास न कोई विज़न है उत्तराखंड के लिए, न कोई रोडमैप है. टूरिज़्म से पैसा जुटाना था लेकिन शराब से जुटा रहे हैं. यह अफ़सोसजनक है.

गलत संदेश 

राज्य आंदोलनकारी और गैरसैंण राजधानी निर्माण अभियान के रणनीतिकार मनोज ध्यानी कहते हैं कि गैरसैंण से पहला शासनादेश शराब पर आना हास्यास्पद है. राज्य सरकार क्या संदेश देना चाहती है देवप्रयाग में शराब की फ़ैक्ट्री बनाई और अब आदिबद्री से शराब सस्ती करने का शासनादेश जारी कर दिया. गैरसैंण से दिया यह संदेश कतई सही नहीं है.

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First published: March 6, 2020, 4:32 PM IST
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